रविवार, 13 मई 2012

छत्तीसगढ़ के जीवंत इनसाक्लोपीडिया - डॉ. विनय कुमार पाठक


 - राजकुमार सोनी

छत्तीसगढ़ी भाषा, साहित्य और संस्कृति पर आधारित अनेकानेक स्थापनायें प्रदान कर डॉ. विनय कुमार पाठक जीवंत इनसाइक्लोपीडिय़ा के रूप में अभिहित हैं। स्वतंत्रता के पश्चात छत्तीसगढ़ी पत्रकारिता को प्रोन्नत करके, प्रयास प्रकाशन के द्वारा मंच और प्रकाशन का पट अनावृत करके, छत्तीसगढ़ी कविता में मौलिक सांस्कृतिक उपमानों व प्रतीकों का उपयोग करके, छत्तीसगढ़ी लोककथात्मक कहानियों को समृद्ध करके, छत्तीसगढ़ी में समीक्षा संस्मरण और जीवनी का प्रवर्तन करके, छत्तीसगढ़ी शब्दों और स्थान -नामों पर प्रमाणिक शोध करके, छत्तीसगढ़ी साहित्य का क्रमबद्ध इतिहास लिख करके, लोकसाहित्य पर महत्वपूर्ण कार्य करके, लोक सांस्कृतिक कार्यक्रमों के द्वारा जन-मन में लोकजीवन व लोकसंगीत का मिठास घोलकर जिस एक व्यक्ति ने अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया है, उसे लोग डॉ. विनयकुमार पाठक के रूप में जानते हैं। इन्होंने छत्तीसगढ़ी भाषा, साहित्य और संस्कृति में शोध और समीक्षा के द्वारा जहां नव्यालोचन का पथ प्रशस्त किया है, वहीं हिन्दी और भाषा विज्ञान में पी-एच.डी. व डी. लिट् की दोहरी उपाधि प्राप्त कर अकादमिक ढंग से अखिल भारतीय स्तर पर कीर्तिमान स्थापित किया।  इन्होंने छत्तीसगढ़ी में स्वत: कार्य किया और अन्यान्य लोगों को प्रेरित कर एक युग को प्रवाहित किया। इस आधार पर ये छत्तीसगढ़ी साहित्य के युगप्रवर्तक कहलाते हैं। इस दृष्टिï से इनके छत्तीसगढ़ी प्रदेश पर जहां रविशंकर विश्वविद्यालय रायपुर में पी-एच.डी. का कार्य हुआ है, वहीं राँची विश्वविद्यालय राँची (झारखण्ड) द्वारा डी. लिट् का कार्य हुआ है। इस तरह डॉ. पाठक देश के ऐसे प्रथम व्यक्ति हैं जिनके जीवन काल में पी-एच.डी. और डी.लिट् का कार्य हुआ है। छत्तीसगढ़ी शब्दकोश में आपने गुरुदेव डॉ. पालेश्वर प्रसाद शर्मा व डॉ. रमेशचन्द्र महरोत्रा के साथ सह संपादन सहयोग भी दिया है। इस ग्रंथ को विलासा कला मंच ने प्रकाशित किया है। डॉ. पाठक विलासा कला मंच के संरक्षक भी हैं। आज सभी अपने लिए करते हैं लेकिन डॉ. पाठक ही ऐसे व्यक्ति हैं जो दूसरों के लिए संकलित होते हैं। इनके इस अवदान को पंडित द्वारिका प्रसाद तिवारी 'विप्रÓ ने भारतेन्दु साहित्य समिति द्वारा प्रकाशित स्मारिका में अभिव्यक्त किया है जो ''छत्तीसगढ़ी साहित्य को डॉ. विनय पाठक की देनÓÓ (1981) में प्रकाशित है। छायावाद के प्रवर्तक पंडित मुकुटधर पाण्डेय छत्तीसगढ़ी काव्य में प्रेरणा स्रोत के रूप में जिनके महत्व को स्वीकारा है, उनमें डॉ. पाठक एक हैं। छत्तीसगढ़ी के महाकवि स्व. कपिलनाथ कश्यप ने छत्तीसगढ़ी में  ''श्रीरामकथाÓÓ महाकाव्य के प्रणयन के लिए डॉ. पाठक के प्रोत्साहन का स्मरण करते हैं। इसके साथ उनके समकालीन और बाद की नयी पीढ़ी को उनके युगप्रवर्तनकारी प्रदेय को स्वीकारती ही है। स्वतंत्रता के बाद इस दिशा में सर्वाधिक कार्य करने व कराने वालों में डॉ. पाठक एकमेव हैं। डॉ. पाठक का छत्तीसगढ़ी प्रदेश महत्वपूर्ण है, उनकी हिन्दी सेवा भी कम उल्लेखनीय नहीं। हिन्दी प्राध्यापक के रूप में अत्यन्त लोकप्रिय व आदर्श आचार्य के रूप में अभिहित डॉ. पाठक के शोध निर्देशन में तीन दर्जन लोगों ने पी-एच.डी. की उपाधि प्राप्त की है। शताधिक कृतियों के लेखन, संपादन व प्रकाशन के साथ महत्वपूर्ण शोध आलेखों का प्रकाशन हिन्दी की धरोहर है। डॉ. पाठक देश के अनेक विश्वविद्यालयों में विद्वान वक्ता, स्रोत पुरुष व पी-एच.डी. तथा डी.लिट् के परीक्षक के रूप में आमंत्रित किए जाते हैं। आपको 18 सितम्बर 2002 को दिल्ली में आयोजित विश्व हिन्दी सम्मेलन में सहस्राब्दि हिन्दी सेवी राष्टï्रीय सम्मान से अलंकृत किया गया है तथा ऐतिहासिक साहित्यिक ग्रंथों में इनके प्रदेश की प्रस्थापना व परिचय की प्रतिष्ठïा पाना है। समाज सुधार में अग्रणी सत्यार्थ प्रकाश, कपिलनाथ कश्यप : व्यक्तित्व-कृतित्व, बृजलाल शुक्ल: व्यक्तित्व-कृतित्व के साथ इनकी महत्वपूर्ण समीक्षात्मक कृति पंत के गीत का संगीतशास्त्र विश्व पुस्तक मेले में जनवरी 2002 को लोकार्पित हुई जिसमें संगीत का विवेचन डॉ. कावेरी दाभडकर ने किया है। इसी क्रम में पं. मुकुटधर पाण्डेय पर एक ग्रंथ प्रकाशनाधीन है तथा महिला लेखन पर स्वतंत्र आलोचनात्मक कृति नयी स्थापना के रूप में सामने आई है।
    हिन्दी व्यंग्य कर्म एवं समकालीन परिदृश्य का संपादन करके व्यंग्य के क्षेत्र में आपने अभिनव कार्य किया है। जो शोध-संदर्भ के रूप में स्वीकृत है इसके बाद भी अनेक हिन्दी और छत्तीसगढ़ी के पक्ष हैं जो कलेवर और सीमा की दृष्टिï से छूट गये हैं।

पाठक जी का जन्‍म 11 जून 1946 को बिलासपुर में हुआ और अध्‍ययन भी बिलासपुर में ही हुआ, डॉ. विनयकुमार पाठक जी नें एम.ए., हिन्‍दी एवं भाषा विज्ञान में दो अलग अलग पी.एच.डी. व हिन्‍दी एवं भाषा विज्ञान में दो अलग अलग डीलिट की उपाधि प्राप्‍त की है. इनके निर्देशन में कई पीएचडी अब तक हो चुके हैं. इनको लेखन के लिए प्रेरणा इनके बड़े भाई डॉ. विमल पाठक से मिली है । डॉ. विनय कुमार को इनके पी.एच.डी. एवं डी. लिट प्राप्‍त करने से साहित्‍यजगत में राष्‍ट्रव्‍यापी ख्याति प्राप्‍त हुई। 
पाठक जी छत्तीसगढ़ी और हिन्दी, दोनों में लिखते हैं। इनकी कृतियां हैं - छत्तीसगढ़ी में कविता व लोक कथा, छत्‍तीसगढ़ी साहित्‍य और साहित्‍यकार, बृजलाल शुक्‍ल व कपिलनाथ कश्‍यप - व्‍यक्तित्‍व एवं कृतित्‍व(दोनो अलग अलग ग्रंथ), स्‍केच शाखा (जीवनी), खण्डकाव्य - सीता के दुख तथा छत्तीसगढ़ी साहित्य और साहित्यकार संस्मरण जीवनी, आदि लगभग 70 ग्रंथ के अलावा इन्‍होंनें अनेक निबंध लिखे हैं। इनकी छत्तीसगढ़ी लोक कथा (1970 ) छत्तीसगढ़ के स्थान-नामों का भाषा वैज्ञानिक अध्ययन (2000 ) बहुत ही महत्वपूर्ण है। पाठक जी ने राष्‍ट्रीय एवं अतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर पर अनेकों शोध पत्र पढें हैं. छत्‍तीसगढ़ी भाषा साहित्‍य एवं संस्‍कृति को अकादमिक ढंग से स्‍थापित करने के परिपेक्ष्‍य में शताधिक साहित्तिक, सांस्‍कृतिक व सामाजिक संस्‍थाओं से उन्‍हें लोकभाषा शिखर सम्मान सहित सम्मान और पुरस्कार मिले है।पाठक जी प्रदेश के शिखर शोध निदेशक हैं, इन्‍होंनें दो दर्जन शोधार्थियों को छत्‍तीसगढ़ी भाषा/साहित्‍य की विभिन्‍न विधाओं में पी.एच.डी. करवाया है. रांची विश्‍वविद्यालय से इनके स्‍वयं के व्‍यक्तित्‍व एवं कृतित्‍व में शोधार्थियों द्वारा डी.लिट. किया जा चुका है.  
संप्रति - शासकीय कन्‍या स्‍नातकोत्‍तर महाविद्यालय, बिलासपुर में हिन्‍दी के विभागाध्‍यक्ष.

संपर्क : डॉ. विनय कुमार पाठक
निदेशक प्रयास प्रकाशन
सी 62, अज्ञेय नगर
बिलासपुर
मेरे ध्‍यान में आदरणीय डॉ. विनय कुमार पाठक की अधिकतम समीक्षात्‍मक लंबी हिन्‍दी गद्य रचनांए ही हैं जिनके अंशों को अवसर मिलने पर यहां प्रस्‍तुत करने का प्रयास करूंगा. आज उनके जन्‍म दिन पर उन्‍हें शुभकामना देते हुए उनके द्वारा रचित यह छत्‍तीसगढ़ी गीत प्रस्‍तुत कर रहा हूं -
जिहॉं जाबे पाबे, बिपत के छांव रे
हिरदे जुडा ले आजा मोर गॉंव रे .
खेत म बसे हवै करा के तान
झुमरत हावै रे ठाढ़े-ठाढ़े धान.
हिरदे ल चीरथे रे मया के बान
जिनगी के आस हे रामे भगवान .
पिपर कस सुख के परथे छांव रे
हिरदे जुडा़ ले, आजा मोर गांव रे.
इंहा के मनखे मन करथे बड़ बूता
दाई मन दगदग ले पहिरे हें सूता.
किसान अउ गौंटिया, हावय रे पोठ
घी-दही-दूध पावत, सब्‍बे रे रोठ.
लेबना ला खांव के ओमा नहांव रे
हिरदे जुडा़ ले, आजा मोर गांव रे.
हवा हर उछाह के महमहई बगराथे
नदिया हर गाना के धुन ला सुनाथे.
सुरूज हर देथे, गियान के अंजोर
दुख ला भगाथे, सुघ्‍घर वंदा मोर.
तरई कस भाग चमकय, का बतावौं रे
हिरदे जुडा़ ले, आजा मोर गांव रे.
मेहनत अउ जांगर जिहां हे बिसवास
उघरा तन, उघरा मन, हावै जिहां आस.
खेत म चूहत पछीना के किरिया
सीता कस हावै, इंहां के तिरिया.
ऐंच-पेंच जानै ना, जानैं कुछ दांव रे
हिरदे जुडा़ ले, आजा मोर गांव रे.

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आगे बढ़ते चलो ...!




- राजकुमार सोनी

    पश्चिम के प्रसिद्ध विचारक इमर्सन का कथन है -  'मुझे नरक में भेज दो, मैं अपने लिए वहीं स्वर्ग बना लूँगा।Ó इमर्सन के पास नरक को स्वर्ग में बदलने का नुस्खा था। बड़ा अद्भुत और अजब हैं यह विचारों से बना है। एक को गिलास आधा खाली दिखाई देता है और दूसरे को आधा भरा। पहले की थिकिंग निगेटिव है और दूसरे की समझ पोजिटिव है। गिलास तो जैसा है वैसा ही है। उसके प्रति हमारे विचार हमारी जीवन शैली और विचार शक्ति को प्रकट करते हैं। मनुष्य जैसा सोचता है वैसा बनता है- यदि प्रयत्न ठीक दिशा में करता रहे। सोच और विचार स्वर्ग को नरक बना सकते हैं तो नरक को स्वर्ग में बदल सकते हैं।
    विचारों की विकृति ही दुर्भाग्य है एवं विचारों की सुकृति ही सौभाग्य है। सच तो यह है कि मनुष्य के भाग्य का निर्माण करता है। बल्कि यह कहना अधिक उपयुक्त है कि विचारों के माध्यम से स्वयं मनुष्य अपना भाग्य लिखा करता है। एक सामान्य सिपाही नेपोलियन बोनापार्ट बन जाता है। गरीब फोर्ड संसार का शीर्षस्थ धनपति बन जाता है। शक्ल से भद्दा (कुरूप) सामान्य वकील अमेरिका का राष्टï्रपति बनता है। विचारों की परिणति ही का दूसरा नाम भाग्य है और इसका विधायक मनुष्य स्वयं ही है।
    अपने भाग्य का निर्माता होने पर भी मनुष्य अपनी वैचारिक त्रुटियों के कारण ही दुर्भाग्य का शिकार बनता है क्योंकि वैचारिक विकृति अपने को क्षुद्र, तुच्छ एवं हेय मानने से ही आरंभ होती है। उसके व्यक्तित्व पर उसके विचार हावी हो जाते हैं और जन-जन को यह जानकारी देते रहते हैं कि यह व्यक्ति निराशावादी तथा गिरे हुए विचारों का है। अत: हम अपने को जिस प्रकार का बनाना चाहते हैं, उसी प्रकार के विचारों का सृजन हमें करना चाहिए। विचारों का प्रभाव निश्चित रूप से आचरण पर पड़ता है। हमारे आचरण हमारे विचारों का क्रियात्मक रूप है जिस दिशा में विचार चलते हैं हमारे शरीर और उसकी क्रियायें भी उसी दिशा में गतिशील हो जाती हैं। यही कारण है कि सभी मनुष्यों को विचार, बुद्धि और विवेक प्राप्त होने पर भी किसी का झुकाव विज्ञान की ओर होता है तो कोई व्यापार की तरफ झुकता है।
    यदि ऊँचे उठने, आगे बढऩे और सफलता प्राप्त करने का लक्ष्य हो तो अपने विचारों को भी वैसा ही विकसित करना चाहिए। यदि जीवन में सफलता, समाज में प्रतिष्ठïा और आत्मा में संतोष प्राप्त करना है तो  सबसे पहले विचारों, भावनाओं और चिन्तन को आशावादी और उदार बनाना चाहिए। हमें विचार शक्ति के महत्व को जानकर जीवन में ढालना चाहिए। अस्त-व्यस्त विचारों के कारण बहुधा लोगों को दुखी होते देखा जा सकता है। काल्पनिक चिंतायें उन्हें घेरे रहती हैं। विचारों पर नियंत्रण न कर पाने से ही अनचाही अनपेक्षित दिशाओं में हमारे विचार भटकते रहते हैं। अस्थिर चित्त से कोई काम भली-भांति सम्पन्न नहीं किया जा सकता है।
    हमें उपयोगी और आशावादी विचारों को विकसित एवं स्थापित करना चाहिए। हमें अभ्यास से अपने विचारों को साधना चाहिए। पर अपनी सीमा भी जानें। संसार में सभी वस्तुएं, सफलताएं सभी को नहीं मिल पाती हैं। शिव-संकल्प कर आगे बढ़े भगवान पर भरोसा रखें। सफलता आपके चरण चूमेगी। असंभव शब्द मूर्खों के शब्दकोश में ही पाया जाता है। शिव संकल्प कल्याण मार्ग की तरफ आपको चलाता है - बढ़ाता है और लक्ष्य पर पहुंचाता है।

शनिवार, 12 मई 2012

हिन्दी नवगीत आंदोलन में ग्वालियर का योगदान


-  राजकुमार सोनी

    'नवगीत न सिर्फ नयेपन की तलाश है और न कोई कविता का नया संस्करण है, अपितु यह एक स्वतंत्र विधा है। इसका सर्वप्रथम नामोल्लेख फरवरी 1958 में प्रकाशित राजेन्द्र प्रसाद सिंह के 'गीतांगिनी नामक काव्य-संग्रह में मिलता है। इस संग्रह के गीत अनेक वर्गों में विभक्त हैं और उनका विभाजन अवैज्ञानिक है परन्तु इन गीतों को दिया जाने वाला नाम 'नवगीत पर्याप्त लोकप्रिय हो गया। यद्यपि उस समय कवि ने यह नाम छायावादी और छायावादोत्तर गीतों से अपने काव्य को पृथकता देने के लिए अपनाया था, किन्तु जल्दी ही यह स्पष्टï हो गया कि 'नवगीत एक नई विधा है जो लोक चेतना, लोक संस्कृति, जातीय संस्कार और जातीय सौन्दर्य बोध से जुडऩे की अपनी निजी विशेषता के आधार पर विकसित हुई है।
    नवगीत विधा मानस-हृदय के संवेगों को व्यक्त करने की आकुलता का परिणाम है। जब जब मानव अपने मन में सुख-दुख, राग-विराग की संवेदना को व्यक्त करने के लिए बेचैन हुआ, तब-तब गीत का जन्म हुआ। नवगीत इसी प्रकार की एक कड़ी है। नवगीत के आंदोलन में ग्वालियर के साहित्यकारों का बड़ा महत्वपूर्ण योगदान है। नवगीत आंदोलन में ग्वालियर के साहित्यकारों ने एक नई ऊर्जा प्रदान की जिससे नवगीत विधा का सृजन व संवर्धन खूब हुआ।
    जब मानव - मन किसी सौन्दर्य के खण्ड से, किसी राग के बोध से अथवा किसी सत्य के कोण से छू जाता है, वहीं गीत की भूमि होती है। लोक जीवन के रस से सिंचित होने का प्रयास नवगीत में ही दिखाई देता है। यही इनका महत्व है।
    राजेन्द्र प्रसाद सिंह ने नवगीत के पाँच तत्वों का उल्लेख किया है - जीवन दर्शन, आत्मनिष्ठा, व्यक्तित्व बोध, प्रीति तत्व और परिसंचय।
    डॉ. शम्भुनाथ सिंह ने नवगीत की परिभाषा करते हुए लिखा है - 'नवीन पद्धति और विचारों के नवीन आयामों तथा नवीन भाव-सरणियों को अभिव्यक्त करने वाले गीत जब भी और जिस युग में लिखे जाएंगे, नवगीत कहलाएंगे।Ó
    एक ओर जहाँ बालस्वरूप 'राहीÓ ने आधुनिकता को नवगीत की अनिवार्य शर्त माना है वहीं रवीन्द्र 'भ्रमरÓ ने उसमें हार्दिकता तथा अनुभूति की प्रधानता को आवश्यक माना है। नवगीत की रचनाओं का एक विहंगम पर्यावलोकन यह सिद्ध कर देता है कि उनमें लोकोन्मुखता का भाव अत्यन्त प्रबल है। इसी विशेषता ने नवगीत के स्वरूप को सजाया-संवारा है और उसे एक नई विधा के रूप में प्रतिष्ठिïत किया है।
    एक ओर जहां धर्मवीर भारती, शंभुनाथसिंह, नरेश मेहता, जगदीश गुप्त, ठाकुर प्रसाद सिंह, रामदरश मिश्र, रवीन्द्र भ्रमर, राजेन्द्र प्रसाद सिंह तथा चंद्रदेव सिंह आदि साहित्यकारों ने नवगीत विधा को ख्याति दिलाई वहीं दूसरी ओर ग्वालियर के वीरेन्द्र मिश्र, आनंद मिश्र, मुकुटबिहारी सरोज, प्रकाश दीक्षित, डॉ. पूनमचन्द्र तिवारी, महेश अनघ, रामप्रकाश अनुरागी, राजकुमारी रश्मि, डॉ. अन्नपूर्णा भदौरिया, परशुरामशुक्ल विरही, विद्यानंदन राजीव, ओमप्रभाकर , दामोदरदास शर्मा, शत्रुघ्न दुबे आदि ने नवगीत आंदोलन में जबरजस्त भूमिका निभाई।
    वीरेन्द्र मिश्र का नाम नवगीत काव्यान्दोलन के प्रवर्तकों में से एक है। नवगीत का एक काव्यधारा के रूप में विकास छठवें दशक में हुआ था और यह एक प्रकार से नयी कविता की बौद्धिक गद्यात्मकता के विरुद्ध रागधर्मी रचनात्मकता की अभिव्यक्ति के रूप में सामने आया। इस आंदोलन ने गीत को पारंपरिक रूमानी और कल्पनाशील ढांचे से अलग करके उसे जीवन के वस्तुगत अनुभवों से जोडऩे की कोशिश की। वीरेन्द्र मिश्र के गीतों में प्रारंभ से ही नव्यता और समकालीनता के तत्व थे और उनकी सुदीर्घ काव्ययात्रा के बाद अब इन्हें स्पष्टï पहचान मिल चुकी है। उनके गीतों में एक मोहक अल्हड़ता है, जो झरनों जैसी गतिशील, तितलियों जैसी रंगीन और मलयवायु जैसी गंधमाती है।
    'मेरा देशÓ और 'नया एशियाÓ जैसी लोकप्रिय कविताओं में उनके युद्धविरोधी स्वर बहुत स्पष्टï हैं। 'पंख और पांखुरीÓ शीर्षक अपनी पुस्तक में उन्होंने अपनी इस गीतधर्मिता का कारण बताते हुए कहा है - गीतधर्मिता का छायानट आम आदमी के अधिक निकट है, यद्यपि उसकी अभिव्यक्ति कठिन है। इसी कठिन अभिव्यक्ति को ग्रहण करने के लिए बिखरे हुए सही श्रोता और सही पाठक जब एकात्म हो जाते हैं, गीत की कलात्मक शक्ति स्पष्टï हो जाती है। मैं इसी दृष्टिï से लेखन करता हूँँ तथा भाषा को कथ्य के अनुरूप ढालते हुए सस्वर हो जाता हूँ। उन्होंने लिखा कि - 'नित नये वैज्ञानिक उपकरणों के इस बदलते युग में, शब्द का अस्तित्व तो रहेगा, लेकिन मुद्रित रूप में नहीं। संभवत: उसकी अभिव्यक्ति मंच और संगीत की दिशा में जोरों से होने लगेगी। तब नवगीत ही प्रमुख होगा - स्वभावत: अधिक कलात्मक, अधिक भारतीय और अधिक यथार्थवादी।Ó उनके प्रमुख काव्य संग्रह गीतम, लेखनी बेला, अविराम चल मधुवंती, झुलसा है छायानट धूप में, धरती गीताम्बरा, शान्ति गंधर्व, कांपती बांसुरी काफी लोकप्रिय रहे।
    इसी तरह आनंद मिश्र ने नवगीत आंदोलन में महती भूमिका निभाई। इनका मात्र 18 वर्ष की आयु में ही पहला कविता संग्रह 'साधनाÓ (1952) में प्रकाशित हुआ और पुरस्कृत होकर काफी चर्चित रहा।
    आनंदजी शास्त्रीय धारा कवि थे और प्रबंध लेखन के प्रति उनका गहरा लगाव था। यह इसलिए आश्चर्यजनक लगता है क्योंकि जिन दशकों में उन्होंने काव्यलेखन किया, वह नई कविता की प्रमुखता वाले दशक थे और लम्बी कविताएं या इतिवृत्तात्मक लेखन चलन में नहीं रह गए थे। ओज और प्रसाद आनंद जी की कविता के सहज गुण हैं। उनकी भाषा प्रांजल है, शब्द की गति और शक्ति पर उनका अनूठा अधिकार है।
    कला अभिलाषा की अभिव्यक्ति कला सुषमा की शिव-आसक्ति
    कला जग के अभाव का भाव,सत्य का रसमय जीवन-द्राव
    असुन्दर की सुन्दर प्रतिमूर्ति, कला जड़ता की चेतन-पूर्ति
    परिधियों में आनंद अनंत विजन वन का चिरकाल बसंत।

     हालांकि मुकुटबिहारी सरोज ने नवगीत आंदोलन से अपने को कतई संबद्ध नहीं किया, लेकिन उनके गीतों का कथ्य और उनका शिल्प-गीतकाव्य के तमाम प्रचलित ढांचों से अलग है। आपने ग्वालियर के नव हस्ताक्षरों को नवगीत लिखने की प्रेरणा दी तथा उन्हें प्रोत्साहित किया। इसी तरह विद्यानंदन राजीव नवगीत काव्य-धारा के एक समर्थ हस्ताक्षर हैं, जिनकी रचनायें सशक्त व बेजोड़ हैं। उनके गीतों का संकलन 'छीजता आकाशÓ कार्फी चर्चित रहा। राजीव जी प्रारंभ से ही एक प्रतिबद्ध गीतकार हैं, उनकी गीतयात्रा के तीन सोपान हैं - प्रथम सौन्दर्यमूलक गीतों का रचनाकाल जिनका केन्द्रीय रस श्रृंगार था, द्वितीय मानव और मानवेतर प्रकृति के समन्वय को ध्वनित करने वाले गीतों की रचना का काल और तृतीय यथार्थ और समकालीन बोध से उत्फुल्ल होने वाली सिसृच्छा से उद्भूत गीतों का रचनाकाल। गीतकाव्य के भाषा प्रयोगों में परिवर्तन, यथार्थवादी कथ्य और गीतों के रूप-विन्यास में आने वाले बदलाव को राजीव जी गीतधारा पर नयी कविता के प्रभाव के रूप में देखते हैं।
    'छीजता आकाशÓ की भूमिका में राजीव जी ने लिखा है - 'आज के गीत में कथ्य के स्तर पर नयापन देखा जा सकता है। प्रकृति-चित्रण, मानवीय-प्रेम जैसे परंपरागत प्रसंगों में वायवी कल्पना के स्थान पर यथार्थ-अनुभूति देखी गई है। मध्यवर्गीय संत्रास, निम्नवर्ग की रूढिय़ां और पीड़ा, जीवन के विभिन्न स्तरों पर बिखराव, परिवार का विघटन, समाज और मानव संबंधों जैसे अनेक विषयों को गीत ने जिस कुशलता और सहजता के साथ प्रस्तुत किया है, वह अभूतपूर्व है। संक्षेप में हम यह स्वीकार करते हैं कि आज का गीत, पूर्व की अपेक्षा, जीवन के अधिक निकट है। उसमें अनुभूति की व्यापकता और विविधता है।Ó
    नवगीत आंदोलन ने गीत के कथ्यात्मक कलेवर को ही नहीं बदला, बल्कि उसके छान्दिक विन्यास में भी अनेक परिवर्तन किए हैं। नवगीत का संरचनात्मक शिल्प पारंपरिक गीतों से बहुत भिन्न है। इस ओर संकेत करते हुए राजीव जी अपने गीतों के संबंध में लिखते हैं - 'गीतों के रूप-विन्यास अथवा शिल्प में भी एक उल्लेखनीय बदलाव आया है। इस प्रसंग में गीत, छन्द की परिपाटी को तोडऩे का प्रयास करता रहा है। यदि कहीं छंद भी है तो वह नवीन और लघु है, अथवा लय को ही महत्व दिया गया है। इस परिवर्तन से ही गीत में भावों की अन्विति को बल मिला है। गीत भाषा के लिए कर्णप्रिय छंद, कोमलकान्त पदावली और अनुप्रास की भरमार का युग अब नहीं रहा।Ó
    1948 के बाद जब हिन्दी काव्य में प्रगतिशील व प्रयोगवादी काव्यधारायें अधिक प्रबल होती हुई और निराला के अतुकांत से प्रभावित होकर जनमानस तक पहुँँची उस समय गीतात्मक काव्य धारा की एक बार फिर से ललक कवियों के मन में आई और दो धारायें साफ सामने आने लगीं, एक गीत विधा की और दूसरी छन्दहीन अतुकान्त धारा की; जिसमें लय तो थी, वस्तु भी थी परन्तु रागात्मकता न होने के कारण मन को छूने वाली वह अनुभूतिजन्य गहराई न थी। परिणाम यह हुआ कि 1954 में नई कविता के आगमन के साथ गीतों की परंपरा तेजी से उभरी और उसमें नीरज जी, नेपाली, सोम ठाकुर, महादेवी वर्मा, विद्यावतची कोकिल, सुमित्रा कुमारी सिन्हा आदि की गीतात्मक रचनायें देशभर में सुनीं गई, सराही गईं। गीत में लय है, छन्द है, राग है और शब्द विन्यास में एक विशेष सुगन्ध है। उसकी अपनी शब्द सीमा है, उसमें रहस्य और सांस्कृतिक परंपरायें पूर्ववत कही जा सकती हैं। 1954 के बाद अब समकालीन कविता तक यह गीत विधा विशेषकर नवगीत विधा अतुकान्त से बहुत आगे बढ़कर सुनी जा रही है।
    1964 में नवगीत का पहला समवेत संकलन 'कविता - 64Ó प्रकाशित हुआ था। ओमप्रभाकर उसके संपादकों में से एक थे, इस तरह से वह इस आंदोलन के प्रारंभकर्ताओं में से एक हैं। नवगीत के संबंध में उनकी मान्यता है - 'नवगीत नयी कविता की प्रतिक्रिया नहीं है। अत: स्पष्टï है कि वह नयी कविता का विरोधी भी नहीं है। साहित्य-विधाएं परस्पर विरोधी कभी नहीं होतीं। विरोध प्रवृत्तियों में होता है, विधाओं में नहीं। नयी कविता और नवगीत में विधागत भेद तो है ही, शिल्पगत और कथ्यगत भेद भी है।
    वह सब कुछ गद्यात्मकता, दुरूहता, आधुनिकता के नाम पर समसामयिकता, बल्कि क्षणिकता, छंदहीनता या छांदिक अज्ञान के कारण छंदमुक्ति, विदेशी अंधानुकरण, आरोपित नवीनता, जाली और घिसे हुए बिम्ब-प्रतीक, नकली और थर्र्डहैण्ड अनुभूति, अति प्रचलित भाषा जो नयी कविता में है, नवगीत में नहीं है, बल्कि है लय, एक बदली हुई काव्योचित लय, सहजता, जातीय संस्कृति,भावोद्भूत और ताजगीपूर्ण बिम्ब-प्रतीक, टटकी भाषा, अभी तक अदृश्य और अस्पृश्य अत: नितान्त सद्य: प्रस्तुत दृश्य और वास्तविक जीवन की गहन अनुभूतियां, युग-संपृक्ति और आज की विषमता और जटिलता के चटकते हुए व्यक्ति के लिए एक सांत्वनाप्रद, सहलाता हुआ आत्मिक स्पर्श।
    डॉ. पूनमचन्द्र तिवारी ने नवगीत आंदोलन में अपनी महती भूमिका निभाई। उनकी रचनायें मर्मस्पशी, हृदयग्राही हैं -
        कहां गई वे कल-कल नदियां नृत्य-विशारद नटखट झरने।
        कहां गई रंगीन तितलियां बनफूलों के गजरे - कंगन।।

    इसी तरह देश के बारे में उन्होंने 1 जुलाई 1974 को अपनी कविता में एक जगह लिखा है -    ये शहर व्यंग्य है, गांव नंगे हुए, जंगलों में टहलती हैं चिनगारियां
        संसदों में शिखण्डी, पहुंचने लगे देश फिर तोडऩे की हैं तैयारियां।।
        घोंसला अधबना, हर दिशा में लपट नाम खुशियों ने अब तक पुकारा नहीं
        खण्डहर खांसते, नींव टूटी पड़ी रीढ़ दुखती हुई है, वही की वहीं।

एक अदभुत रचना की पंक्तियां देखिये -
        छोड़ गई चिडिय़ा बहुरंगी पंख, क्यों मेरे लिए, मैं हैरान हूँ
        छोड़ नई नदिया, रेती में शंख, क्यों मेरे लिए, मैं अनजान हूँ।।

(आकाशवाणी, ग्वालियर से प्रसारित)

                
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संगीत समयसार


 -   राजकुमार सोनी

मनुष्य की विभिन्न स्वाभाविक प्रवृत्तियों में संगीत भी सहज व्यापार है। उमड़ी भावनाओं के आवेग के वशीभूत हो वह उन्हें अभिव्यक्त करने के लिये आतुर हो उठता है। भावों के उद्वेग के अनुसार ही उसके स्वरों में उतार-चढ़ाव आ जाता है और तब वह उनहीं स्वर लहरियों के सहारे पनी भावनाओं को अभिव्यक्त कर व्याकुल हृदय को शान्त करने का प्रयत्न करता है। यहीं संगीत का जन्म होता है। यह संगीत अभिव्यक्ति का सशक्त व सक्षम माध्यम है।
"Unspecied but deep feelings unexpressive through language belong to the realme of sure music."
भावार्थ - अनिश्चित किन्तु गहरी भावनायें जो भाषा के माध्यम से व्यक्त नहीं की जा सकती वे विशुद्ध संगीत से संबंद्ध होती हैं। दूसरे शब्दों में जो भावनायें भाषा / काव्य के द्वारा व्यक्त नहीं हो सकती वे संगीत का सहारा लेकर अभिव्यक्त हो सकती हैं। क्योंकि संगीत हृदय और आत्मा से स्फुरित होता है।
    परमात्व तत्व के प्राप्ति साधन के रूप में गान को ही सर्वश्रेष्ठï बनाया गया है। पूजा से कोटि गुणा स्तोत्र, स्तोत्र से कोटि गुणा जाप, जाप से कोटिगुणा श्रेष्ठïतर है गान और गान से परे (श्रेष्ठï) कुछ नहीं।
        ''पूजा कोटिगुणं स्तोत्र, स्तोत्र कोटिगुणो जाप:।
        जपात्कोटि गुणं ज्ञानं, गानात पर तरं नहि॥ÓÓ

मानव जन्म के साथ ही यह संगीत प्रवृत्ति जुड़ी हुई है। अवसर्पिणी काल चक्र के आदि के तीन कालों में मनुष्य किसी प्रकार का कर्म या उद्यम नहीं करता था। उसे अपनी जीवनोपयोगी सब वस्तुएं कल्पवृक्षों से प्राप्त हो जाती थीं। इन कल्पवृक्षों में तूर्यांग जाति के वृक्ष के प्रभाव से मनोहर वादियों की प्राप्ति हो जाती थी। उस समय भोगभूमि के जीवों के कान सदा गीतों के सुन्दर शब्दों के सुनने में आसक्त थे। स्वर्गों के देव भी बड़े संगीत प्रिय होते हैं। वहाँ किल्विषिक जाति के देव गायक होते हैं - उनका काम गाना बजाना होता है।
    भगवान तीर्थंकर का जन्म होते ही अपने आप भवनवासी देवों के मंदिरों में शंख-ध्वनि, व्यन्तर देवों के नगाड़ों का बजना, ज्योतिषियों के मंदिरों में सिंहनाद और स्वर्गवासी देवों के मंदिरों में घंटाओं का गंभीर नाद होने लगता है। गंधर्व, नर्तकी आदि सात प्रकार की सेना तीर्थंकरों के जन्माभिषेक के समय आती हैं। समस्त लोक नगाड़ों, शंखों आदि के मनोहर शब्दों से शब्दायमान हो जाता है और नृत्य तथा गीत सहित देवों का आगमन बड़ा आश्चर्यकारी जान पड़ता है। हा हा, हू, हू, तुम्बर, नाहद, विश्वासु आदि किन्नर जाति के देव पनी स्त्रियों के साथ कर्णों को अतिप्रिय भांति-भांति का गाना गाने लगते हैं। जन्माभिषेक के बाद इन्द्र ताण्डव नृत्य करता है। देवांगनायें हाव-भावों से अति मनोहर श्रृंगार आदि रसों से व्याप्त नाच नाचती हैं।
संगीत एक वरदान है - मधुर ध्वनि तरंगों का अथाह सागर है। यह सागर एक सहज आनंद का स्रोत है जो देवता, दानव, मनुष्य, पशु व पक्षियों को ही नहीं, बल्कि वनस्पति को भी अपने विशाल अंतर में समेट लेता है। कहा जाता है कि - 'उस गीत का महात्म कौन वर्णन कर सकता है जो धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का एक मात्र साधक है।
        ''तस्य गीतस्य महाडडत्मयं के प्रशंतितुमीशते।
        धर्मार्थ काम मोक्षाणामिदमै वैक साधनमथ् ॥ 30॥

अत: इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि संगीत मानवीय स्वात्मज्ञान के विकास का साधन है। समयसार है। संगीत समयसार -
        ''पराशय्र्य पाराशरौ भृगु यमौ संवर्त कात्याना,
        वापस्तम्ब बृहस्पती सुलिखितौ हारीत दसौ मनु:।
        विश्वग्रीव सगौतमौ मुनिवर शशङ्खïोडपि दक्षादय:,
        सर्वे मोक्षदमित्यु शान्ति मुनयो गीतं तदेगोक्तित: ॥ 211॥

अर्थात् - वेदव्यास, पाराशर, भृगु, यम, संवर्त, कात्यायन, आपस्तम्ब, बृहस्पति, सुलिखित, हारित, दक्ष, मनु, विश्वग्रीव, गौतम, मुनिवर शङ्खï और दक्ष इत्यादि सभी मुनियों ने अपनी उक्तियों के द्वारा गीत को मोक्षदायी कहा है।
संङ्गïीत चूड़ामणि में कहा गया है -
        ''योग ध्यानादिक यस्मात् सर्व लोकानुरञ्जनम।
        तस्मादनन्त फलदं गीतं स्याद मुक्ति मुक्तिदन्॥ 11॥

योग, ध्यान आदि समस्त साधनों की अपेक्षा गीत ही अनंत फल देने वाला है और भक्ति मुक्तिदायक है।
पं. रविशंकर -The highest aim of our music is to reveal the essence of the univeres it reflects and the ragas are among the means by which this essenes can be rehevided. Thus through the music are can reach God. 

भावार्थ - हमारे संगीत का उच्चतम लक्ष्य समस्त विश्व के सार को अभिव्यक्त करना है जिसे वह प्रतिबिम्बित करता है। संगीत द्वारा परमात्व पद तक पहुंचा जा सकता है। लेकिन संगीत चाहे गायन हो अथवा वादन, अपनी प्रकृति के अनुसार अध्यात्मिक ही होता है, क्योंकि इसका निर्माण और आस्वादन मनुष्य की आत्मा ही करती है।
सहज स्वाभाविकता संगीत के विषय में जानने की है -
'संगीत रत्नाकरÓ में संगीत की परिभाषा इस प्रकार की गई है - 'गीत वाद्यं तथा नृत्तं त्रय संगीत मुध्यतेÓ-गीत, वाद्य, और नृत्य तीनों संगीत कहलाते हैं।
संगीत कला के दो सर्जक तत्व हैं - 1. स्वर-राग, 2. लय-ताल। स्वर से रागों का निर्माण होता। सूर्य शब्द का आधार स्वर है। अत: सवर का समबन्ध प्रकाश से माना गया है। इसलिये संगीत का स्वर पक्ष प्रकाश है।
    राग का स्रोत स्वर, स्वर का स्रोत श्रुति (सलक्ष्म नाद), श्रुति का स्रोत नाद और नाद का ध्वनि है। यह ध्वनि ही सर्वजगत का कारण है -
        ''ध्वनियानि: परासेया ध्वनि सर्वस्व कारणम्।
        आक्रान्त ध्वनिता सर्व जगत् स्थावर जङ्गïतम्॥

मंगल ध्वनि ú ही मूल ध्वनि है। यही आदिनाथ है - समस्त मंत्रों का स्वर।
नाद - संगीतोपयोगी ध्वनि को नाद कहा गया है। नाद की उत्पत्ति के बारे में शारदातिकतकै में कहा गया है कि सत, चित्त, आनंद विभूतित्रयी से सम्पन्न प्रजापति से सर्वप्रथम शक्ति का प्रादुर्भाव होता है। जैन धर्मानुसार आत्मा में अनन्तसुख एवं अनंत शक्ति निहित है। नाद से बिन्दु की उत्पत्ति होती है। जैन साहित्य में नाद कला का आकार अर्ध चन्द्रमा के समान है वह सफेद रंग वाली है और बिन्दु काले रंग वाला है।
संगीत रत्नाकर में नाद की उत्पत्ति इस प्रकार बताई है -
        'नकारं प्राणनामानं दकारमनलं विदु:।
        जात: प्राणाग्रि संयोगात्ते: न नादो-मिघीपते॥

अभिप्राय है - नाकर अर्थात् प्राण और दाकर अर्थात् अग्नि इन दोनों के संयोग से नाद उत्पन्न होता है। प्राणत्व का लक्षण गतिशीलता। नाद की उत्पत्ति में कंपन होता है और गतिशीलता होती है। दकार अर्थात् प्रकाश-प्रकाश ज्ञान की स्थिति है। प्रकाश में निहित गुण शक्ति है। तात्पर्य यह है कि 'दÓ में सूर्य, प्रकाश व शक्ति का समन्वय है। और प्रकाश अवस्था में 'सुन्दरमÓ से साक्षात्कार होता है। इस प्रकाश नाद के अन्तर्गत सजीवता, गति, शक्ति एवं प्रकाश (ज्ञान) का समन्वय है।
    नाद का सर्वोच्च उद्गम स्थान ú है। इसे परमात्मा का वाचक माना गया है। नादानुसंधान करते करते अन्त में ओउम् नाद की सिद्धि होती है। यह ओंकार बिन्दु संयुक्त है। बिन्दु सृष्टिï का परम रहस्य है। योगी बिन्दु संयुक्त ओंकार का नित्यमेव ध्यान करते हैं। काम और मोक्ष दोनों की प्राप्ति ओंकार से संभव है - ऐसा प्राचीन आचार्यों का मत है।
नाद के दो भेद हैं - 1. अनाहत 2. आहत  - अनाहत नाद अतिसूक्ष्म होता है। इसकी साधना कठिन है। इसके लिये गहन अवधान अपेक्षित है। यह नाद सम्पूर्ण जगत में व्याप्त है। इस व्याप्त रूप में वह अनाहत नाद कहा जा सकता है। योगियों ने इस अनाहत नाद का अनुभव वर्णन करते हुए लिखा है कि यह सर्वप्रथम समुद्र गर्जन, मेघ स्तनित, मेरीख और झर्झर ध्वनि के समान सुनाई देता है, मध्य में मर्दन, शंख, घंटा और काहल से उत्पन्न ध्वनि के समान सुनाई देता है और अन्त में किंकणी, वंशी, भ्रमर और वीणा के निक्काण जैसी ध्वनि सुनाई पड़ती है। उदाहरणार्थ तीर्थंङ्कïर का जन्म होता है तब अनाह नाद होता है -
        मति श्रुति अवधि विराजित जिन जब जनमियो।
        तिहुँलोक भये क्षोमित, सुरगन मरमियो॥
        कल्पवासि घट घंट, अनाहद वज्जियो।
        ज्योतिष घर हरिनाद, सहज दल गज्जियो॥
        गज्जियो सहनहिं, सङ्गï मावन, भवन सवद सुहावने।
        विंतर निलय पठु परइ वज्जहि, कहत महिमा क्यों बने॥
        कंपित सुरासन अवधि वलजिन, जन्म निहचै जानियो।
        धनराज तव गजराज माया-मयी, निरमय आनियो॥ 
             
 आहत नाद संगीत से संबंधित है और यह 'लोकरञ्जनम् व भवमञ्जनम्Ó दोनों गुण सम्पन्न है। आहतनाद की साधना में स्थूल से सूक्ष्म की ओर जाने में अनाहद नाद की सिद्धि होती है। आहतनाद की उत्पत्ति के संबंध में पाणनीय शिक्षा में लिखा है -
'आत्मा बुद्धि से संयोग करते है, मन विवक्षाचीन अर्थों से युक्त होता है। वह व्यापारित मन शरीर स्थित अग्नि पर आघात करता, अग्नि वायु को प्रेरणा देता है। वह मारूत हृदय प्रदेश में उघ्र्व संचरण करता हुआ मंद स्वर (नाद) को जन्म देता है। मारूव से उदीर्ण (उघ्र्वक्षिपृ) वह मंद स्वर मूर्घ प्रदेश में अमिहित होता है और मुख्य यंत्र का अंतर्वर्ती होकर वर्णों (गाने की विविध क्रियाओं) का प्रसून करता है।
    नादोत्पत्ति का यह मार्ग नाद को स्फोट रूप प्रदान करता है, उसकी उच्चारणवस्था एवं श्रुतलम्य ध्वनि का निर्वाचन करता है। अब यदि इसकी वितोम गति पर विचार करें तो नाद के पीछे चलते हुए आत्मा के समीप पहुंच जाएंगे। यही नादोपसता का चरम प्रयोजन है।
'नाद ही संगीत कला का स्रोत है। गीत, वाद्य और नृत्य तीनों ही नादात्मक है।
        ''ननादेन बिना गीतं न नादेन बिना स्वर:।
        न नादेन बिना सानं न नादेन बिना शिव:॥

भावार्थ - न नाद के बिना वर की उत्पत्ति संभव बै, न नाद के बिना गीत रचना संभव है, न नाद के बिना ज्ञान प्राप्त हो सकता है और न नाद के बिना कल्याण की प्राप्ति हो सकती है।
इस प्रकार स्वर और गीत के माध्यम 'नाद से ही ज्ञान अर्थात् 'सत्यम् की प्राप्ति होती है। नाद से कल्याण 'शिवम की प्राप्ति होती है। नाद स्वयंमेव सुन्दर ध्वनि है। अत: नाद में सत्यम् शिवम सुन्दरम् का समन्वय है।
    आचार्य श्री विद्यानन्दजी के शब्दों में - नाद को आत्मनुसंधान सहायक निरूपित किया है। नाद की आरम्भिक साधना में शब्द, गीत, लय, ताल, वाद्य-यन्त्रादि की अपेक्षा की जाती है, परन्तु पाद के इस स्थूल रूप से सूक्ष्म की ओर प्रत्यावर्तन करते-करते शब्दादि का परिधान निष्प्रयोजन हो जाता है। तब यह नाद निग्र्रन्थ थवा दिगम्बर यथाजात रूप घर हो जाता है। शिशिर ऋतु में वृक्षों के पत्तों के समान इसके बाह्यï उपकरण मर जाते हैं, शब्द समुच्चय की निर्जरा हो जाती है और शुद्ध नाद 'ओउमÓ शेष रह जाता है। इस अवस्था में सम्पूर्ण परिसमों का अन्त होकर विशुद्ध स्व-समय की प्राप्ति हो जाती है। यहाँ आने पर संगीत या नादोपासना समयसार का सार्थक विशेषण अर्जित करती है। आत्मानुसंधान और आत्म तत्व की प्राप्ति ही तो परम उपलब्धि है।               

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ग्वालियर गौरव गाथा






- राजकुमार सोनी

    ग्वालियर-विभूति की धरती-सहस्त्रों वर्षों से आत्मकल्याण का सन्देश देती रही है। इसकी पावन धरती पर एक ऐसे महान व्यक्तित्व की पवित्र भावना का तेज पुञ्ज है जो युगों-युगों तक शाश्वत सत्य बनकर असत् पर सत्य की सत्ता, हिंसा पर अहिंसा और प्रेम की विजय स्थापित कर प्राणीमात्र के आत्मोत्थान के लिये प्रकाश स्तंभ की भाँति दिशा निर्देशन करता रहेगी। ऐसी महान विभूति थे - 'सुप्रतिष्ठिïत केवलीÓ जिन्होंने गोपाचल (ग्वालियर) पर महाभारत से पूर्व इक्कीसवें तीर्थंकर नेमिनाथ के तीर्थकाल में निर्वाण प्राप्त किया था।
   'श्री गोपाचल से सुप्रतिष्ठिïत केवली मोक्ष गए हैं सो यह निर्वाण भूमि है।Ó
- 'शौरीपुर पट्टïावली-लवेंचू इतिहासÓ , पं. झम्मनलाल तर्कतीर्थ।

    एक बार शौर्यपुर के उद्यान में सुप्रतिष्ठिïत मुनिराज जन प्रतिमायोग से ध्यानारूढ़ थे तब एक यक्ष ने उनके ऊपर भयानक उपसर्ग किये। किन्तु मुनिराज ध्यान में अचल रहे और उन भयानक उपसर्गों के बीच उनके मन की शांति और समता भाव तनिक भी भंग नहीं हुये। आत्मा में स्थिर रहकर संचित कर्मों का शुक्ल ध्यान द्वारा क्षय करते रहे। वे श्रेणी आरोहण करके उस स्थिति को प्राप्त हो गये जहाँ ध्यान और ध्येय, चैतन्य भाव, चैतन्य कर्म और चैतन्य की क्रिया अभिन्न एकाकार हो जाती है। उसी समय उन्होंने ज्ञानावरणी, दर्शनावणी, मोहनीय और अन्तराय इन घातिया कर्मों का विनाश कर दिया। तब उनकी आत्मा विशुद्ध केवल ज्ञान की अनन्त आभा से आलौकित हो उठी। उसी समय चारों निकाय के देव और इन्द्र सुप्रतिष्ठिïत केवली भगवान की वन्दना और पूजा कर यथास्थान बैठ गये। तभी भगवान का उपदेश हुआ।
    सुप्रतिष्ठिïत केवली के उपदेश सुनकर शौर्यपुर नरेश अन्धकवृष्णि के मन में सांसारिक भोगों से विरक्ति हो गई। उसने शौर्यपुर का राज्य अपने पुत्र समुद्रविजय को देकर सम्पूर्ण परिग्रह का त्याग कर मुनि दीक्षा अंगीकार कर ली। इन्ही सुप्रतिष्ठिïत केवली का निर्वाण गोपाचल (ग्वालियर) पर हुआ। इस कारण यह सुप्रतिष्ठिïत निर्वाण क्षेत्र प्रसिद्ध हुआ। आचार्य पूज्यपाद (देवनंदि) ने जिन निर्वाण क्षेत्रों के नाम बताये हैं उनमें सुप्रतिष्ठिïत निर्वाण क्षेत्र भी एक है।
गोपाद्रौ देवपत्तने -
    ''विक्रमादित्य राज्येऽस्मिश्चतुर्दयरेशते।
    नवषष्ठïयायुते किनु गोपाद्रौ देवपत्तने॥ÓÓ

    वीरेन्द्रदेव ग्वालियर के तोमर राजा (सन् 1402 -1423) थे। कुन्दकुन्दाचार्य द्वारा रचित प्रवचनसार की आचार्य अमृतचन्द्रकृत तत्व प्रदीपिका की एक प्रतिलिपि वीरमेन्द्रदेव के राज्यकाल में सन् 1412 ई. में की गई थी। उक्त टीका के प्रतिलिपिकार ने उनके गढ़ गोपाचल को देवपत्तन कहा है।
                                                                                                                  - डॉ. हरिहर निवास द्विवेदी।
    तीर्थमालाओं में ग्वालियर का उल्लेख प्रसिद्ध जैन तीर्थ के रूप में किया गया है जो बावनगजा तीर्थ क्षेत्र से प्रसिद्ध रहा है -
    ''गोपाचल जिनथान बावनगजा महिमावर।
    भविक जीव आधार जन्म कोटि पातक हर॥
    जेसुमिरे दिनरात तास पातक सवि नाशे।
    विघन सदा विघटित सुख आवे सवि पाशे॥
    बावनगजा महिमाघणी सुरनर वर पूजा करे।
    ब्रह्मïज्ञानसागर वदति जे दीठे पातक हरे॥ÓÓ

        - सर्वतीर्थ वन्दना - ज्ञानासागर ईसा की 16 वी 17 वीं सदी।
    इन उल्लेखों से ज्ञात होता है कि ग्वालियर जैनियों के लिये देवपत्तन था और इसकी गणना जैन तीर्थों में की जाती थी।
    अपभ्रंश भाषा के महाकवि रइघू (विक्रम की 15 वीं शताब्दी का पूर्वाध) ने पासणाह चरिउ में लिखा है -
    'जहि सहहिणिरंतर जिणणिणेव। पंडुर सुवण्ण धमयड-समेयÓ
    भावार्थ - जहाँ पंाडुर एवं सुवर्ण वाली अनेक पताकाओं से युक्त जिन मंदिर शोभायमान रहते हैं।
    'सम्मतगुणणियुण कव्वÓ ग्रंथ में उक्त कवि ने ग्वालियर नगर प्रसंग में लिखा है - उसने (राजा डूंगर सिंह ने) अगणित जैन मूर्तियों का निर्माण कराया था जिन्हें ब्रह्मïा भी गिनने में असमर्थ हैं।
    यह ऐतिहासिक सत्य है कि तोमरवंश के राजा डूंगरसिंह ने विक्रम सम्वत् 1481 में राज्य संभाला। उसी समय से ग्वालियर किले के पहाड़ की चट्टïानों में अनेकों जिन मूर्तियाँ उत्कीर्ण करने का कार्य प्रारंभ हुआ जो उसके पुत्र कीर्तिसिंह के काल तक चला। ये कला एवं पुरातात्विक दृष्टिï से अत्यन्त महत्वपूर्ण हैं।
    गोपाचल का नाम आते ही हिन्दी के कवि केशवदास की 'कवि प्रियाÓ (सन् 1600-1601) की निम्न पंक्तियां मस्तिष्क में गूँज उठती हैं :-
    'आछे आछे वसन, असन, वसु, वासु पसु ,
    दान, सनमान, यान, वाहन वखानिये।
    लोग, भोग, योग, भाग, बाग, राग, रूपयुक्त,
    भूषननि, भाषित, सुभाषा मुख जानिये।Ó
    सातो पुरी, तीरथ, सरित सव गंगादिक,
    केशोदास पूरण पुराण गुन जानिये।
    गोपाचल ऐसे गढ़ राजा रामसिंह जू से,
    देशनि की मणि, महि मध्य प्रदेश मानिये।

    केशवदास ने मध्यप्रदेश को देशों का मणि कहा है इसके निवासियों के मुख में सुभाषा का वास बतलाया है। मध्यप्रदेश के अन्तर्गत बुन्देला रामसिंह का राज्य है और गोपाचल जैसा गढ़ है और पुण्य तीर्थराज गढ़ गोपाचल तीर्थराज की मणिमाला का मणि है।

प्राचीनता
    मध्यभारत भारत-भूमि का हृदय स्थल है, तथा ग्वालियर उस मध्यभारत का पुण्य तीर्थराज है। शताब्दियों से यह भूमि इतिहास, कला, संस्कृति एवं साहित्य की क्रीड़ा भूमि रही है। विद्वत जनों ने अपने कार्यकलापों एवं कृतियों से इस तीर्थराज को अपने आपको समर्पित किया है। ग्वालियर का इतिहास अति प्राचीन है -
    'इतिहास जैनागम विषे, इस दुर्ग को सम्मान से।
    देखा गया अति प्रेम से, प्राचीनतम युगकाल से॥Ó

                                                                                    - ग्वालियर का अतीत : पं. छोटेलाल वरैया।
ग्वालियर दुर्ग की प्राचीनता के संबंध में आख्यान मिलते हैं :-
    'पुण्य नक्षत्र जोग शुभ लियो। तेरस सकल ठाठ विधि कियो।।
    तिहि विधि सकल वेद विधि ठई, तबै नींव गोपाचल दई॥
    द्वापर अंत जु कलियुग आदि, संवत धरयो महूरत साधि॥
    धर्म जुधिष्ठिïर संवत, लह्यïो, आदि ग्रंथ में ते मैं कहयो॥Ó

    - गोपाचल आख्यान - खड्गराय।
    द्वापर के द्वय मास रहे, पुनि प्रवेश कलिकाल।
    सो संवत् मिति जानियो, गढ़ की नींव मुवाल॥

        - (गोपाचल आख्यान - नाना कवि)
लेकिन इससे भी आगे -
    श्री रमाकान्त चतुर्वेदी संग्रहालयाध्यक्ष नगर निगम संग्रहालय, ग्वालियर ने सन् 1987 में प्रकाशित 'शताब्दीÓ नगरपालिका निगम ग्वालियर में  'ग्वालियर पुराख्यानÓ लेख में लिखा है - '12 वर्ष बीत गये यह खोज किये हुये तथा अन्तर राष्टï्रीय पुरातत्व जगत में यह मान्यता प्रदत्त कराते हुये कि ग्वालियर में मानव संस्कृति आज से पाँच लाख वर्ष पूर्व विद्यमान थी।Ó
    लेकिन इस बात का दु:ख है कि आज भी जितने इतिहास परक ग्रंथ लिखे जा रहे हैं अथवा विद्वानों द्वारा यत्र-तत्र लेख लिखे जा रहे हैं, उनमें ग्वालियर का इतिहास अथवा सभ्यता की प्राचीनता को केवल 1400 वर्ष प्राचीन निरुपित किया जा रहा है। इसे ज्ञान शून्यता कहा जाये अथवा जिज्ञासा शून्य।
इसके ही प्रमाण में :- डॉ. हरिहरनिवास द्विवेदी भी इसी शताब्दि में लिखते हैं -  'ग्वालियर नगर के सीमान्त पर गुप्तेश्वर और देवखोह के शैलाश्रयों के शैलचित्र इस क्षेत्र में प्रागैतिहासिक मानव के निवास के साक्षी हैं, अपितु ग्वालियरगढ़ का महत्व मौर्यकाल में ही स्थापित हो चुका था तथापि, अभी तक गढ़ पर तीसरी शताब्दी के पूर्व के अवशेष प्राप्त नहीं हुये हैं। उस समय की पूरी या टूटी मूर्तियाँ यत्र-तत्र बिखरी पड़ी प्राप्त हो जाती हैं।Ó लेकिन - अभी-अभी अगस्त 2003 में ग्वालियर किले के उरवायी गेट के पास खुदाई में कुषाण काल की ईंटें प्राप्त होने से ग्वालियर के इतिहास की जो नींव पड़ी थी उसकी अब जड़ हिलने लगी है। ग्वालियर का अस्तित्व तो ईसा से दो सौ साल पूर्व भी पाये जाने के संकेत मिलने लगे हैं।
    यह तो पुरातत्व की कहानी है, परन्तु जैन धर्म के अनुसार तो ग्वालियर महाभारत काल से पूर्व भी था - क्योंकि ग्वालियर दुर्ग की पहाड़ी से सुप्रतिष्ठिïत केवली मोक्ष गये हैं इसलिये यह निर्वाण भूमि है। परन्तु - काल ने कवलित कर लिया इसे और इसके इतिहास को भी।
    ग्वालियर की जैन संत परम्परा भी इसी का दुष्परिणाम है। अत: जो कुछ ज्ञात हो सका वह लिखा जा रहा है।



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गुरु का वृष राशि में प्रवेश








गुरु, ज्येष्ठ मास कृष्ण पक्ष, गुरुवार 17 मई 2012 को प्रात: 9.34 बजे रेवती नक्षत्र में शुक्र राशि वृष में प्रवेश करेंगे। गुरु इस दिन से 31 मई 2013 प्रात: 6.49 बजे तक अपने शत्रु शुक्र की राशि में ही विराजमान रहेंगे। इस दौरान 12 राशियों पर क्या-क्या प्रभाव पड़ेगा। आइये जानते हैं विस्तार से।


गुरु के राशि परिवर्तन को सभी उम्मीद भरी नजरों से देखते हैं। इसका कारण यह है कि गुरु नवग्रहों में ऐसा ग्रह है जो धर्म-अध्यात्म, बुद्धि-विवेक, ज्ञान, विवाह, पति, संतान, पुत्र सुख बड़े भाई का कारक माना जाता है। स्वास्थ्य की दृष्टि से भी गुरु हमारे लिए काफी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह शरीर में वसा, पाचन क्रिया, कान, हृदय सहित लीवर को प्रभावित करता है।
अगर आप अविवाहित हैं और सादी करना चाहते हैं या फिर आप संतान के इच्छुक हैं तो इस दौरान आप भी गुरु को आशा भरी नजरों से देख सकते हैं। अगर आप नौकरी व्यवसाय में उन्नति की आशा रखते हैं अथवा किसी ऋण से मुकित की कोशिश कर रहे हैं तब भी गुरु के राशि परिवर्तन को उम्मीद भरी नजरों से देख सकते हैं। ध्यान देने वाली बात यह है कि इन सभी विषयों में शुभ और अपेक्षित परिणाम आपको अपनी राशि के अनुरूप ही प्राप्त होंगे।

मेष : धन लाभ होगा
आपकी जन्म राशि से दूसरे घर में गुरु का गोचर होना आपके लिए सुखद होगा। गुरु के इस गोचर के प्रभाव से धन का लाभ होगा। यह आपके आत्मविश्वास को भी बढ़ाएगा तथा आप व्यवहार में भी बदलाव महसूस करेंगे। आप अगर विवाह के योग्य हैं तो आपकी शादी हो सकती है, संतान के इच्छुक हैं तो आपकी इच्छा पूरी होगी। छात्रों को शिक्षा में शुभ परिणाम प्राप्त होंगे।

वृषभ : आत्म विश्वास बढ़ाएगा

गुरु का गोचर प्रथम भाव में होने के कारण आपको उन बातों से बचना चाहिए जिससे सम्मान की हानि हो सकती है। गुरु का यह गोचर कार्य क्षेत्र में अनचाहे स्थान पर स्थानांतरण करवा सकता है। कार्यों में संतुष्टि की कमी रह सकती है। आपके कार्य विलंब से पूरे होंगे तथा आपके कार्य को कम सराहा जा सकता है। इसके अलावा मेहनत के बावजूद सफलता नहीं मिलने से मन असंतुष्ट रह सकता है।

मिथुन : मन असंतुष्ट रहेगा
बारहवें घर में गुरु का गोचर अशुभ कहलाता है। गुरु के इस गोचर के प्रभाव के कारण आपके घर में कई मांगलिक कार्य होंगे जिससे आपके व्यय बढ़ेंगे। इससे आपको आर्थिक परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। मित्रों द्वारा लगाये गये आरोप से मन दु:खी रह सकता है। परिवार में जीवन साथी एवं संतान से मतभेद हो सकता है। स्वास्थ्य की दृष्टि से भी समय कष्टदायी रह सकता है जिससे कोई पुराना रोग उभर सकता है।

कर्क : आर्थिक स्थिति में सुधार होगा
कर्क राशि में आपका जन्म हुआ है तो गुरु का यह गोचर आपके लिए अत्यंत शुभ फलदायी रहेगा। इसका कारण यह है कि गुरु का गोचर आपकी राशि से एकादश भाव में हो रहा है। इस गोचरीय स्थिति के कारण आपको धन का लाभ मिलेगा जिससे आर्थिक स्थिति में तेजी से सुधार होगा। सुख-सुविधाओं एवं मान-सम्मान में बी बढ़ोत्तरी होगी। मित्रों से भी लाभ की अच्छी संभावना रहेगी। अगर इन दिनों आपकी शादी की बात चल रही है तो आपका विवाह हो सकता है। अगर आप विवाहित हैं और संतान प्राप्ति की कामना रखते हैं तो आपकी मुराद पूरी हो सकती है।

सिंह : संघर्षमय समय व्यतीत होगा
गुरु की इस गोचरीय अवधि में आपको धैर्य एवं समझदारी से चलने का प्रयास करना होगा क्योंकि आपके लिए यह समय संषर्घमय रह सकता है। आपके लिए उचित होगा कि अपनी वाणी पर नियंत्रण रखें और सभी को आदर दें। इससे आपका मान-सम्मान बना रहेगा। आर्थिक परेशानियां भी इन दिनों सिर उठा सकती हैं। अत: नए निवेश सोच समझकर करें। नई योजना पर कार्य शुरू करने की सोच रहे हैं तो अभी उसे टाल देना उचित रहेगा क्योंकि, इस विषय में भी यह समय गुरु का आपकी जन्म राशि से दसवें घर में होना शुभ प्रतीत नहीं होता है।

कन्या : मन की इच्छाएं पूर्ण होंगी
आपके लिए गुरु का वृष राशि में गोचर करना शुभ फलदायी रहेगा। गुरु की इस गोचरीय स्थिति के कारण भाग्य में वृद्धि होगी। धर्म एवं आध्यात्मिक दृष्टि से समय उत्तम रहेगा जिससे घर में धार्मिक कार्य सम्पन्न होंगे। भाई एवं संतान पक्ष से सहयोग प्राप्त होगा। आप अपने प्रयासों से मन की कुछ इच्छाओं को पूर्ण कर सकते हैं। बीते दिनों जिन समस्याओं से आप परेशान थे उनमें कमी महसूस कर सकते हैं।

तुला : वाणी व क्रोध पर नियंत्रण रखें
आपको अपनी वाणी के साथ ही साथ क्रोध पर भी नियंत्रण रखना होगा। अन्यथा घर-परिवार में जहां मुश्किल हालातों का सामना करना पड़ सकता है, वहीं कार्यक्षेत्र में भी नुकसान उठाना पड़ सकता है। मान-सम्मान की हानि की संभावना होने के कारण भी आपके लिए इन बातों का ध्यान रखना जरूरी है। गुरु का गोचर आपकी जन्म राशि से आठवें घर में होने से यह आपके स्वास्थ्य के लिए कष्टकारी रह सकता है। ऐसे में आपके लिए उचित होगा कि अपनी सेहत का ध्यान रखें तथा अनावश्यक भाग-दौड़ से बचें।

वृश्चिक : कामयाबी का रास्ता खुलेगा

गुरु का गोचर आपकी जन्म राशि से सातवें घर में हो रहा है। यह आपके लिए बहुत अच्छी स्थिति है। इस गोचर के कारण आजीविका के क्षेत्र में सभी प्रकार की परेशानियां धीरे-धीरे कम होती जाएंगी और कामयाबी का रास्ता खुलेगा। आर्थिक  परेशानियां भी दूर होंगी और आपने किसी से लोन लिया है तो उसे चुका देंगे। पारिवारिक समस्याएं भी बातचीत व समझदारी से सुलझ सकती हैं। अत: प्रयास कीजिए। विवाह के इच्छुक हैं और घर में विवाह संबंधी बातचीत चल रही है तो इस अवधि में आपकी शादी होने की संभावना भी प्रबल है। सगे-संबंधियों से सहयोग प्राप्त होगा।

धनु : स्वास्थ्य पर ध्यान दें
इस अवधि में आपके लिए धैर्य एवं परिश्रम से कार्य करना उचित होगा क्योंकि गुरु का गोचर आपकी राशि से छठे घर में हो रहा है। इस गोचर के प्रभाव के कारण आपको स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों का सामना कना पड़ सकता है, विशेष तौर पर पेट संबंधी रोग आपके लिए परेशानी का कारण बन सकते हैं। आप अगर किसी प्रतियोगिता परीक्षा में सम्मिलित हो रहे हैं तो काफी मेहनत करनी होगी अन्यथा सफलता कठिन होगी। दाम्पत्य जीवन में भी समस्याएं उत्पन्न होंगी।

मकर : शुभ फल मिलेगा
आपके लिए गुरु का गोचर जन्म राशि से पांचवे घर में होना शुभ फलदायी रहेगा। गुरु के इस गोचरीय प्रभाव के कारण आपको भाग्य का सहयोग प्राप्त होगा। कई प्रकार की उलझनों को सुलझाने में सफल होंगे। नौकरी एवं व्यवसाय में लाभ की अच्छी संभावना रहेगी। कई नए कार्य भी इस अवधि में पूरे होंगे। आप चाहें तो इस समय निवेश भी कर सकते हैं। विवाह एवं संतान प्राप्ति के लिए भी गुरु का वृषभ राशि में गोचर शुभ रहेगा।

कुंभ : नौकरी-व्यवसाय में बदलाव होगा

वृष राशि में गुरु का गोचर होने से आपको कई प्रकार की परेशानियों से राहत मिलेगी, परन्तु मानसिक चिंताएं बढ़ेगी। इस दौरान आप स्थान परिवर्तन कर सकते हैं अथवा नौकरी एवं व्यवसाय में बदलाव कर सकते हैं। कार्य-क्षेत्र में सहकर्मियों से विवाद हो सकता है। इसी प्रकार भाई-बंधुओं से भी मतभेद की स्थिति रह सकती है। आपकी मां को स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। आप चिकित्सक से परामर्श जरूर ले लें।

मीन : मतभेद उभर सकते हैं
गुरु का गोचर इस समय आपकी जन्म राशि से तीसरे घर में होगा जिससे भाई-बहनों से मतभेद हो सकता है। सगे-संबंधियों से भी किसी बात को लेकर मतांतर रह सकता है। इन दिनों आप शारीरिक थकान महसूस कर सकते हैं। आर्थिक स्थिति में अनुकूलता बनाये रखने के लिए तथा मान-सम्मान प्राप्ति के लिए अपने कार्य-व्यवसाय पर मनोयोग से ध्यान देना होगा। आपके लिए सलाह है कि गुरु के इस गोचर की अवधि में लंबी यात्राओं से बचें।

जातक क्या करें
इस अवधि में गुरु का शनि से षडाष्टक संबंध बन रहा है, जो अशुभ फलदायक माना जा रहा है। इस स्थिति में गुरु के अशुभ प्रभाव से बचाव के लिए भगवान विष्णु की पूजा करें। गुरु का व्रत, गुरु के मंत्र ऊं बृहस्पतये नम: का जप करें। मंदिर में पीले फूल, बेसन के लड्डू आदि अर्पित करें। विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें। श्री सूक्त व लक्ष्मी सूक्त का पाठ धन लाभ के लिए विशेष लाभकारी रहेगा।

- अरुण बसंल

फ्यूचर समाचार सेवा

शुक्रवार, 11 मई 2012

राजकुमार सोनी की कविताएं



(1)

इंसानियत


जो बुरे कर्म करे,
उसे शैतान कहते हैं।
जो इंसानियत को डसे,
उसे हैवान कहते हैं।
जो इन दुर्गुणों को छोड़कर,
सन्मार्ग अपनाये,
सचमुच उसे इंसान तो क्या
भगवान कहते हैं।
जिन्दगी का दूसरा नाम,
जिन्दादिली है।
फूल की रक्षा न
कर पाना बुझदिली है।
प्यार की चिता पर ...,
स्वयं को भस्म कर डाले।
वही तो सच्ची मोहब्बत
की संग दिली है।

(2)
जिन्दगी का सफर


जिन्दगी का सफर बड़ा है।
पर जख्म दिल का पुराना है।।
वे खौफ तूफानों से डरता नहीं।
यही तो हमें आजमाना है।।
हम लुटे, भीड़ में- बाजार में।
क्योंकि दिल का हिसाब चुकाना है।।
अब न फेंको फूल मुझ पे जरा।
फिर लौटूंगा वीरान चमन में।।
अभी तो मुझे बहार लाना है।।

(तीन)
जिन्दगी तो बेवफा है

जिन्दगी का ये घट,
बूंद-बूंद से भरता है।
कदम-कदम पै वे हिसाब,
राहों में बिखरता है।
जिन्दगी तो बेवफा है,
तभी तो उम्र घट रही है।
मगर राही की नजरें,
मंजिलों पर टिक रही हैं।
हो सके आरजू दिल में,
हम यही पालते रहें।
कर लें आज हम प्यार,
घड़ी यही निकालते रहें।।

(चार)
औरों के दु:ख सहूं

क्या कुछ मैंने खोया है
क्या अब मैं कुछ पाऊंगा
आया था काली हाथ
खाली हाथ ही जाऊंगा
कुछ कर गुजरूं मैं
सोचता हूं मैं क्या करूं
किसी को अपने सुख देकर
औरों के दु:ख सहूं।

आंसू नहीं हैं आंख में
बहाना जरूर है...।
मुझे औरों के दु:ख
सहने में ही खुद पर गुरूर है।।

वो मुस्कराते रहें
मैं उम्र भर रोता रहूं।
मरूं तो में बस....।
दु:खों की सेजों पर ही
सुख एक अनुभूति है
क्षण भर का विश्राम
दु:ख एक जीवन है।
वही है जीवन संग्राम।।

(पांच)
हम पतझड़ में बहार लाते हैं

हम वो हैं
जो .....
पतझड़ में
बहार लाते हैं।
गम में....
आंसू नहीं बहाते
बल्कि
और मुस्कराते हैं।।
सोचता हूं
क्या
लेकर
हम आये थे।
और
क्या लेकर जाएंगे
भाई-बहन
रिश्ते-नाते,
धन-दौलत
सभी
यहीं रह जाएंगे।
ये गम क्या है
इस शरीर का वो
नम हिस्सा है,
जो घड़ी-घड़ी रोता है
और घड़ी-घड़ी हंसता है।
फिर जिन्दगी को क्यों न
गम में ही खुश रखूं,
गम ही जीवन का सार है
क्यों न औरों से मैं कहूं।।


(छह)
अंधकार मिटाओ

दीपक के अंतर्मन से
एक सवाल उठा
बाती...
ने लौ से पूछा
क्या होते रहेंगे
देश में- विश्व में
अत्याचार...?
अनाचार...?
दुराचार....?
विश्वासघात...?
भ्रष्टाचार...?
कब पैदा होगा
इनको मिटाने वाला।
इंतजार है हमें
उनके अवतरण का।।

प्रयुत्तर में-
लौ मुस्कुराई
बोली .....
श्री की स्थापना
पहले हो चुकी है।
लेकिन
अंधकार
की दीवार
इस कदर
फैली है ......
कि तुम को ही काम
करना है,
अंधकार मिटाकर
उद्धरण बनना है।
तुम्हीं हो रोशनी
के दाता....।
तुम्हीं हो देश के
भाग्य विधाता।।

(सात)
अनगिनत दीप जल गए
अंधकार
चारों तरफ अंधकार।
मच रहा हा ... हा ..कार।
छल, प्रपंच, अत्याचार
क्या यही है
समय के उपहार
नहीं....?
कभी
नहीं ....?
अचानक
प्रकृति के दर्पण में
एक चिंगारी छूटी
अनायास
रोशनी फैलती चली गयी।
दूर हुआ अंधेरा
ज्यों प्रकट हुआ
रात में सबेरा।
तब कुहासों के बादल
छट गए।
जब अनगिनत
दीप जल गए।।


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