मंगलवार, 27 नवंबर 2012

अपनी उलझी समस्याओं को सुलझाएं



शक्तियों का साक्षात चमत्कार
धार्मिक ग्रंथों में उल्लेख मिलता है कि कलियुग में शक्तियों का साक्षात चमत्कार देखने को मिलता है। किसी भी जातक ने थोड़ी सी भी पूजा-अर्चना कर ली उसे तुरंत लाभ मिलता है। अगर आप भी किसी भी समस्या से घिरे हैं और तत्काल निदान चाहते हैं तो शक्तियों का अद्भुत चमत्कार अनुभव कर सकते हैं। अगर आपको बाकई ढोंगी तांत्रिकों, बाबाओं, जादू-टोना वालों से बेहद तंग और परेशान हो चुके हैं तो सच्ची शक्तियों की कृपा प्राप्त कर अपनी उलझी हुई समस्याओं का निदान प्राप्त कर जीवन को खुशहाल बना सकते हैं। एक बार आपने शक्तियों की विशेष कृपा प्राप्त कर ली तो आपका जीवन धन्य हो जाएगा। हर जातक के जीवन में अनेकानेक समस्याएं आती रहती हैं उन से वह कुछ समय के लिए छुटकारा तो पा लेता है लेकिन कई समस्याएं ऐसी हैं जो जिंदगी भर जातक इनसे छुटकारा नहीं पा सकता। रोजाना का पारिवारिक कलह, पति-पत्नी में मन-मुटाव, आसपास के पड़ोसियों की द्वेष भावना, ऊपरी हवा का चक्कर, जमीन-जायदाद, कोर्ट-कचहरी, प्रेम में विफलता, तलाक की नौबत, धन की बेहद तंगी, बेरोजगार, सास-बहू में अनबन, किसी भी काम में मन नहीं लगना, बीमारियों का पीछा नहीं छूटना, शत्रुता जैसी समस्याएं हर जातक को घेरे रहती हैं। अगर आप इन सभी का सटीक निदान चाहते हैं तो एक बार जरूर संपर्क करें।

- पंडित राज
चैतन्य भविष्य जिज्ञासा शोध संस्थान
एमआईजी-3/23, सुख सागर, फेस-2
नरेला शंकरी, भोपाल -462023 (मप्र), भारत
मोबाइल : +91-8827294576
ईमेल : panditraj259@gmail.com

शुक्रवार, 9 नवंबर 2012

ब्रह्माण्ड नायिका महालक्ष्मी की आलोक मणी है- दीपमाला


अभिमान की लहरों पर बैठी आस्था कांच का घर है। सत्ता लोलुपता की पराकाष्ठा आत्मघात की ओर बढ़ रही है। ऐसे समय में कम से कम परमात्मा का पता चल जाना चाहिए, जो तुम्हारे भीतर ही बसा हुआ है। विश्व को समग्रता में देखना और समझना है तो आस्था, विश्वास और कर्म को स्वीकार करना होगा। आस्था और विश्वास सृष्टिकत्र्ता के धर्म चक्र  हैं। सृष्टि के आगार में विभाजन नहीं, समग्रता है। श्रद्धा हर धड़कन को पहचानती है। हर मुद्रा उससे अनदेखी नहीं है। मौन की भी एक भाषा है और अर्थपूर्ण अगाध अर्थों का भण्डार है। मानव इसीलिए समाज प्रिय है, क्योंकि श्रद्धा और विश्वासों तथा आस्थाओं के मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे और गिरजाघर आज भी आलोकित हैं। प्रेम के क्षणों में कोई अर्थ नहीं खोजे जा सकते, अर्थों का आग्रह तो विवाद के लिए है। आज की आस्थाओं की केन्द्र हंै- दरगाहें। आध्यात्मिक दस्तावेज आज भी समय के हस्ताक्षर हैं। प्यार और आत्मीयता से ही सृष्टि का सौन्दर्य निखरता है। तो आइए, दीपोत्सव की प्रकाश बेला में हम सृष्टिकत्र्ता से वार्तालाप करें। आपके सुख और वैभव की कामना हेतु श्रीसमृद्धि की देवी मां लक्ष्मी जी की आराधना करते हुए दीपमालिका का महोत्सव मनाएं। ब्रह्माण्ड नायिका महामाया लालित्यमयी मां लक्ष्मी जी के पूजन की विधियां जो अनंत एवं व्यापक हैं। मां लक्ष्मी के श्रद्धालुजनों के हितार्थ संक्षिप्त विधि विधान सहित दीपमालिका के पुण्य महापर्व पर पूजन विधि समर्पित है।
- गृह मंदिर में पंच देव पूजा : घर में पूजा स्थल में प्रवेश करने के पूर्व बाहर दरवाजे पर ही आचमन कर लें और तीन बार तालियां बजाएं और विनम्रता के साथ पूजा स्थल (पूजा घर) में प्रवेश करें।
- पूजन सामग्री व्यवस्था : पूजन सामग्री किस ओर रखना चाहिए, इस बात का भी शास्त्र ने निर्देश दिया है। इसके अनुसार पूजन सामग्री को यथा स्थान सजा देना चाहिए। बायीं ओर - (1) सुवासित जल से भरा कलश (उद्कुम्भ) (2) घंटा (3) धूपदानी (4) तेल के दीपक 21, 31 या अधिक दायीं ओर - (1) घृत (घी) का दीपक (2) सुवासित जल से भरा शंख सामने (1) कुं कुम (केसर) और कपूर के साथ घिसा गाढ़ा चंदन (2) पुष्प (3) ताम्रपात्र तथा पूजन की अन्य सामग्री रखें। भगवान के सामने (आगे) चौकोर जल का घेरा डालकर नैवेद्य की वस्तुएं रखें। पूर्वामुखी अथवा उत्तराभिमुखी हो, आचमन कर अपने ऊपर तथा पूजन सामग्री पर
- मंत्र पढ़कर जल छिड़कें
मंत्र - ऊँ अपवित्र: पवित्रो वां सर्वावस्थां गतोऽपि वा।
य: स्मरेत् पुण्डरीकांक्ष स बाह्मभ्यन्तर: श्ुाचि:।।
-  कलश स्थापना : कलश पर रोली से स्वास्तिक का चिन्ह बनाकर कलश के गले में तीन धागा वाली मौली (रक्षा सूत्र) लपेटें। कलश स्थापना भूमि अथवा पाटे पर कुंकुम अथवा रोली से अष्ट दल कमल बनाएं। कलश में सुपारी, द्रव्य, दूब, पांच प्रकार के पत्ते, कुश आदि सुवासित जल में रख दें।
-   कलश (उदकुम्भ) की पूजा सुवासित जल से भरे हुए उदकुम्भ (कलश) की 'उद् कुम्भाय नम:Ó इस मंत्र से चन्दन, पुष्प, अक्षत (चावल) से पूजा कर उसमें तीर्थों के जल, चारों वेदों, तीर्थों, नदियों, सागरों, देवी-देवताओं का आवाहन करने के पश्चात् अक्षत और पुष्प कलश के पास छोड़  दें।
-  मंत्र
कलशस्य मुखे विष्णु: कण्ठे रुद्र: समाश्रित:।
मूले त्वस्य स्थितो ब्रह्मा मध्ये मातृगणा: स्मृता:।।
कुक्षौ तु सागरा: सर्वे सप्तद्वीपा वसुन्धरा।
ऋ वेदोऽथ युजुर्वेद: सामवेदो ह्यथर्वण:
अंगेश्च सहिता: सर्वे कलशं तु समाश्रिता:।
अत्र गायत्री सावित्री शान्ति: पुष्टिकरी तथा।।
आयान्तु देव पूजार्थं दुरितक्षयकारका:।।
गंगे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति।
नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन संनिधिं कुरू।।
सर्वे समुद्रा: सरितस्तीर्थानि जलदा नदा:।
आयान्तु मम शान्त्यर्थं दुरितक्षयकारका:।।
(आवाहन के पश्चात् कलश के मुख पर पूजित नारियल रख दें)
रू    शंख पूजन : शंख में दो दूर्वा, तुलसी और पुष्प डालकर ऊँ कहकर उसे सुवासित जल से भर दें। फिर निम्न मंत्र पढ़कर शंख में तीर्थों का आवाहन करेंं -
2    मंत्र- पृथिव्यां यानि तीर्थानि स्थावराणि चराणि च।
        तानी तीर्थानि शंखेऽस्मिन् विशन्तु ब्रह्मशासनात।।
अब शंखाय नम:, चन्दनं समर्पयामि कहकर, चन्दन लगाएं, तत्पश्चात् शंखाय नम: पुष्पं समर्पयामि कहकर पुष्प चढ़ाएं। देव पूजन में वेद मंत्र फिर आगम मंत्र और बाद में नाम मंत्र का उच्चारण किया जाता है। पूजा पात्रों को यथा स्थान पर रखकर पूर्व दिशा की ओर मुंह करके-आसन पर बैठकर तीन बार आचमन करना चाहिए। (1) ऊँ केशवाय नम: (2) ऊँ नारायणाय नम: (3) ऊँ माधवाय नम: आचमन के बाद बायें हाथ में जल लेकर दाहिने हाथ से अपने ऊपर और पूजन सामग्री तथा पूजन स्थल पर बैठे श्रद्धालुओं पर जल छिड़कना चाहिए।
- स्वस्ति वाचन
श्री मन्महागणाधिपतये नम:। श्री लक्ष्मी नारायणभ्यां नम:।।
-  पंचदेव पूजन विधि : हाथ में पुष्प, अक्षत आदि लेकर निम्न मंत्रों का जाप कर वेदी पर चढ़ाएं -
(1) श्री मन्ममहागणाधिपतये नम:
(2) लक्ष्मी नारायणाभ्यां नम:
(3) उमा महेश्वराभ्यां नम:
(4) मातृ-पितृ चरणकमलेभ्यो नम:
(5) इष्ट देवताभ्यो नम:
(6) कुल देवताभ्यो नम:
(7) ग्राम देवताभ्यो नम:
(8) वास्तु देवताभ्यो नम:
(9) सर्वेभ्यो देवेभ्यो नम:
-  महालक्ष्मी पूजन विधि : भगवती लक्ष्मी चल एवं अचल, दृश्य, अदृश्य सभी सम्पत्तियों, सिद्धियों एवं निधियों की अधिष्ठात्री साक्षात् नारायणी हैं। भगवान श्रीगणेश सिद्धि, बुद्धि एवं शुभ और लाभ के स्वामी हैं तथा सभी अमंगलों एवं विघ्नों के नाशक हैं। ये सत-बुद्धि प्रदान करने वाले हैं। अत: इनके समवेत पूजन से सभी कल्याण-मंगल एवं आनंद प्राप्त होते हंै। पूजन के लिए किसी चौकी या कपड़े के पवित्र आसन पर गणेश जी के दाहिनी ओर माता महालक्ष्मी की स्थापना करना चाहिए। प्रतिष्ठा - बायें हाथ में अक्षत लेकर निम्न मंत्रों को पढ़ते हुए दाहिने हाथ से उन अक्षतों को गणेश जी की प्रतिमा (चित्र) पर छोड़ते जाएं। भगवान गणेश का ध्यान करें-
2    मंत्र - गजानंन भूतगणादि सेवतं कपित्थ जम्बूफल चारू भक्षणम।
    उमा सुतं शोक विनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वर पाद पंकजम।।
इसके पश्चात् प्रधान पूजा में भगवती महालक्ष्मी का पूजन करें।
ध्यान मंत्र - (आवाहन)
सर्व लोकस्य जननीं सर्व सौख्यप्रदायिनीम्।
सर्वदेवमयीमीशां देवीभावाहयाभ्याहम्।।
ऊँ तां म आ वह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम।
यस्यां हिरण्यं विन्देयं गामश्वं पुरुषानहम्।।
आवाहन के लिए पुष्प लें-
2    मंत्र- ऊँ महालक्ष्म्यै नम:। महालक्ष्मी मावाहयामी,
आवाहनार्थे पुष्पाणि समर्पयामी। (आवाहन के लिए पुष्प लें)
आसन के लिए - (कमल आदि पुष्प लें)
2    मंत्र - ऊँ महालक्ष्म्यै नम:। आसनं समर्पयामी
(आवाहन के लिए कमलादि पुष्प अर्पित करें)
पाद्य -
2    मंत्र - ऊँ महालक्ष्म्यै नम:। पादयो: पाद्यं समर्पयामि।
(चन्दन-पुष्पादियुक्त जल अर्पित करें)
अघ्र्य -
2    मंत्र - ऊँ महालक्ष्म्यै नम:। हस्तयोरध्र्यं समर्पयामी।
(अष्टगंध मिश्रित जल अध्र्य पात्र से देवी जी के हाथों में दें)
आचमन -
2    मंत्र - ऊँ महालक्ष्म्यै नम:। आचमनीयं जलं समर्पयामी
(आचमन के लिए जल चढ़ावें)
स्नान -
2    मंत्र - ऊँ महालक्ष्म्यै नम:। स्नानं जलं समर्पयामी।
(शुद्ध जल से मंत्रोच्चार के साथ स्नान करावें)
दुग्ध स्नान -
2    मंत्र - ऊँ महालक्ष्म्यै नम:। पय: स्नानं समर्पयामी।
पय: स्नानान्ते शुद्धोदक स्नानानं समर्पयामी।
(दूध से स्नान कराने के बाद पुन: शुद्ध जल से स्नान करावें)
दधि स्नान -
2    मंत्र - ऊँ महालक्ष्म्यै नम:। दधि स्नानं समर्पयामी।
दधि स्नानान्ते शुद्धोदक स्नानं समर्पयामी।
(दही से स्नान कराने के बाद पुन: शुद्ध जल से स्नान करावें)
घृत स्नान-
2    मंत्र - ऊँ महालक्ष्म्यै नम:। घृत स्नानं समर्पयामी।
घृत स्नानान्ते शुद्धोदक स्नानं समर्पयामी।।
(घी से स्नान कराने के बाद पुन: शुद्ध जल से स्नान करावें)
मधु स्नान (शहद)
2    मंत्र - ऊँ महालक्ष्म्यै नम:। मधु स्नानं समर्पयामी।
    मधु स्नानान्ते शुद्धोदक स्नानं समर्पयामी।।
(मधु स्नान के बाद पुन: शुद्ध जल से स्नान करावें)
शर्करा स्नान (शक्कर)
2    मंत्र - ऊँ महालक्ष्म्यै नम:। शर्करा स्नानं समर्पयामी।
शर्करा स्नानान्ते शुद्धोदक स्नानं समर्पयामी।।
(शर्करा स्नान के बाद पुन: शुद्ध जल से स्नान करावें)
पंचामृत स्नान-
2    मंत्र - ऊँ महालक्ष्म्यै नम:। पंचामृत स्नानं समर्पयामी।
पंचामृत स्नानान्ते शुद्धोदक स्नानं समर्पयामी नम:।।
(पंचामृत से स्नान कराने के बाद पुन: शुद्ध जल से स्नान करावें)
मां लक्ष्मी जी को स्नान कराने के पश्चात् प्रतिमा का अंग-प्रोक्षण कर शुद्ध पीले या लाल वस्त्र की आसनी पर उन्हें विराजमान करें।
वस्त्र
2    मंत्र- ऊँ महालक्ष्म्यै नम:। वस्त्रं समर्पयामी (वस्त्र अर्पित करें)
आभूषण
2    मंत्र- ऊँ महालक्ष्म्यै नम:। नानाविधानी कुण्डलकटकादीनि
आभूषणानि समर्पयामि।
(आभूषण समर्पित करें)
सिन्दूर चढ़ावें
2    मंत्र- ऊँ महालक्ष्म्यै नम:। सिन्दूरं समर्पयामि
(देवीजी को सिन्दूर चढ़ावें)
कुंकुम अर्पित करें
2    मंत्र - कुंकुम कामदं दिव्यं कुंकुम कामरूपिणम्।
अखण्डकाम सौभाग्यं कुंकुमं प्रतिगृहयताम्।।
ऊँ महालक्ष्म्यै नम: कुंकु म समर्पयामि।
(कुंकुम अर्पित करें)
पुष्पसार (इत्र) अर्पित करें -
2    मंत्र- तैलानि च सुगन्धीनि द्रव्याणि विविधानि च।
मया दत्तानिलेपार्थं गृहाण परमेश्वरि।
(सुगंधित तेल एवं इत्र चढ़ावें)
अक्षत अर्पित करें
2    मंत्र - ऊँ महालक्ष्म्यै नम:। अक्षतान् समर्पयामि।।
(कुं कुमयुक्त अक्षत अर्पित करें)
पुष्पमाला चढ़ावें -
2    मंत्र - माल्यादीनि सुगन्धीनि मालत्यादीनि वै प्रभो।
मयानीतानि पुष्पाणि पूजार्थं प्रतिगृह्यताम।।
ऊँ मनस: काममाकूतिं वाच: सत्यमशीमहि।
पशूनां रूपमन्न्स्यमयि श्री: श्रयतं यश:।।
(पुष्प तथा पुष्पमालाओं से अलंकृत करें यथा संभव लाल कमल के
फूलों से)
दूर्वा चढ़ावें
2    मंत्र - विष्णवादिसर्वदेवानां प्रियां सर्वेसुशोभनाम्।
क्षीरसागरसम्भूते दूर्वां स्वीकुरू सर्वदा।।
ऊँ महालक्ष्म्यै नम:। दूर्वाअंकुरान समर्पयामी
(मंत्र जाप के साथ दूर्वा चढ़ावें)
अंग पूजा - रोली, कुंकुम मिश्रित अक्षत-पुष्पों से निम्नांकित एक-एक मंत्र पढ़ते हुए अंग पूजा करें।
(1) ऊँ चपलायै नम:, पादौ पूजयामि।
(2) ऊँ चंचलायै नम:, जानुनी पूजयामि।
(3) ऊँ कमलायै नम:, कटि पूजयामि।
(4) ऊँ कात्यायन्यै नम:, नाभिं पूजयामि।
(5) ऊँ जगन्मात्रे नम:, जठरं पूजयामि।
(6) ऊँ विश्ववल्लभायै नम:, वक्ष: स्थलं पूजयामि
(7) ऊँ कमलावासिन्यै नम:, हस्तौ पूजयामि
(8) ऊँ पदमाननायै नम:, मुखं पूजयामि।
(9) ऊँ कमलापत्राक्ष्यै नम:, नेत्रत्रयं पूजयामि
(10) ऊँ श्रियै नम: शिर:, पूजयामि
(11) ऊँ महालक्ष्म्यै नम:, सर्वांग पूजयामि
-  अष्ट लक्ष्मी पूजन : तदोपरान्त पूर्वादि क्रम से आठों दिशाओं में महालक्ष्मी के पास कुंकुमायुक्त अक्षत तथा पुष्पों से एक-एक मंत्र (के जाप) पढ़ते हुए आठ लक्ष्मियों का पूजन करें -
(1) ऊँ आद्यलक्ष्भ्यै नम:
(2) ऊँ विद्यालक्ष्भ्यै नम:
(3) ऊँ सौभाग्यलक्ष्भ्यै नम:
(4) ऊँ अमृतलक्ष्भ्यै नम:
(5) ऊँ कामलक्ष्भ्यै नम:
(6) ऊँ सत्यलक्ष्भ्यै नम:
(7) ऊँ भोगलक्ष्भ्यै नम:
(8) ऊँ योगलक्ष्भ्यै नम:
धूप अर्पित करें
2    मंत्र - ऊँ लक्ष्भ्यै नम: धूपमाध्रापयामि। (धूप दें) दीप पूजन (दीपोत्सव) कृपया, ध्यान रखें- दीपावली पूजन को दीपोत्सव भी कहते हंै। इसमें कम से कम 11, 21 या अधिक दीप प्रज्ज्वलित किये जाने चाहिए। किसी पात्र में (पीतल/स्टील का पात्र)। मंत्र के साथ- ऊँ दीपावल्यै नम: के साथ दीपों का गन्धादि उपचारों द्वारा - पूजन कर निम्न मंत्रों का जाप करें तथा पूजनोपरान्त धान का लावा इत्यादि पदार्थ गणेशजी, महालक्ष्मी जी तथा अन्य सभी देवी-देवताओं को अर्पित कर सभी दीपों को प्रज्ज्वलित कर पूजास्थल को अलंकृत कर दें।
(1) ऊँ लक्ष्म्यै नम:, दीपं दर्शयामी
(2) ऊँ गं गणपतये नम:, दीपं दर्शयामी
(3) ऊँ नारायणाय नम:, दीपं दर्शयामी
(4) ऊँ शिवाय नम:, दीपं दर्शयामी
(5) ऊँ ब्रह्मणे नम:, दीपं दर्शयामी
(6) ऊँ सरस्वतै नम:, दीपं दर्शयामी
(7) ऊँ महिषमर्दिनी नम:, दीपं दर्शयामी
(कलश के चारों ओर नवग्रहों हेतु दीपक रखे, मंत्र जाप के साथ)
(1) ऊँ सूर्याय नम:, दीपं दर्शयामी
(2) ऊँ चन्द्रमाये नम:, दीपं दर्शयामी
(3) ऊँ भौमाय नम:, दीपं दर्शयामी
(4) ऊँ बुधाय नम:, दीपं दर्शयामी
(5) ऊँ बृहस्पतयै नम:, दीपं दर्शयामी
(6) ऊँ शुक्राय नम:, दीपं दर्शयामी
(7) ऊँ शनैश्चराय नम:, दीपं दर्शयामी
(8) ऊँ राहवे नम:, दीपं दर्शयामी
(9) ऊँ केतवे नम:, दीपं दर्शयामी
नैवेद्य निवेदित कर- जल अर्पित करें
2    मंत्र - ऊँ महालक्ष्म्यै नम: नैवेद्यं निवेदयामि, मध्ये पानीयम, उत्तराषोऽशनार्थं हस्त प्रक्षालनार्थं, मुख प्रक्षालनार्थं च जलम् समर्पयामि
आचमन - मंत्र के साथ आचमन के लिए जल लें
2    मंत्र - ऊँ महालक्ष्म्यै नम:, आचमनीयं जलं समर्पयामि।
(नैवेद्य निवेदन करने के पश्चात् आचमन के लिए जल लें)
ऋ तुफल - मंत्र के साथ मां लक्ष्मी जी को ऋतु फल अर्पित कर आचमन हेतु जल लें।
2    मंत्र - ऊँ महालक्ष्म्यै नम: अखण्ड ऋ तुफलं समर्पयामि।
आचमनीयं जलं च समर्पयामि।।
मिष्ठान - मंत्र के साथ मां लक्ष्मी जी को मिष्ठान अर्पित करें।
2    मंत्र - ऊँ महालक्ष्म्यै नम:, मिष्ठानं समर्पयामि।
ताम्बूल - (पूंगीफल) - मां लक्ष्मी जी को इलायची, लोंग, सुपाड़ी ताम्बूल (पान) अर्पित करें, इस मंत्र के साथ
2    मंत्र - ऊँ महालक्ष्म्यै नम: मुखवासार्थे ताम्बूलं समर्पयामि।
दक्षिणा - परिवार/व्यवसाय स्थल पर सभी उपस्थित जन दक्षिणा चढ़ावें, मंत्र जाप के साथ।
2    मंत्र - ऊँ महालक्ष्म्यै नम:, दक्षिणां समर्पयामि
प्रदक्षिणा (हाथ जोड़कर)-
2    मंत्र - यानि कानि च पापानि जन्मान्तरकृतानि च।
तानि सर्वाणिनश्यन्तु प्रदक्षिणपदे-पदे।
प्रार्थना (हाथ जोड़कर)
2    मंत्र - ऊँ महालक्ष्म्यै नम: प्रार्थनापूर्वकं नमस्कारान् समर्पयामि।
(प्रार्थना करते हुए नमन करें)
पूजन के अंत में - (समर्पण)
2    मंत्र - कृतेनानेन पूजनेन भगवती महालक्ष्मीदेवी प्रीयताम् न मम।
(यह मंत्र उच्चारण कर समस्त पूजन कर्म भगवती महालक्ष्मी को समर्पित करें तथा जल गिराएं। उपस्थित जनों को तिलक लगाएं और हाथ में मौली बांधें।)
2    आरती - मां महालक्ष्मी जी आरती करें सभी उपस्थित श्रद्धालुओं के साथ। अन्त में - प्रसाद वितरण कीजिए।
धनतेरस-दीपावली शुभ मुहूर्त
दीपावली का शुभारभ धनतेरस को दीप जलाकर करते हैं। धनतेरस तिथि का शुभ मुहूर्त 11.11.2012, रविवार को प्रात: 10 बजे से 12.11.2012, सोमवार को
प्रात: 8.15 मिनट तक, तदोपरांत छोटी दीवाली (नरक चैदस)। दीपावली 13.11.2012
को प्रात: 6.15 से रात्रि अन्त तक। 14.11.2012 को गोवर्धन पूजा।
लक्ष्मीपूजन का मुहूर्त 13 नवम्बर, 2012 दिन मंगलवार को सांय 5.15 से
रात्रि 2.20 तक। पूजन का विशेष शुभ मुहुर्त रात्रि 7.30 से 9 बजे एवं रात्रि 10.30 से 2.20
के मध्य है।


- पंडित पीएन भट्ट
अंतरराष्ट्रीय ज्योतिर्विद,
अंकशास्त्री एवं हस्तरेखा विशेषज्ञ
संचालक : एस्ट्रो रिसर्च सेंटर
जी-4/4,जीएडी कॉलोनी, गोपालगंज, सागर (मप्र)
मोबाइल : 09407266609
फोन : 07582-227159,223168 


शनिवार, 6 अक्टूबर 2012

दर्शकों के दिलों में बसना चाहता हूं : दिलजान




सुर क्षेत्र में कमाल दिखा रहे पंजाब की शान दिलजान से बातचीत




परिणीता नागरकर

'फतह सुरों की, जीत संगीत की पर आधारित सुर-क्षेत्र रियल्टी शोज के बादशाह गजेन्द्र सिंह का भव्य पैमाने पर बना सिंगिंग रियल्टी शो है जो दर्शकों का पंसदीदा शो बन गया है। सहारा वन, कर्लस और पाकिस्तान के जियो टी वी पर प्रसारित हो रहे इस शो में 12 प्रतियोगी भाग ले रहे हैं। इन प्रतियोगियों में करतारपुर (जालन्धर) में जन्मे युवा गायक दिलजान की गायिकी के सभी दीवाने बन गये हैं। उनकी आवाज का जादू सिर चढ़ कर बोल रहा है। पंजाब की शान दिलजान पिछले दिनों दुबई में इस शो की पहले भाग की शूटिंग खत्म करने के बाद पंजाब आए तो उन्होंने इस शो के बारे में अपने अनुभवों को बड़े फक्र से बताया। उनसे हुई बातचीत के प्रमुख अंश:

इस शो की खासियत क्या है?
'सुर-क्षेत्र एक अलग फार्मेट पर बना सिंगिंग रियल्टी शो है जो भारत और पाकिस्तान में छिपी संगीत प्रतिभाओं को दुनिया के सामने प्रस्तुत करेगा। इस शो के सभी 12 प्रतियोगी आजकल दर्शकों का दिल जीतने की कोशिशकर रहे हैं।

आपका इस शो के लिए चयन कैसे हुआ?
दिसंबर 2011 में सुर-क्षेत्र के लिए लुधियाना में आंडिशंस हुए थे। तकरीबन 300 चुने गये प्रतियोगियों में से केवल मुझे ही मुबंई में फाईनल ऑडिशन के लिए चुना गया। मैंने ऑडिशनस में गजलों के बादशाह स्वर्गीय जगजीत सिंह का यादगार गीत चिट्ठी न कोई संदेश और सूफियाना गीत 'आयो नी संयो गाया। गजेन्द्र सिंह की टीम को मुझमें एक सुरीली आवाज नजर आयी। मुंबई में भी मैंने अपनी गायिकी के बल पर हिमेश रेशमिया जैसे गायक और संगीत निर्देशक का दिल जीता।

आपकी नजर में हिमेश रेशमिया और आतिफ असलम कैसे हैं ?
देखिये हिमेश रेशमिया भारतीय टीम के कप्तान हैं और आतिफ असलम पाकिस्तान टीम के। दोनों संगीत क्षेत्र के धुरंधर माने जाते हैं। सेट पर दोनों अपने अपने प्रतियोगियों का हौसला बढ़ाते हैं। मुझे हिमेशजी से बहुत कुछ सीखने को मिला है। उन्होंने मेरी प्रतिभा को परखा और पहचाना अैर अब मैं उनकी और दर्शकों की कसौटी पर खरा उतरने की कोशिश करूंगा।

संगीत में आपके गुरु कौन हैं?
मेरा बचपन से यह सपना था कि मैं एक गायक बनूं। मेरे पिताजी ने मुझे इस क्षेत्र में आने की प्रेरणा दी। मुझे उस्ताद पूर्ण शाह कोटी का आशीर्वाद मिला है। मेरे सिर पर मास्टर सलीम जैसे अच्छे गायक का हाथ भी है। मैं इन सभी संगीत की चर्चित हस्तियों का शुक्रगुजार हूं जिनकी बदौलत मैं आज इस मुकाम पर पहुंचा हूं।

सुर क्षेत्र के जजों के बार में बताएं?
आशा भौसले जी, आबिदा परवीन जी और रूना लैला जी इस शो की जज हैं। तीनों का अपना अपना नजरिया है। सभी जज प्रतियोगिता में अच्छे सुरों का विशेष ध्यान रखते हैं। सुरों का जिसे अच्छा ज्ञान है वो ही इस शो का विजेता होगा। मै आशा जी से बहुत प्रभावित हूं। उन्होंने कई बार खड़े होकर मेरे गाये गीतों की प्रशंसा की है। मेरी नजर में तीनों जज बाखूबी अपनी भूमिका निभा रहे हैं।

आपका संगीत का अब तक का सफर कैसा रहा?
मेरा संगीत का सफर अब तक अच्छा ही रहा है। मैं 2006 में 'आवाज पंजाब दी म्यूजिकल कंटेस्ट में रनर अप रहा। 'मेरी एक माता की भेंटों की एलबम आ चुकी है। दूसरी एलबम भी लगभग तैयार है जो इस शो के बाद रिलीज होगी। मेरी दूसरी एलबम का संगीत सचिन आहूजा ने दिया है।

आपका लक्ष्य क्या है?
बतौर गायक दर्शकों के दिलों में बस जाना। जैसा कि सभी गायकों का सपना होता है। कि वो बॉलीवुड में भी फिल्मों में गाएं तो मेरा भी यही सपना और लक्ष्य है।

शुक्रवार, 15 जून 2012

पर्यटक स्थल सनकुआ


सिन्धु नदी वन दण्डक सौ, सनकादि सौ क्षेत्र सदा जल गाजै




- राजकुमार सोनी

शौण्ड्र शैल की सुरम्य वनस्थली, अपलक आकाश की ओर निहारते एवं भूमि पूजन के लिए कुसुमांजलि बिखेरती हुई सघन द्रुमों से शोभित गिरि श्रृंखलाएं। चरणों के कल निनाद प्रपूरित विहंगावलियों के मृदुल स्वरों से बरबस मानव मन को आकृष्ट करते कलगानों से संबंधित अरण्य की मनोहारिणी आभा। उदित और अस्त होते हुए दिवाकर की हेमाभा से रचित चित्रावलियों से अन्र्ततम को आकृष्ट करती मनोवृत्तियों को केन्द्रीभूत कर प्रफुल्लित करती एवं विभिन्न दृश्यों  से स्वर्गिक आनंद का अनुभव कराती प्रकृति का मातृ तुल्य दुलार इस सनकेश्वर क्षेत्र की अपनी एक विशेषता है। प्रकृति के सान्त वातावरण में स्थित एवं सौन्दर्य से परिपूरित यह स्थान आधुनिक परिवहन साधना के द्वारा देश के बड़े-बड़े नगरों से जुड़ा होने पर भी शासन की उपेक्षा से अन्धकूप में पड़े व्यक्ति की तरह छटपटा रहा है। उसे आशा है शासन के स्नेह मय दुलार की जिसे हृदय में संजोए वह वर्षों से बाट जोह रहा है। आइये इस स्थान की कुछ विशेषताओं पर दृष्टि डालें।
आप अनुभव करेंगे कि प्रकृति के अपरिसीमित वरदानों से समन्वित खनिजों की अपरिमित समृद्धि से संयुक्त यह उत्कृष्ट स्थान एक मात्र केन्द्रीय शासन एवं प्रादेशिक शासन की उपेक्षा से ही सौतेली मां के शिशु की तरह दुलार से वंचित रहा है।
सेंवढ़ा जिला दतिया, मध्यप्रदेश की एक मात्र पहली तहसील है। दूसरी तहसील भाण्डेर को समलित किया गया है। यह स्थान न्यायालय, एसडीओ राजस्व, एसडीओपी, एसडीओ सिंचाई, पीडब्ल्यू डी इंजीनियर, विद्युत टावर, एसटीडी की दूर संचार सुविधाओं से पूर्णत: समन्वित है। देश की समृद्धशाली बैंकों की शाखाओं एवं चतुर्दिक गमन करती बसों द्वारा यह स्थान जुड़ा हुआ है। अनाज की एक बड़ी मंडी तथा शिक्षा एवं कला में स्नातकोत्तर शिक्षा की सुविधा प्राप्त पुरातात्विक भग्नावशेषों से युक्त बड़ी नगरी है। सिन्ध नदी विन्ध शैल की श्रृंखलाओं का आश्रय लेती हुई यहां अपना अनुपमेय प्रकृति वैभव बिखेरती है। इस स्थान पर आकर सिन्धु सरिता मनोरम झरने बनाती है। ऊपर से नीचे की ओर गिरती सिन्धु धारा, दुग्ध धवल होकर बड़ा मनमोहक दृश्य कर देती है। गिरते हुए जल से ऊपर की ओर उड़ते जल कण धूमयुक्त कुहरे का सुन्दर दृश्य उपस्थित कर शरीर स्पर्श से मानव मन को शीतलता प्रदान कर हरा कर देता है। नीचे पहाड़ों को काटकर बनाई गई सुरम्योपत्यकाएं अजन्ता और एलोरा की गुआओं की होड़ सी करती हुई हमारा मन आकर्षित करती हैं। सिन्धु नदी को पार करने के लिए दो सुरम्य सेतु हैं। एक बड़ा और दूसरा छोटा। ये दोनों ही सेतु इसकी सुरम्यता में चतुर्गुण वृद्धि करते हैं।
छोटे सेतु से सरित्प्रवाह को रोकने के लिए उसके दरवाजों में खांचे बने हुए हैं। जिनमें काष्ठ के पटिये डालकर उसके प्रवाह को रोका जा सकता है, जिससे एक बांध का स्वरूप बनकर पर्यटकों के लिए स्विमिंग पूल का कार्य पूर्ण करेगा। पहाड़ी, चट्टानों से मोहक दृश्य उपस्थित करता हुआ यह स्थान मठों, मंदिरों, शिवालयों, सतियों के स्मारकों से परिपूर्ण आगत यात्रियों, पर्यटकों को आनंद विभोर कर आश्चर्य चकित कर देता है।
सेंवढ़ा (सनकुआं) के संबंध में पद्म पुराण के तीर्थ खम्ड के द्वितीय अध्याय में विस्तार से वर्णन है। नारद जी सनत्कुमारों को तपस्या के लिए स्थान बताते हुए कहते हैं -
स्थलं पुष्प फलैयुक्तिं प्रसान्त स्वापदा हृतं।
भवद्भिस्तप्यतां तत्रयेन क्रोधस्तु शान्तिग:।।

एक अन्य स्थानीय राज्य सम्मान प्राप्त संस्कृत कवि इस सरिता के सौन्दर्य का वर्णन करते हुए लिखते हैं -
मज्जद्देव वधू कुच द्वय गलत्क स्तूरिका कुंकुमै:।
श्वेतैश्चंदन बिंदुश्चि तनुते शोभा प्रयागोद्भवाम।।
पंचद्वीचि विनाशिता शिल पायान्जना नन्दिका।
सां सिन्धु: सनकेश मस्तक लतापायादपायाज्जगत्।।

प्रसिद्ध संत कवि अक्षर अनन्य इस स्थान के सौन्दर्य का वर्णन करते हुए लिखते हैं -
सिन्धु नदी वन दण्डक सौ, सनकादि सौ क्षेत्र सदा जलगाजै।
काशी सौवास घनेमठ सम्बु के साधु समाज जै बोलै सदा जै।।
कोट अदूर बनौ हिरि पै प्रभु सौ प्राथिचन्द नरेस विराजै।
उद्धित मंदिर तीर नदी तिहि आसन अस्थितर अच्छिर छाजै।।

महाकवि मैथली शरण गुप्त एवं प्रसिद्ध कवि अजमेरी जी भी इसके प्राकृतिक वैभव का दर्शन कर लिखे बिना न रह सके। लेखक ने स्वयं भी हिन्दी एवं संस्कृत में अनेकों कविताएं अनुपम सौन्दर्यमयी सिन्धु के दिव्य दृश्यों से प्रभावित होकर लिखी हैं। जिनमें से संस्कृत का उदाहरण देखिये-
सुर सुरेन्द्र मनस्पृशे में कारिणी।
नियति क्रीडनिका सुखदा स्थली,
सनकादि तप प्रभचन्ति प्रवितनोतु रसं सरसमेन:।।
अति सुरम्य प्रकृत्यखिला मुदा,
सुरभि पुष्प चितन्वित सुद्रुमा;
तरुलता हरितां गिरि श्रृंखला,
सुमन रञजयतं गिरिकानन: गिरि शिखरे।
परिस्म्य शिवालय: विविध आश्रमसंत महत्व:
लसति निर्झर मञजु सरिच्छटा किरति
दिव्य हिमांशु रसंमुदर
शुंभ सरिंत्सलिलाद्रं सुखप्रदा वसंति सिंधु
तटं व्याभिरामसा।
सनकनंदन पावन तीर्थ या लसतिसा
सेवदेति शुभ प्रदा।

सिन्धु के किनारे निर्मित राज प्रासाद की उतुंग अट्टालिकाओं का दृश्य जन मन को आकर्षित करता है एवं प्राचीन दुर्ग की प्रार्चा में व बुर्ज स्थान की शोभा में वृद्धि कर पर्यटकों के आकर्षण के केन्द्र बन जाते हैं। वास्तु कला की दृष्टि से दुर्ग के अन्तरस्थ रनवासों, प्रासादों की निर्माण कला अत्यंत उत्कृष्ट है। शत्रु के आक्रमण से सुरक्षा की दृष्टि से भी ये दुर्ग अपने में अनूठा और बेजोड़ है।
सनकादि ऋषियों की तपस्थली होने के कारण यह सृष्टि के आरंभ में भी गणमान्य स्थानों में था। इस कारण पौराणिक काल में यह समृद्ध स्थानों की श्रेणी में आता रहा होगा, जिसके प्रमाण यहां के मठ, मंदिर और भवन दुमंजिले, तिमंजिले खण्डर हैं। अत: पुरातत्वविदों के लिए यहां पर्याप्त सामग्री उपलब्ध है। प्राचीन मूर्तियां यहां प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं। अमरा ग्राम से प्राप्त एक शिव मूर्ति जो उत्खनन से प्राप्त है, बौद्ध कालीन मूर्तिकला में बेजोड़ है। राजराजेश्वरी माता मंदिर के पास स्थित चबूतरे पर जो नव दुर्गा की मूर्ति थी वह कला की दृष्टि से अद्वितीय थी जिसमें पत्थर को बारीक काटकर आभूषण पहनाये गए थे, वह आश्चर्य चकित कर देने वाली मूर्ति थी, यह मूर्ति सन् 1992 में चोरी चली गई। इसी तरह अजयपाल के विकट प्राप्त पत्थर की बारीक कटाई से युक्त प्राचीन सुन्दर मूर्तियां भी चोरी चली गईं। टंकन कला में अद्वितीय ये मूर्तियां सुरक्षा की व्यवस्था न होने से प्रतिवर्ष चोरों की जीविका का साधन बनी हुई हैं। ये चोर विदेशों में इन मूर्तियों को ऊंचे दामों में बेच देते हैं।
पुराने सेंवढ़ा में उत्खनन से नक्काशीदार पक्के रंगीन चित्रकारी से युक्त जो भवन भूमि के नीचे से निकाले गए हैं वे पुरातत्वविदों के लिए शोध की पर्याप्त सामग्री प्रस्तुत करने में बहुत सहायक हैं।
सेंवढ़ा से 15 किलोमीटर की दूरी पर स्थित विशाल रतनगढ़ वाली माता का अत्यन्त प्राचीन सिद्ध मंदिर है। यह स्थान अब जन आकांक्षाओं को पूर्ण करने वाला स्थान बन गया है। यह स्थान हर सोमवार को दर्शनार्थियों के आवागमन से परिपूर्ण रहता है। दीपावली की दौज को हर साल विशाल मेला लगता है, जिसमें लाखों भक्त दर्शन करने आते हैं और अपनी मुरादें पूरी करते हैं। भाईदौज, दीपावली को द्वितीया के दिन अपार जन समुदाय और दुकानदारों के आगमन से एक विशाल मेले का रूप धारण कर लेता है। इस मंदिर के पीछे कुंवर साहब बाबा का स्थान है जिनके नाम से सर्प के बंध लगाए जाते हैं। कोबरा, काले विषधर सर्प का काटा हुआ व्यक्ति भी इनके नाम से बंध से बच जाता है। बंध काटने के दिन व्यक्ति को बेहोशी के चिन्ह आते हैं और रोगी बच जाता है। उपरोक्त स्थान के संबंध में ऐतिहासिक घटना है जो सत्य बताई जाती है। राजस्थान की पश्चिमी के अतिरिक्त अलाउद्दीन खिलजी ने राजा रतन सिंह की पुत्री रतनकुंवर के रूप सौन्दर्य की प्रसंसा सुन रखी थी। रूप सौन्दर्य में अद्वितीय रूपकुंवर को पदमिनी ही कहा जाता है। अत: उसने इस स्थान पर चढ़ाई कर दी। सात पुत्रों और एक पुत्री के पिता राजा रतनसिंह ने अलाउद्दीन खिलजी से लोहा लेने में ही अपना हित समझा। अलाउद्दीन की विशाल सेना के समक्ष एक सामान्य राजा कहां तक लड़ सकता था, अत: रत्नसिंह के सातों राजकुमार तथा स्वयं रत्नसिंह केशरिया बाना पहनकर युद्ध में काम आये। पुत्री रत्नकुंवर ने पृथ्वी मां से प्रार्थना की और वह उसी स्थान पर पृथ्वी में समा गई। रनवास की स्त्रियों ने जौहर किया और वहीं जल गईं। इस युद्ध की सत्यता को प्रमाणित करने वाला हजीरा जो हजारों सौनिकों के मरने की स्मृति स्वरूप बनाया जाता है। आज भी मरसैनी के आगे रतनगढ़ मार्ग पर बना हुआ है। जहां रत्नसिंह की तोपों से अलाउद्दीन खिलजी के सैनिक मारे गए थे। वहीं राजपुत्री रतनकुंवारी देवी के रूप में आज भी पूजी जाती हैं। जहां सभी दर्शनार्थियों की इच्छाएं पूर्ण होती हैं। तथा उनके सातों भाई कुंवर साहब के रूप में पूजे जाते हैं। जिनके स्मारक वन्य शैल पर स्थान-स्थान पर बने हैं। बड़े भाई के नाम पर कुंवंर साहब का बंध लगाया जाता है जो सर्पदंश से रक्षा करता है। अन्य भाइयों के स्थानों पर भी लोगों की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। इस स्थान से दो किलोमीटर पर देवगढ़ का सुरम्य स्थान एवं किला है जहां विशालकाय हनुमान जी की मूर्ति सद्य सिद्धि देने वाली है।







रविवार, 13 मई 2012

नारी उत्पीडऩ समस्या व समाधान

- सुशीला मिश्रा
या देवी सर्वभूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता:।
    नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो: नम:॥

    भारत वर्ष में नारी की शक्ति रूप में पूजा होती है इसलिये यहाँ माँ सम्मानित और श्रद्धेय मानी गई है। सृजन से लेकर पालन कत्री के रूप में आदर्शों को संस्कार देकर वह पूज्य बन गई है परिवर्तन के साथ-साथ समाज के अनेक रूप बदलते गये प्राचीन काल में वैदिक मंत्रों से लेकर यज्ञों में सहयोग देती रही है।
    मुगल काल में पर्दाप्रथा और अशिक्षा ने उसको कुंठित कर दिया पर अंग्रेजी शिक्षा ने वर्तमान समय में उसमें आत्मविश्वास जगाया है वह समाज परिवार और राष्टï्र के प्रगति में अपना योगदान देने का प्रयास करने लगी है। अब अर्थयुग में अपने अधिकारों और कर्तव्यों को पूरा करने के लिये संघर्षों से उलझती हुई मार्ग बना रही है। बच्चों के भविष्य के लिये शिक्षा और स्वास्थ्य बुनियादी आवश्यकता है बिना धनोपार्जन के स्वास्थ्य जीवन समृद्ध परिवार जिसमें डॉक्टर, वकील, प्रोफेसर आदि सहयोग देकर उसे सुधरने का अवसर दे रहे हैं।
    अनेक पर्तों में जीने वाली नारी उत्पीडऩ का शिकार भी बन रही है -
परिचय इतना/ इतिहास यही/ उमड़ी कलथी
मिट आज चली  - महादेवी वर्मा।
समाज स्वयं नहीं समझ पा रहा है कि वह नारी को किस रूप में देखना चाहता है। आदर्शमाता, पत्नी, बहन या मनोरंजन का साधन, वृद्धावस्था में उपेक्षित माता-पिता कभी अतीत, कभी वर्तमान को जोड़कर आँसू बहाते हैं। कुछ अच्छी डिग्रियां लेकर भी घर के बन्धन में सिसकती रहती हैं, बच्चे पैदा करना और रोटी बनाने में उनका जीवन सिमट गया है। शिक्षा का उत्साह दमन चक्रों में फंस गया है।
    नौकरी करके महिलायें धनोपार्जन से परिवार की सहायता करना चाहती हैं परन्तु कभी मार-पीट कर उन्हें बन्द कर दिया जाता है कभी दहेज के कारण जला दी जाती है, पुलिस रुपया लेकर आत्महत्या का केस बना देता है पर कोई नहीं पूछता आत्महत्या का कारण क्या है ? दण्ड से मुक्त व्यक्ति अपने को निर्दोष घोषित करता है।
    जो घर के बाहर निकलती हैं उन्हें बदचलन, चरित्रहीन कहकर लोग अपने को संतुष्टï करते हैं। विधवाओं की दशा और भी दयनीय है घर के भीतर उनका उत्पीडऩ और भी संघर्षशील है। आदर्शों की बात करने वाले उसे मनोरंजन का साधन बना देते हैं यह वैश्या बनाकर उसको बेचते और खरीदते हैं। दलित महिलाओं की स्थिति तो और भी भयानक है। गरीबी और अशिक्षा के कारण वह नगरों और देहातों में काम करने के कारण पूंजीपतियों और व्यापारियों के द्वारा सतायी जाती हैं उनको कम सुविधायें प्राप्त होती हैं और आवाज उठाने पर कठोर दण्ड के साथ शारीरिक उत्पीडऩ भी सहना पड़ता है। शिक्षा बहुत मंहगी हो गई है अब ये डोनेशन नोमनेशन और प्रमोशन के घेरे में फंस गई हैं। विद्यालय दुकान बन गये हैं जहां शक्तिशाली और रईस घरों के बच्चे सुख भोगते हैं और रैगिंग आदि से पथभ्रष्टï हो जाते हैं, यह कैसा भविष्य बनाये गये ईश्वर ही जानें। गरीब बच्चों के लिये शिक्षा साक्षतर पर अधिक बल दे रही है। स्कूलों की हालत जर्जर है वातावरण प्रदूषित है पर अध्यापक, अध्यापिकाओं का वेतनमुक्त हाथ से सरकार देकर उनसे कर्तव्य कराने में असफल है। बी-एड करके नौकरी को लड़के-लड़कियां भटक रहे हैं। प्राइवेट स्कूल में चार-पाँच सौ की नौकरी करके कभी शिक्षा, कभी अपनी डिग्रियों को देखते है, यह कैसा मजाक उनके साथ हुआ है। 'जीवन में छात्र चौदह वर्ष न्यौछावर करके भटक रहा है न रोटी का पता है न देहरी का पता है। कहां वह सहारा पायेगा क्योंकि वह शिक्षाविद् है वर्तमान शिक्षा की उपज है।Ó वर्तमान समय में हमें बुनियादी चरित्र को जिसमें शिक्षा स्वास्थ्य और मानसिक विकास पर मुख्य ध्यान देना होगा समाज के सुधार के लिये चरित्र-निर्माण को शिक्षा के साथ ही जोडऩा पड़ेगा तभी यह नारी और बाल उत्पीडऩ से मुक्ति पा सकेंगे। क्योंकि गरीब बच्चे पांच साल की उम्र से कमाऊ पुत्र बन जाते हैं उनको शिक्षा के लिये समय नहीं है और माता-पिता को इसका ज्ञान नहीं है। राष्टï्रीय महिला संस्थान इन्हीं उद्देश्यों को लेकर सन् 1975 से लेकर आज कर संघर्षशील है। अध्यक्ष स्व. श्रीमती प्रमिला श्रीवास्तव ने नारी जागृति में विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में नई ज्योति जगाई थी। उनके पुत्र श्री आदर्श कुमार उसी मशाल को लेकर महिलाओं में संगठन और कर्तव्य निष्ठïा से सहयोग प्रदान कर रहे हैं। हम महिलायें और हमारे बच्चे इस दिशा में उनके आभारी हैं।

सम्पर्क सूत्र
प्रांतीय उपाध्यक्ष- राष्टरीय महिला संस्थानसिविल लाइंस,
उरई - 285001 जिला जालौन (उ.प्र.)
फोन : 05162 - 252371


   
   

   




जीवन साथी के आने से क्या जीवन सुखमयी गुजरेगा



- पंडित राज (एमए)

    हस्तरेखा एक गहन अध्ययन का विषयरहा है हमारे भारत वर्ष में अनेकविद्वानों ने हथेलीपर उभरती आकृतियों के माध्यम सेअनेक भविष्यवाणियां की, जो कि वास्तव मेंअटल सत्य की भांति घटित हुईं। हस्त विज्ञान के महान ज्ञाता कीरो जिन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि वास्तव में मानव के हाथों में अंकित चिन्हों सेउसके आने वाले समयका सही मूल्यांकन किया सकता है।
    विवाह रेखा (Marrige Line) या फिर लगाव रेखा (AffectiomLine) के संबंध में विचार करते समय यह देखनाभी अतिआवश्यकहै कि हाथ किस ग्रह सेप्रभावित है। व अन्य चिन्हों और संकेतों को भी अपनी विचार परिधि में लाना जरूरी है। केवल लम्बी सुन्दर रेखा ही विवाह संबंध या साथी दर्शातीहै, छोटी रेखायें विपरीतसंबंध प्रेम व आकर्षण विवाह करनेकी इच्छा का स्पष्टïी करण करती है।
    बुध क्षेत्रसे यह स्पष्टï अनुमान लगाया जा सकता है है कि विवाह संबंध किस आयु मेंहोगा। विवाह रेखा कनिष्ठïा उंगली के मूल से हृदय के ऊपर की आड़ी रेखाओं को कहा जाता है। यह रेखा हृदय रेखा के नजदीक हो तो यह आयु 15 से 19 व मध्य में हो तो 21से 28 वर्षतृतीयचरण पर हो तो 28 से 35 वर्ष की अवस्था में विवाह या जीवन साथी जिन्दगी में आएगा। सही तौर पर हृदय से कनिष्ठïा के मूल तक 60 वर्ष मान लें व बीच 30 वर्ष उसी के माध्यम से आयु की गणना करें।
    जिस जातक के हाथ में सूर्य पर्वत अधिक प्रबल हो वह जातक युवास्था में कदम रखते ही विवाह कर लेता है। ऐसा व्यक्तिजीवन साथी सुन्दर आकर्षकव तेजस्वी पसंद करता है इसके विपरीत  िमलने पर वह सुखी नहीं रह पाता है। गुरुपर्व अधिक प्रबल होने पर जातक विवाह को अधिक महत्व देता है। ऐसे जातक के हाथ में हृदय रेखा के समीप ही विवाह रेखा अंकित होगी व ऐसे जातक का विवाह छोटी आयु में हो जाएगा। शनि क्षेत्र प्रबल होने पर जातक विवाह को पसंद नहीं करता है धनवान होगा तो उसके दुर्गुण छिपे होंगे वह विवाह से पहले ही कई स्त्रियों से शारीरिक संबंध होंगे ऐसा व्यक्ति निश्चित तौर पर जीवन साथी का चुनाव ठीक तरह नहीं कर पाता है। हाथ में प्रथम लगाव रेखा पत्नी व मध्य आयु में पहुंचते-पहुंचते गहरी हो जाएंगी। शनि पर्व के साथ शुक्र क्षेत्र भी प्रबल हो तो ऐसा जातक दुष्कर्मी व भोग विलासी में लिप्त रहता है।
    बुध पर्वत पर स्पष्टï विवाह रेखा अंकित हो और साथ ही सूर्य रेखा सुन्दरता से गहरी सीधी अंकित हो व विवाह रेखा से एक रेखा निकल कर सूर्य पर्वत पर पहुंच जाये व साथ ही गुरु पर्वत पर क्रास हो तो उस व्यक्ति का विवाह काफी धनवान व प्रतिष्ठिïत जगह पर होगा।
    विवाह रेखा सुन्दरता से अंकित हो और भाग्य रेखा में चन्द्र पर्वत से उभरती हुई एक रेखा (प्रभाव रेखा) शनि रेखा में आकर मिल जाये व साथ ही सूर्य रेखा सीधी व टूटी या छिन्न-भिन्न न हो तो ऐसा व्यक्ति विवाह के पश्चात सम्मानीय व धनवान हो जाता है।
    यदि भाग्य रेखा जीवन रेखा के अन्दर शुक्रक्षेत्र से आरंभ हो तो ऐसा जातक अपने जीवन साथी पर आधारित रहता है। स्त्री हो तो पति पर पति हो पत्नी पर आधारित रहता है। ऐसे जातक का भाग्य ठीक तरह सुखमय नहीं गुजर पाता है। चन्द्रक्षेत्र से प्रभाव रेखा शनि रेखा के साथ-साथ चले तो वह प्रेम संबंध की सूचक होगी। यदि वह रेखा भाग्य रेखा को काटकर प्रथम मंगल क्षेत्र पर पहुंच जाये तो प्रेम घृणा में परिवर्तित हो जाएगा। फलस्वरूप जातक अपना कैरियर चौपट कर लेगा। विवाह रेखा सुन्दरता से स्पष्टï हो व भाग्य रेखा हृदय रेखा पर समाप्त हो व दोनों हेथियों को मिलाने पर दोनों हाथ की हृदय रेखा का आधा चन्द्रमा बनता हो ऐसा जातक सुन्दर स्त्री से प्रेम विवाह (लव मैरिज) करता है। विवाह रेखा का आगे का हिस्सा हृदय रेखा की तरफ झुकाव लिये हो वह शनि रेखा हृदय रेखा पर समाप्त हो उसी जगह प्रथम मंगल क्षेत्र में एक रेखा निकलकर आ जावे व आयु और मस्तक रेखा को काट वह मणिबंध के ऊपर प्रबल के मूल में एक त्रिकोण बन जावे तो जातक एक तरफा मोहब्बत में भ्रमित होता है। वह अपने जीवन का सत्यानाश कर लेता है।
    यदि विवाह रेखा कनिष्ठïा उंगली के मूल में प्रवेश कर जाये तो ऐसा व्यक्ति आजीवन कुंवारा रहता है व शुक्र क्षेत्र से जितनी रेखाएं प्रहार करती होंगी उतने ही परिवार के लोग विघ्न डालेंगे व मंगल क्षेत्र से प्रहार करती हों तो मिलने-जुलने, जलने, ईष्र्या रखने वाले लोग विघ्न डालेंगे।
    यदि विवाह रेखा हृदय रेखा में जुड़ जाये व आगे बढ़ती हुई मंगल क्षेत्र पर उसकी एक शाखा पहुंच जाये तो जल्दी ही उसके जीवन साथी का साथ छूट जाएगा व उसके जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ेगा। जिस जातक के हाथ में विवाह रेखा नहीं है ऐसे जातक को हृदय से संबंधित रोग हो जाएंगे व शनि प्रबल हो साथ ही शुक्र प्रबल हो और लालिमा लिये हो तो ऐसा व्यक्ति वासनात्मक स्थिति में पहुंच जाता है। अगर हृदय रेखा छिन्न-भिन्न हो तो हृदय रोग से मृत्यु तक की संभावना होगी।
    विवाह रेखा पर क्रास, दीप, द्विशारणी हो जाये तो ऐसे व्यक्ति का जीवन विवाह के पश्चात जीवन साथी से तनाव व कलह बना रहेगा। व मंगल क्षेत्र पर मंगल रेखा व आयु के बीच की उध्र्व रेखा टूट जाये या हल्की पड़ जाये या मंगल क्षेत्र से एक रेखा निकल कर विवाह रेखा में मिल जाये तो स्थिति तलाक तक पहुंच जाएगी।
    विवाह रेखा जातक के हाथ में झुकी हुई हो तो उसके जीवन साथी की उससे पहले मृत्यु होगी। पति के हाथ में झुकी हो पत्नी की और पत्नी के हाथ में झुकी हो तो पति का स्वर्गवास पहले होगा।

ज्योतिष रहस्य भ्रम एवं निवारण





    वर्तमान समय में भारतीय ज्योतिष शास्त्र के नाम पर लिखित एवं अलिखित कुछ ऐसी परिभाषायें प्रचलित की जा रही हैं जिसके चलते भारतीय ज्योतिष शास्त्र की गणना एक अन्ध विश्वास के रूप में आने वाले काल खण्ड में की जाने लगेगी - ऐसी संभावना को नकारा नहीं जा सकता - भारतीय ज्योतिष शास्त्र के आधार पर प्रचलित फलित के ज्योतिषाचार्यों, ज्योतिर्विदों और कर्मकाण्डियों के द्वारा एक भ्रम जो बहुत महत्वपूर्ण ढंग से प्रचलित एवं प्रसारित किया जा रहा है वह है कालसर्प योग। राहू और केतु के बीच में समस्त ग्रहों के होने, केतु और राहू के बीच में समस्त ग्रहों के होने से इस योग का फलित किया जा रहा है। कई दवा कम्पनियों द्वारा बड़े - बड़े सर्पों के बीच में श्री शिवजी जी मूर्ति जहर उगलते सैकड़ों मुखों वाले सर्पों के फोटो जो देखते ही भय उत्पन्न करते हैं, प्रचारित किये जा रहे हैं और उस काल सर्प-योग की शांति के लिये विशिष्टï स्थान विशिष्टï पूजा का निर्देश जिसमें हजारों लाखों रूपये का खर्चा होता है, वह निर्धारित स्थान पर जमा करने को जातकों को पहुँचाया जा रहा है। यह एकदम से ज्योतिष शास्त्र के फलितकारों की अज्ञानता को ढंकने का कुप्रयास है क्योंकि जन्म पत्रिका का अवलोकन करने परजब समझ में गोचरफल महादशा फल या कुण्डली के भावों का निर्धारण न आवे तो पितृ दोष - कालसर्प योग या मारकेश बताकर जातक को धमरा कर दिया जाता है।
    कालसर्प योग का वर्णन एवं समाधान आज से 20 वर्ष पूर्व तक किसी भी बड़े ज्योतिषाचार्य या स्थापित पुरातन आचार्यों वराहमिहिर, जैमिनी आदि ने नहीं किया यहां तक कि राहू एवं केतु की गणना गोचर एवं अष्टïकवर्ग में भी स्थान नहीं दिया गया है। राहू एवं केतु की गणना क्योंकि दशा महादशा में की गई इसलिये यह भी नहीं माना जा सकता कि महर्षि पाराशर आदि आचार्यों को राहू और केतु के अस्तित्व का ज्ञान नहीं था। जहाँ तक मेरा मत है कि राहू और केतु की स्वतंत्र सत्ता को इन आचार्यों ने नहीं माना एवं छाया ग्रहों के रूप में दूसरे ग्रहों का प्रभाव लेकर अपना प्रभाव दिखाने की व्यवस्था दी गई है। इस संबंध में महर्षि पाराशर के वृहत्पाराशर होरा शास्त्र के 34 वें अध्याय का निम्नलिखित श्लोक देखें :-
    ''यदभावेश युतौ-वापि यदभाव समागतौ।
      तत् तत् फलानि-प्रबलौ प्रदिशेतां तमौ ग्रहों॥ÓÓ
    ''यदि केन्द्रे त्रिरोणे वा निवेसतां तमौ ग्रहौ।
      नाथे नान्यतरेणाढयौ दृष्टïौ वा योग कार कौ॥ÓÓ
अर्थात् राहू और केतु ये दोनों ग्रह जिस भावेश के साथ अथवा जिस भाव में रहते हैं तद्नुसार ही फल करते हैं। राहू और केतु केन्द्र में हों और त्रिकोणपति से युत या दुष्टï हों अथवा त्रिकोण में हों अथवा केन्द्रपति से युत या दुष्ट हों तो भी ये योग धारक रहते हैं।
    इसलिये इन छाया ग्रहों के राजयोग का फल अन्य ग्रहों की भाँति के स्वामित्व द्वारा नहीं किया जाता क्योंकि इनका किसी भी राशि का स्वामित्व नहीं है। राहू और केतु की परतंत्रता के कारण है अष्टïकवर्ग - होरा पद्धति (दिन की काल होरा) मुहूर्त एवं फलित में नहीं किया जाता। इनका अपना प्रभाव व इनके लिये प्रचलित एवं परम्परागत रूप से शनिवत राहू एवं कुजवत् केतु (मंगल) की तरह किया जाता है। यवनाचार्य के मतानुसार राहू केतु के शुभफल कुण्डली एवं गोचर (चन्द्रमा से) में 1-3-5-7-8-9 तथा 10 स्थानों में शुभ, बाकी में अशुभ होता है।
    उपरोक्त परिभाषा एवं विवरण से ऐसा कहीं पर स्पष्टï नहीं होता कि यह ग्रह इतने वली हैं कि इनके बीच में सप्त ग्रह के आने से कुण्डली के जातक का नुकसान या नाश होता है।
    लेखक का ऐसा अनुभव है कि बड़े-बड़े राष्टï्राध्यक्षों-राजनीतिक नेताओं, फिल्मकारों, जनरलों (मोक्ष दायान) की कुंडली में यह योग रहा और उन्होंने प्रसिद्धि के कीर्तिमान स्थापित किये। उदाहरण के लिये पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय जवाहरलाल नेहरू की कुंडली प्रस्तुत है :-

कुंडली जवाहरलाल नेहरू




श्री कृष्ण ज्योतिष अनुसंधान केन्द्र शक्तिपुरम शिवपुरी के संस्थापक आचार्य पुरुषोत्तम दास गुप्त (पी.दास) के शोध में वास्तविक अर्थ यह है कि ज्योतिष के महान आचार्यों ने प्रकृति एवं ज्योतिष का एक बड़ा गहरा रिश्ता स्थापित करके सूर्य को केन्द्र मानकर एवं 6 ग्रहों को जो पृथ्वी की आकाशगंगा में सूर्य की आकर्षण शक्ति एवं अपनी स्वयं की ऊर्जा के आधार पर अपनी धुरी पर घूम रहे हैं एवं सूर्य के साथ प्रभाव लेकर पृथ्वी की व्यवस्था को प्रकाश एवं ऊर्जा के माध्यम से संचालित कर रहे हैं एवं विशिष्ट नक्षत्रों से गुजरते हुये अपना प्रभाव दिखाते हैं। उसको ही परिभाषित किया है। पंचांगों में प्रतिदिन की कालहोरा का आधार लें तो सूर्य से शनि तक ढाई घटी अर्थात 1-1 घंटे की 7 होरा प्रतिदिन मार्गों के लिये ली जाती है। इसमें कहीं भी राहू केतु को स्थान नहीं है।
    प्रत्येक ग्रह की दिशायें निर्धारित है किन्तु राहू केतु की कोई दिशा निर्धारित नहीं है। जिस प्रकार से पाराशरी पद्धति में दशाओं के लिये राहू केतु की स्थिति ली गई है उसी प्रकार से हथिया भारत में प्रत्येक दिन के लिये राहू काल कुबेला का वर्णन है। किन्तु किसी भी प्रकार से राहू एवं केतु जो वर्तमान में मेष एवं तुला राशि में क्रमश: चल रहे हैं और एक वर्ष के लगभग ये काल सर्प योग बारबार 3 चार माह के लिये भागा 15 दिनों के लिये जब चन्द्रमा वृश्चिक से मीन राशि तक भ्रमण करता है यह योग नहीं रहता, तो क्या इस वर्ष विश्व में जन्म लेने वाले लगभग 30 करोड़ जातक दुखी परेशान एवं असफल रहेंगे, क्या 2004 में सन्दर्भित स्थिति के जातक दुर्भाग्यशाली हैं।
    इस कालसर्प योग पर शोध करने पर ज्ञात हुआ कि भारतीय ज्योतिष में प्रत्येक ग्रह की आदमी के जीवन काल के महत्वपूर्ण पक्षों के निर्माण के लिये ग्रहों की आयु का प्रमाण किया गया है। बृहस्पति 16 वर्ष सूर्य 22 वर्ष चन्द्रमा 24-25 वर्ष मंगल 28 वर्ष बुध 30 वर्ष शुक्र 32 वर्ष शनि 36 वर्ष राहू 42 वर्ष केतु 48 वर्ष रहता है।
    जब जब भी कालसर्प योग वाले जातकों को लेखक ने परेशान एवं दुखी एवं असफल होते देखा है वह वर्ष खंड या तो 42 से 48 वर्ष राहू का समय, 48 से 54 वर्ष केतु के समय देखा है। लेख की एक प्रसिद्ध भविष्यवाणी जो पूर्व प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिंहराव के बारे में एक दैनिक समाचार पत्र में छपी थी उसमें एक श्लोक का संदर्भ देकर यह कहा गया था कि श्री नरसिंहराव कांग्रेस को डुबा देंगे - उसका कारण यह था कि उस समय श्री नरसिंहराव की राहू की महादशा प्रारंभ हुई थी (दिनांक 25.05.1995 से) और उसी राहू की अन्तर्दशा चल रही थी। श्लोक के साथ नरसिंहराव की कुंडली भी दी जा रही है :-

कुंडली
पी.वी. नरसिंहराव


द्वितीय भाव में राहू

श्लोक
    धन गते रविचन्द्र विर्मदने
    मुखतांकित भावयुतो भवेत्
    धन विनाशकरो हि दरिद्रतां
    स्व सुदृदां न करोति वचोग्रहाम
अर्थात् - जो धन स्थान में राहू हो तो वह पुरुष मुखरता से अंकित भाव से युक्त हो तथा धन का नाश करने वाला दरिद्री हो और अपने मित्रों का कथन न मानने वाला होता है।
अष्टïम स्थान पर राहू की दृष्टिï - 
निधनवेश्वनि राहू निरीक्षते वंशहानि बहुदुखितो नर:।
व्याधि दु:ख परिपीडि़तोऽथवा नीचकर्म कुरतेऽत्र जीवित:॥
    अष्टïम भाव पर राहू की दृष्टिï हो तो वंश हानि और वह पुरुष बहुत दुखी होता है। व्याधि के दु:ख से पीडि़त हो और अपने जीवन में नीचकर्म करने वाला होता है।
    उपरोक्त 25-5-95 के बाद चुनावों से पूर्व नरसिंहराव ने अर्जुनसिंह एवं स्व. महाराज माधवराव सिंधिया एवं वरिष्ठï नेताओं पर हवालाकाण्ड एवं अन्य आरोप लगाकर पार्टी से निकाला एवं कांग्रेस का चुनाव में सफाया करा दिया।
    लेखक का राहू और केतु के बारे में स्पष्टï रूप से यह मानना है कि जि मार्ग पर पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है या कहिये कि सूर्य पृथ्वी की परिक्रमा करता है, वह क्रांतिवृत एवं चन्द्रमा का पृथ्वी के चारों ओर का मार्ग वृत (अक्ष) ये दोनों जिन बिन्दुओं पर एक दूसरे को काटते हैं उनमें से एक का नाम राहू और दूसरे का नाम केतु है। आकाश के उत्तर की ओर बढ़ते हुये चन्द्रमा की कक्षा जब सूर्य को काटती है तब उस सम्पात बिन्दु को राहू और दक्षिण की ओर बढ़ते हुए चन्द्रमा की कक्षा जब सूर्य की कक्षा को पार करती है उस सम्पात बिन्दु को केतु कहते हैं।
    उपरोक्त परिभाषा से स्पष्टï है कि ये दोनों सम्पात बिन्दु हैं और इसी आधार पर जब सभी ग्रह परिक्रमा पक्ष पर इन बिन्दुओं के बीच में आते हैं तब उसी को काल सर्प योग बोला जाता है। महत्वपूर्ण बात यह है कि जब भी व्यक्ति के पुण्यों का फल समाप्त होकर संचित पाप उदय होते हैं जो इसी जीवन में किये हुये होते हैं उस समय जब भी राहू केतु की दशा अन्तरदशा या गोचर विपरीत आता है तब व्यक्ति भय एवं भ्रम का शिकार होता है। इस समय का साधारण उपचार है। मूलत: भय निवारण हेतु अध्यात्म ज्योतिष में श्री हनुमान जी की उपासना से ज्ञान प्राप्त होता है। वहीं राहू केतु को धार्मिक आधार पर नष्टï करने का कार्य श्री विष्णु ने मोहिनी रूप रख कर किया था।
    अत: विष्णु को प्रिय चंदन (सफेद) की माला को धारण करना एवं अगर मृत्यु भय हो तो श्री शिव स्त्रोत चालीसा का पाठ या रुद्री के पाठ के साथ सोम प्रदोष या चतुर्दशी को रुद्राभिषेक करवाने से सर्व प्रकार की शांति होती है।
    अंत में पाठकगणों-विद्वानों से यह विशेष अनुरोध है कि कालसर्प योग या आंशिक कालसर्प योग के भ्रम में फंसकर अपना जीवन नष्टï न करें। ''प्रारब्ध पहले बना पीछे बना शरीरÓÓ यह सनातन धर्म की स्थापित मान्यता है। अपने इष्टïदेव की पूजा एवं सत्कर्म ऐसे विपरीत समय में करें, ऐसा समय दो या तीन वर्ष के लिये अवश्य प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में आता है। अत: उपरोक्त उपचार या साधन से स्वस्थ एवं प्रसन्न होकर उत्साह पूर्वक जीवन यापन करें।



पुरुषोत्तमदास गुप्त 'पी.दास
शक्तिपुरम, (खुड़ा), शिवपुरी म.प्र.
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