सोमवार, 3 दिसंबर 2012

ग्रहों को अपने अनुकूल बनाये


कहा जाता हैं ’’ ग्रहा धिंन जगत सर्वम ’’ अर्थात प्रत्येक मनुष्य ग्रह के अधीन रहकर कार्य करता हैं और सांसारिक सुख एवं दुखः को भोगता हैं। किन्तु मनुष्य अपने सुख का समय तो आराम से बिता लेता हैं और जैसे ही कष्ट प्राप्त होते हैं उस समय उसे ईश्वर के शरणागत होना पड़ता हैं। अपने पूज्य श्रेष्ठ लोगों से राय मशवरा लेकर समय बिताना होता हैं। उसी परेशानी के हल हेतु जब वह किसी विज्ञ ज्योतिषी के पास जाता हैं तो ग्रहों के प्रतिकूल होने की जानकारी प्राप्त करता हैं। उन्हें अनुकूल बनाने हेतु उसे कई उपाय करना होते हैं इस हेतु आप निम्न उपाय कर ग्रहों का प्रतिकूल से अनुकूल बना सकते हैं। ये उपाय परिक्षती हैं और सहजता से कम खर्च में स्वंय के द्वारा अथवा सामान्य सहयोग लेकर किये जा सकते हैं।

सूर्य के प्रतिकूल होने पर: -
1. भगवान सूर्य नारायण को ताँबे के लौटे से सूर्योदय काल में जल चढ़ावें व 3ाोहम सूर्याय नमः का जाप करें।
2. भगवान सूर्य के पुराणोक्त, वेदोक्त अथवा बीच मंत्र से किसी एक का 28000 बार जाप करें अथवा योग्य ब्राह्मण से करवायें।
3. सूर्य यंत्र को अपने दाहिने हाथ बांधे।
4. रविवार को भोजन में नमक का सेवन न करें।
5. सूर्योदय पूर्व उठकर पवित्र हो सूर्य नमस्कार करें।

चन्द्र के प्रतिकूल होने पर: -
1. भगवान शिव की अराधना सूर्योदय काल में करें।
2. भगवान शिव के स्त्रोत पाठ करें।
3. चन्द्र के पुराणोक्त, वेदाक्त अथवा बीज मंत्र में से किसी एक का 44000 बार जाप करें अथवा जाप करवायें।
4. सोमवार का व्रत करें।
5. मोती, दूध, चांवल अथवा सफेद वस्तु का दान करें।

मंगल ग्रह के प्रतिकूल होने पर: -
1. मंगलवार का व्रत करें।
2. भगवान हनुमान जी की अराधना करें।
3. मंगल के पुराणोक्त, वेदोक्त, तंत्रोक्त अथवा बीज मंत्र का 40000 बार जाप करें।
4. मसूर की दाल, लाल वस्त्र, मूंगा आदि का दान करें।
5. हनुमान चालीसा अथवा सुन्दर काण्ड का पाठ प्रातः काल में करें।

बुध ग्रह के प्रतिकूल होने पर: -
1. भगवान गणेश जी की अराधना करें।
2. आप कोई भी बुध मंत्र 34000 बार जाप करें।
3. बुध स्त्रोत का पाठ करें।
4. मूंग की दाल, हरे वस्त्र, पन्ना आदि का दान करें।
5. विद्वानों को प्रणाम करें व सम्मान करें।

गुरू के प्रतिकूल होने पर: -
1. सूर्योदय पूर्व पीपल की पूजा करें।
2. भगवान नारायण (विष्णु) की आराधना करें व सन्तों का सम्मान करें।

शुक्र के प्रतिकूल होने पर: -
1. शुक्र स्त्रोत का पाठ करें।
2. नारीजाति का सम्मान करें।
3. सफेद चमकीले वस्त्र एवं सुगन्धित तेल आदि वस्तुओं का दान करें।
4. 3ाोम शुक्राय नमः या अन्य किसी शुक्र मंत्र का 64000 बार जाप करें।
5. औदुम्बर वृक्ष की जड़ को दाहिने हाथ पर सफेद डोरे में बाँधे।

शनि के प्रतिकूल होने पर: -
1. शनि स्त्रोत का पाठ करें एवं किसी भी शनि मंत्र का 92000 बार जाप करें।
2. जूते, चप्पल, लोहे, तेल आदि का दान करें।
3. शनिवार का व्रत करें एवं रात्रि में भोजन करें।
4. हनुमान चालीसा अथवा सुन्दर काण्ड का पाठ करें।
5. नित्य हनुमान जी के दर्शन कर कार्य प्रारम्भ करें।

राहू के प्रतिकूल होने पर: -
1. भगवान शिव की अराधना करें।
2. राहू के मंत्र का जाप करें।
3. गरीब व निम्न वर्ग के लोगों की मदद करें।
4. राहू स्त्रोत का पाठ करें।
5. सर्प का पूजन करें।

केतु के प्रतिकूल होने पर: -

1. भगवान गणेश जी की अराधना करें।
2. प्रतिदिन स्वास्तविक के दर्शन करें।
3. केतु के मंत्र का जाप करें।
4. गणेश चतुर्थी का व्रत करें।
5. लहसुनियां का दान करें।

अच्छे जीवन साथी के लिए करें यह उपाय


क्या आपका मन किसी को पाने के लिए या जीवन साथी बनाने के लिए मचल रहा है? क्या आपके पास सबकुछ होते हुये भी प्यार नहीं है? क्या आपकी शादी नहीं नहीं हो पा रही? तो ये परेशान मत होइए आज हम आपके लिए लाये हैं वो सभी उपाय जिनको करने के बाद आपकी प्रेमिका कहेगी कि मैं जोगन तेरे प्रेम की.........
 जब भी किसी को प्रेम करें तो याद रखें कि संयम और प्रतीक्षा सबसे उत्तम उपाय है 
ईश्वर से प्रेम के लिए प्रार्थना करनी चाहिए, क्योंकि दुआओं में असर होता है
प्रेम प्राप्ति के लिए आप भगवान् कामदेव और देवी रति के साथ साथ शिव-शक्ति,गणपति,और भगवान विष्णु जी की पूजा कर सकते हैं
इन्द्र देवता,अग्नि देवता,चन्द्रमा देवता,अप्सराओं व यक्षिणी देवियों की उपासना भी प्रेम प्रदान करती हैं 
देवी दुर्गा जी से मांगी गयी प्रेम व सुख शान्ति सौभाग्य की तत्काल पूर्ती होती है 
यदि प्रेम विवाह करना चाहते हैं तो ब्रत एवं दान बहुत सहायक होते हैं 
प्रेम प्राप्ति के कुछ अति सरल दिव्य मंत्र 
कृष्ण जी का मंत्र -ॐ क्लीं कृष्णाय गोपीजन बल्लभाय स्वाहा:
कृष्ण मंदिर में मुरली बांसुरी ले जा कर अर्पित करें 
पान अर्पण से प्रेम प्राप्ति होती है 
यदि प्रेम में फूट पड़ गयी हो तो उसे पुनह पाने के लिए भैरव जी की पूजा अचूक उपाय है
भैरव देवता को मीठी रोटी का प्रसाद बना कर अर्पित करें 
मानसिक तौर से उत्तरनाथ भैरव का मंत्र जपें 
भैरव जी का मंत्र-ॐ ज्लौम रहौं क्रोम उत्तरनाथ भैरवाय स्वाहा:
यदि आप किसी को अपना बनाना चाहते हैं तो माँ शक्ति की पूजा करे
माता को लाल रंग का झंडा अर्थात ध्वजा चढ़ाएं व मनोकामना मांगें 
माँ शक्ति का मंत्र-ॐ नमो मोहिनी महामोहिनी अमृत वासिनी स्वाहा:
देवराज इन्द्र की पत्नी इंद्रायणी की स्तुति को अमोघ माना जाता हैं कई ऋषि पुत्रियों ने उनकी स्तुति कर वर पाया है
इंद्रायणी देवी की पूजा उन्हें करनी चाहिए जो नहीं जानते की उनके जीवन में कौन आने वाला है 
तब देवी प्रसन्न हो कर अत्यंत स्रेष्ठ प्रेमिका व पति या पत्नी प्रदान करती है 
इंद्रायणी देवी का मंत्र-ॐ देवेंद्राणी विवाहं भाग्यमारोग्यम देहि मे
बीस के अंक को विवाह का अंक माना जाता है विवाह में समस्या पर चार खाने बना कर केवल बीस बीस लिखना चाहिय 
बीस के इस यन्त्र को धारण करने से या पास रखने से विवाह हो जाता है 


यन्त्र-  20     20     20     20
          20     20     20     20
          20     20     20     20
          20     20     20     20


गोमेद नामक रत्न को गलें में पहनने से विवाह लाभ होगा 
चांदी में मोती की अंगूठी पहनने से प्रेम बढेगा 
हीरे अथवा जरकन के आभूषण प्रेम में बृद्धि करेंगे 
नीलम की अंगूठी प्रतिष्ठित कर पहनने से और संकल्पित करने से प्रेम में सफलता मिलती है 
शहद के रुद्राभिषेक से मनचाहा प्रेम मिलेगा 
सोलह सोमवार के ब्रत से योग्य सुन्दर सुशील पति मिलेगा 
अन्न दान करने से प्रेम विवाह संपन्न होता है 
गौरी देवी को चुनरी श्रृंगार चढाने व मौली बांधने से मनमीत मिलता है 
मधुर व्यबहार मीठी बाणी जीवन में स्थाई प्रेम प्रदान करने में समर्थ हैं 
धीरज और संतोष के साथ साथ सकारात्मक आत्मविश्वास भी होना चाहिए 
योग मेडिटेशन और संगीत सहित शाकाहार को अपनाएँ 
नशों से दूर रहना चाहिए 

दक्षिणावर्ती शंख करेगा मालामाल


इस संसार में अनेकों वस्तुएं ऎसी होती है जो किसी चमत्कार से कम नहीं है। ऎसी चमत्कारी वस्तुओं में दक्षिणावर्ती शंख भी एक है। शंख की महिमा और महत्तव प्रत्येक अनुष्ठान में विशेष रूप से हैं।
भगवान विष्णु के चार आयुधों में शंख प्रमुख है। प्रत्येक विशेष पूजा में शंख द्वारा अभिषेक का महत्तव है। सभी विद्वान और आमजन इस चमत्कारी दक्षिणावर्ती शंख के प्रभाव और चमत्कार के बारे में एकमत हैं। समुद्र देव द्वारा निर्मित इस तेजस्वी शंख को जो मनुष्य अपने घर और व्यापार स्थल के पूजा स्थान अथवा तिजोरी में रखकर नित्य पूजा करता है, उस व्यक्ति की दरिद्रता, अभाव, असफलता और सभी रोगों का नाश होता है। ऎसा शास्त्रों में भी लिखा है।
मां लक्ष्मी और दक्षिणावर्ती शंख की उत्पत्ति समुद्र से ही हुई है। दक्षिणावर्ती शंख जिसके घर में होता है, वहां लक्ष्मी स्थिर होकर रहती है और सब मंगल ही मंगल होता है तंत्र शास्त्र में धन प्राप्ति के कई टोटके बताए गए हैं। इन टोटकों को करने से धन आदि सभी सुखों की प्राप्ति होती है। धन प्राप्ति का ऐसा ही एक अचूक टोटका इस प्रकार है-

टोटका

शुक्ल पक्ष के किसी शुक्रवार के दिन सुबह नहाकर साफ वस्त्र धारण करें और अपने सामने इस दक्षिणावर्ती शंख को रखें। शंख पर केसर से स्वस्तिक का चिह्न बनाएं और इसके बाद नीचे लिखे मंत्र का जप करें। मंत्र जप के लिए स्फटिक की माला का प्रयोग करें।

मंत्र

ऊँ श्रीं ह्रीं दारिद्रय विनाशिन्ये धनधान्य 
समृद्धि देहि देहि नम:

इस मंत्रोच्चार के साथ-साथ एक-एक चावल इस शंख के मुंह में डालते रहें। चावल टूटे न हो इस बात का ध्यान रखें। इस तरह रोज एक माला मंत्र जप करें। यह प्रयोग 30 दिन तक करें। पहले दिन का जप समाप्त होने के बाद शंख में चावल रहने दें और दूसरे दिन एक डिब्बी में उन चावलों को डाल दें। इस तरह एक दिन के चावल दूसरे दिन उठाकर डिब्बे में डालते रहें।।

30 दिन बाद जब प्रयोग समाप्त हो जाए तो चावलों व शंख को एक सफेद कपड़े में बांधकर अपने पूजा घर में, फैक्ट्री, कारखाने या ऑफिस में स्थापित कर दें। इस प्रयोग से आपके घर में कभी धन-धान्य की कमी नहीं होगी।

दक्षिणावर्ती शंख करेगा मालामाल


मंगलवार, 27 नवंबर 2012

अपनी उलझी समस्याओं को सुलझाएं



शक्तियों का साक्षात चमत्कार
धार्मिक ग्रंथों में उल्लेख मिलता है कि कलियुग में शक्तियों का साक्षात चमत्कार देखने को मिलता है। किसी भी जातक ने थोड़ी सी भी पूजा-अर्चना कर ली उसे तुरंत लाभ मिलता है। अगर आप भी किसी भी समस्या से घिरे हैं और तत्काल निदान चाहते हैं तो शक्तियों का अद्भुत चमत्कार अनुभव कर सकते हैं। अगर आपको बाकई ढोंगी तांत्रिकों, बाबाओं, जादू-टोना वालों से बेहद तंग और परेशान हो चुके हैं तो सच्ची शक्तियों की कृपा प्राप्त कर अपनी उलझी हुई समस्याओं का निदान प्राप्त कर जीवन को खुशहाल बना सकते हैं। एक बार आपने शक्तियों की विशेष कृपा प्राप्त कर ली तो आपका जीवन धन्य हो जाएगा। हर जातक के जीवन में अनेकानेक समस्याएं आती रहती हैं उन से वह कुछ समय के लिए छुटकारा तो पा लेता है लेकिन कई समस्याएं ऐसी हैं जो जिंदगी भर जातक इनसे छुटकारा नहीं पा सकता। रोजाना का पारिवारिक कलह, पति-पत्नी में मन-मुटाव, आसपास के पड़ोसियों की द्वेष भावना, ऊपरी हवा का चक्कर, जमीन-जायदाद, कोर्ट-कचहरी, प्रेम में विफलता, तलाक की नौबत, धन की बेहद तंगी, बेरोजगार, सास-बहू में अनबन, किसी भी काम में मन नहीं लगना, बीमारियों का पीछा नहीं छूटना, शत्रुता जैसी समस्याएं हर जातक को घेरे रहती हैं। अगर आप इन सभी का सटीक निदान चाहते हैं तो एक बार जरूर संपर्क करें।

- पंडित राज
चैतन्य भविष्य जिज्ञासा शोध संस्थान
एमआईजी-3/23, सुख सागर, फेस-2
नरेला शंकरी, भोपाल -462023 (मप्र), भारत
मोबाइल : +91-8827294576
ईमेल : panditraj259@gmail.com

शुक्रवार, 9 नवंबर 2012

ब्रह्माण्ड नायिका महालक्ष्मी की आलोक मणी है- दीपमाला


अभिमान की लहरों पर बैठी आस्था कांच का घर है। सत्ता लोलुपता की पराकाष्ठा आत्मघात की ओर बढ़ रही है। ऐसे समय में कम से कम परमात्मा का पता चल जाना चाहिए, जो तुम्हारे भीतर ही बसा हुआ है। विश्व को समग्रता में देखना और समझना है तो आस्था, विश्वास और कर्म को स्वीकार करना होगा। आस्था और विश्वास सृष्टिकत्र्ता के धर्म चक्र  हैं। सृष्टि के आगार में विभाजन नहीं, समग्रता है। श्रद्धा हर धड़कन को पहचानती है। हर मुद्रा उससे अनदेखी नहीं है। मौन की भी एक भाषा है और अर्थपूर्ण अगाध अर्थों का भण्डार है। मानव इसीलिए समाज प्रिय है, क्योंकि श्रद्धा और विश्वासों तथा आस्थाओं के मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे और गिरजाघर आज भी आलोकित हैं। प्रेम के क्षणों में कोई अर्थ नहीं खोजे जा सकते, अर्थों का आग्रह तो विवाद के लिए है। आज की आस्थाओं की केन्द्र हंै- दरगाहें। आध्यात्मिक दस्तावेज आज भी समय के हस्ताक्षर हैं। प्यार और आत्मीयता से ही सृष्टि का सौन्दर्य निखरता है। तो आइए, दीपोत्सव की प्रकाश बेला में हम सृष्टिकत्र्ता से वार्तालाप करें। आपके सुख और वैभव की कामना हेतु श्रीसमृद्धि की देवी मां लक्ष्मी जी की आराधना करते हुए दीपमालिका का महोत्सव मनाएं। ब्रह्माण्ड नायिका महामाया लालित्यमयी मां लक्ष्मी जी के पूजन की विधियां जो अनंत एवं व्यापक हैं। मां लक्ष्मी के श्रद्धालुजनों के हितार्थ संक्षिप्त विधि विधान सहित दीपमालिका के पुण्य महापर्व पर पूजन विधि समर्पित है।
- गृह मंदिर में पंच देव पूजा : घर में पूजा स्थल में प्रवेश करने के पूर्व बाहर दरवाजे पर ही आचमन कर लें और तीन बार तालियां बजाएं और विनम्रता के साथ पूजा स्थल (पूजा घर) में प्रवेश करें।
- पूजन सामग्री व्यवस्था : पूजन सामग्री किस ओर रखना चाहिए, इस बात का भी शास्त्र ने निर्देश दिया है। इसके अनुसार पूजन सामग्री को यथा स्थान सजा देना चाहिए। बायीं ओर - (1) सुवासित जल से भरा कलश (उद्कुम्भ) (2) घंटा (3) धूपदानी (4) तेल के दीपक 21, 31 या अधिक दायीं ओर - (1) घृत (घी) का दीपक (2) सुवासित जल से भरा शंख सामने (1) कुं कुम (केसर) और कपूर के साथ घिसा गाढ़ा चंदन (2) पुष्प (3) ताम्रपात्र तथा पूजन की अन्य सामग्री रखें। भगवान के सामने (आगे) चौकोर जल का घेरा डालकर नैवेद्य की वस्तुएं रखें। पूर्वामुखी अथवा उत्तराभिमुखी हो, आचमन कर अपने ऊपर तथा पूजन सामग्री पर
- मंत्र पढ़कर जल छिड़कें
मंत्र - ऊँ अपवित्र: पवित्रो वां सर्वावस्थां गतोऽपि वा।
य: स्मरेत् पुण्डरीकांक्ष स बाह्मभ्यन्तर: श्ुाचि:।।
-  कलश स्थापना : कलश पर रोली से स्वास्तिक का चिन्ह बनाकर कलश के गले में तीन धागा वाली मौली (रक्षा सूत्र) लपेटें। कलश स्थापना भूमि अथवा पाटे पर कुंकुम अथवा रोली से अष्ट दल कमल बनाएं। कलश में सुपारी, द्रव्य, दूब, पांच प्रकार के पत्ते, कुश आदि सुवासित जल में रख दें।
-   कलश (उदकुम्भ) की पूजा सुवासित जल से भरे हुए उदकुम्भ (कलश) की 'उद् कुम्भाय नम:Ó इस मंत्र से चन्दन, पुष्प, अक्षत (चावल) से पूजा कर उसमें तीर्थों के जल, चारों वेदों, तीर्थों, नदियों, सागरों, देवी-देवताओं का आवाहन करने के पश्चात् अक्षत और पुष्प कलश के पास छोड़  दें।
-  मंत्र
कलशस्य मुखे विष्णु: कण्ठे रुद्र: समाश्रित:।
मूले त्वस्य स्थितो ब्रह्मा मध्ये मातृगणा: स्मृता:।।
कुक्षौ तु सागरा: सर्वे सप्तद्वीपा वसुन्धरा।
ऋ वेदोऽथ युजुर्वेद: सामवेदो ह्यथर्वण:
अंगेश्च सहिता: सर्वे कलशं तु समाश्रिता:।
अत्र गायत्री सावित्री शान्ति: पुष्टिकरी तथा।।
आयान्तु देव पूजार्थं दुरितक्षयकारका:।।
गंगे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति।
नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन संनिधिं कुरू।।
सर्वे समुद्रा: सरितस्तीर्थानि जलदा नदा:।
आयान्तु मम शान्त्यर्थं दुरितक्षयकारका:।।
(आवाहन के पश्चात् कलश के मुख पर पूजित नारियल रख दें)
रू    शंख पूजन : शंख में दो दूर्वा, तुलसी और पुष्प डालकर ऊँ कहकर उसे सुवासित जल से भर दें। फिर निम्न मंत्र पढ़कर शंख में तीर्थों का आवाहन करेंं -
2    मंत्र- पृथिव्यां यानि तीर्थानि स्थावराणि चराणि च।
        तानी तीर्थानि शंखेऽस्मिन् विशन्तु ब्रह्मशासनात।।
अब शंखाय नम:, चन्दनं समर्पयामि कहकर, चन्दन लगाएं, तत्पश्चात् शंखाय नम: पुष्पं समर्पयामि कहकर पुष्प चढ़ाएं। देव पूजन में वेद मंत्र फिर आगम मंत्र और बाद में नाम मंत्र का उच्चारण किया जाता है। पूजा पात्रों को यथा स्थान पर रखकर पूर्व दिशा की ओर मुंह करके-आसन पर बैठकर तीन बार आचमन करना चाहिए। (1) ऊँ केशवाय नम: (2) ऊँ नारायणाय नम: (3) ऊँ माधवाय नम: आचमन के बाद बायें हाथ में जल लेकर दाहिने हाथ से अपने ऊपर और पूजन सामग्री तथा पूजन स्थल पर बैठे श्रद्धालुओं पर जल छिड़कना चाहिए।
- स्वस्ति वाचन
श्री मन्महागणाधिपतये नम:। श्री लक्ष्मी नारायणभ्यां नम:।।
-  पंचदेव पूजन विधि : हाथ में पुष्प, अक्षत आदि लेकर निम्न मंत्रों का जाप कर वेदी पर चढ़ाएं -
(1) श्री मन्ममहागणाधिपतये नम:
(2) लक्ष्मी नारायणाभ्यां नम:
(3) उमा महेश्वराभ्यां नम:
(4) मातृ-पितृ चरणकमलेभ्यो नम:
(5) इष्ट देवताभ्यो नम:
(6) कुल देवताभ्यो नम:
(7) ग्राम देवताभ्यो नम:
(8) वास्तु देवताभ्यो नम:
(9) सर्वेभ्यो देवेभ्यो नम:
-  महालक्ष्मी पूजन विधि : भगवती लक्ष्मी चल एवं अचल, दृश्य, अदृश्य सभी सम्पत्तियों, सिद्धियों एवं निधियों की अधिष्ठात्री साक्षात् नारायणी हैं। भगवान श्रीगणेश सिद्धि, बुद्धि एवं शुभ और लाभ के स्वामी हैं तथा सभी अमंगलों एवं विघ्नों के नाशक हैं। ये सत-बुद्धि प्रदान करने वाले हैं। अत: इनके समवेत पूजन से सभी कल्याण-मंगल एवं आनंद प्राप्त होते हंै। पूजन के लिए किसी चौकी या कपड़े के पवित्र आसन पर गणेश जी के दाहिनी ओर माता महालक्ष्मी की स्थापना करना चाहिए। प्रतिष्ठा - बायें हाथ में अक्षत लेकर निम्न मंत्रों को पढ़ते हुए दाहिने हाथ से उन अक्षतों को गणेश जी की प्रतिमा (चित्र) पर छोड़ते जाएं। भगवान गणेश का ध्यान करें-
2    मंत्र - गजानंन भूतगणादि सेवतं कपित्थ जम्बूफल चारू भक्षणम।
    उमा सुतं शोक विनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वर पाद पंकजम।।
इसके पश्चात् प्रधान पूजा में भगवती महालक्ष्मी का पूजन करें।
ध्यान मंत्र - (आवाहन)
सर्व लोकस्य जननीं सर्व सौख्यप्रदायिनीम्।
सर्वदेवमयीमीशां देवीभावाहयाभ्याहम्।।
ऊँ तां म आ वह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम।
यस्यां हिरण्यं विन्देयं गामश्वं पुरुषानहम्।।
आवाहन के लिए पुष्प लें-
2    मंत्र- ऊँ महालक्ष्म्यै नम:। महालक्ष्मी मावाहयामी,
आवाहनार्थे पुष्पाणि समर्पयामी। (आवाहन के लिए पुष्प लें)
आसन के लिए - (कमल आदि पुष्प लें)
2    मंत्र - ऊँ महालक्ष्म्यै नम:। आसनं समर्पयामी
(आवाहन के लिए कमलादि पुष्प अर्पित करें)
पाद्य -
2    मंत्र - ऊँ महालक्ष्म्यै नम:। पादयो: पाद्यं समर्पयामि।
(चन्दन-पुष्पादियुक्त जल अर्पित करें)
अघ्र्य -
2    मंत्र - ऊँ महालक्ष्म्यै नम:। हस्तयोरध्र्यं समर्पयामी।
(अष्टगंध मिश्रित जल अध्र्य पात्र से देवी जी के हाथों में दें)
आचमन -
2    मंत्र - ऊँ महालक्ष्म्यै नम:। आचमनीयं जलं समर्पयामी
(आचमन के लिए जल चढ़ावें)
स्नान -
2    मंत्र - ऊँ महालक्ष्म्यै नम:। स्नानं जलं समर्पयामी।
(शुद्ध जल से मंत्रोच्चार के साथ स्नान करावें)
दुग्ध स्नान -
2    मंत्र - ऊँ महालक्ष्म्यै नम:। पय: स्नानं समर्पयामी।
पय: स्नानान्ते शुद्धोदक स्नानानं समर्पयामी।
(दूध से स्नान कराने के बाद पुन: शुद्ध जल से स्नान करावें)
दधि स्नान -
2    मंत्र - ऊँ महालक्ष्म्यै नम:। दधि स्नानं समर्पयामी।
दधि स्नानान्ते शुद्धोदक स्नानं समर्पयामी।
(दही से स्नान कराने के बाद पुन: शुद्ध जल से स्नान करावें)
घृत स्नान-
2    मंत्र - ऊँ महालक्ष्म्यै नम:। घृत स्नानं समर्पयामी।
घृत स्नानान्ते शुद्धोदक स्नानं समर्पयामी।।
(घी से स्नान कराने के बाद पुन: शुद्ध जल से स्नान करावें)
मधु स्नान (शहद)
2    मंत्र - ऊँ महालक्ष्म्यै नम:। मधु स्नानं समर्पयामी।
    मधु स्नानान्ते शुद्धोदक स्नानं समर्पयामी।।
(मधु स्नान के बाद पुन: शुद्ध जल से स्नान करावें)
शर्करा स्नान (शक्कर)
2    मंत्र - ऊँ महालक्ष्म्यै नम:। शर्करा स्नानं समर्पयामी।
शर्करा स्नानान्ते शुद्धोदक स्नानं समर्पयामी।।
(शर्करा स्नान के बाद पुन: शुद्ध जल से स्नान करावें)
पंचामृत स्नान-
2    मंत्र - ऊँ महालक्ष्म्यै नम:। पंचामृत स्नानं समर्पयामी।
पंचामृत स्नानान्ते शुद्धोदक स्नानं समर्पयामी नम:।।
(पंचामृत से स्नान कराने के बाद पुन: शुद्ध जल से स्नान करावें)
मां लक्ष्मी जी को स्नान कराने के पश्चात् प्रतिमा का अंग-प्रोक्षण कर शुद्ध पीले या लाल वस्त्र की आसनी पर उन्हें विराजमान करें।
वस्त्र
2    मंत्र- ऊँ महालक्ष्म्यै नम:। वस्त्रं समर्पयामी (वस्त्र अर्पित करें)
आभूषण
2    मंत्र- ऊँ महालक्ष्म्यै नम:। नानाविधानी कुण्डलकटकादीनि
आभूषणानि समर्पयामि।
(आभूषण समर्पित करें)
सिन्दूर चढ़ावें
2    मंत्र- ऊँ महालक्ष्म्यै नम:। सिन्दूरं समर्पयामि
(देवीजी को सिन्दूर चढ़ावें)
कुंकुम अर्पित करें
2    मंत्र - कुंकुम कामदं दिव्यं कुंकुम कामरूपिणम्।
अखण्डकाम सौभाग्यं कुंकुमं प्रतिगृहयताम्।।
ऊँ महालक्ष्म्यै नम: कुंकु म समर्पयामि।
(कुंकुम अर्पित करें)
पुष्पसार (इत्र) अर्पित करें -
2    मंत्र- तैलानि च सुगन्धीनि द्रव्याणि विविधानि च।
मया दत्तानिलेपार्थं गृहाण परमेश्वरि।
(सुगंधित तेल एवं इत्र चढ़ावें)
अक्षत अर्पित करें
2    मंत्र - ऊँ महालक्ष्म्यै नम:। अक्षतान् समर्पयामि।।
(कुं कुमयुक्त अक्षत अर्पित करें)
पुष्पमाला चढ़ावें -
2    मंत्र - माल्यादीनि सुगन्धीनि मालत्यादीनि वै प्रभो।
मयानीतानि पुष्पाणि पूजार्थं प्रतिगृह्यताम।।
ऊँ मनस: काममाकूतिं वाच: सत्यमशीमहि।
पशूनां रूपमन्न्स्यमयि श्री: श्रयतं यश:।।
(पुष्प तथा पुष्पमालाओं से अलंकृत करें यथा संभव लाल कमल के
फूलों से)
दूर्वा चढ़ावें
2    मंत्र - विष्णवादिसर्वदेवानां प्रियां सर्वेसुशोभनाम्।
क्षीरसागरसम्भूते दूर्वां स्वीकुरू सर्वदा।।
ऊँ महालक्ष्म्यै नम:। दूर्वाअंकुरान समर्पयामी
(मंत्र जाप के साथ दूर्वा चढ़ावें)
अंग पूजा - रोली, कुंकुम मिश्रित अक्षत-पुष्पों से निम्नांकित एक-एक मंत्र पढ़ते हुए अंग पूजा करें।
(1) ऊँ चपलायै नम:, पादौ पूजयामि।
(2) ऊँ चंचलायै नम:, जानुनी पूजयामि।
(3) ऊँ कमलायै नम:, कटि पूजयामि।
(4) ऊँ कात्यायन्यै नम:, नाभिं पूजयामि।
(5) ऊँ जगन्मात्रे नम:, जठरं पूजयामि।
(6) ऊँ विश्ववल्लभायै नम:, वक्ष: स्थलं पूजयामि
(7) ऊँ कमलावासिन्यै नम:, हस्तौ पूजयामि
(8) ऊँ पदमाननायै नम:, मुखं पूजयामि।
(9) ऊँ कमलापत्राक्ष्यै नम:, नेत्रत्रयं पूजयामि
(10) ऊँ श्रियै नम: शिर:, पूजयामि
(11) ऊँ महालक्ष्म्यै नम:, सर्वांग पूजयामि
-  अष्ट लक्ष्मी पूजन : तदोपरान्त पूर्वादि क्रम से आठों दिशाओं में महालक्ष्मी के पास कुंकुमायुक्त अक्षत तथा पुष्पों से एक-एक मंत्र (के जाप) पढ़ते हुए आठ लक्ष्मियों का पूजन करें -
(1) ऊँ आद्यलक्ष्भ्यै नम:
(2) ऊँ विद्यालक्ष्भ्यै नम:
(3) ऊँ सौभाग्यलक्ष्भ्यै नम:
(4) ऊँ अमृतलक्ष्भ्यै नम:
(5) ऊँ कामलक्ष्भ्यै नम:
(6) ऊँ सत्यलक्ष्भ्यै नम:
(7) ऊँ भोगलक्ष्भ्यै नम:
(8) ऊँ योगलक्ष्भ्यै नम:
धूप अर्पित करें
2    मंत्र - ऊँ लक्ष्भ्यै नम: धूपमाध्रापयामि। (धूप दें) दीप पूजन (दीपोत्सव) कृपया, ध्यान रखें- दीपावली पूजन को दीपोत्सव भी कहते हंै। इसमें कम से कम 11, 21 या अधिक दीप प्रज्ज्वलित किये जाने चाहिए। किसी पात्र में (पीतल/स्टील का पात्र)। मंत्र के साथ- ऊँ दीपावल्यै नम: के साथ दीपों का गन्धादि उपचारों द्वारा - पूजन कर निम्न मंत्रों का जाप करें तथा पूजनोपरान्त धान का लावा इत्यादि पदार्थ गणेशजी, महालक्ष्मी जी तथा अन्य सभी देवी-देवताओं को अर्पित कर सभी दीपों को प्रज्ज्वलित कर पूजास्थल को अलंकृत कर दें।
(1) ऊँ लक्ष्म्यै नम:, दीपं दर्शयामी
(2) ऊँ गं गणपतये नम:, दीपं दर्शयामी
(3) ऊँ नारायणाय नम:, दीपं दर्शयामी
(4) ऊँ शिवाय नम:, दीपं दर्शयामी
(5) ऊँ ब्रह्मणे नम:, दीपं दर्शयामी
(6) ऊँ सरस्वतै नम:, दीपं दर्शयामी
(7) ऊँ महिषमर्दिनी नम:, दीपं दर्शयामी
(कलश के चारों ओर नवग्रहों हेतु दीपक रखे, मंत्र जाप के साथ)
(1) ऊँ सूर्याय नम:, दीपं दर्शयामी
(2) ऊँ चन्द्रमाये नम:, दीपं दर्शयामी
(3) ऊँ भौमाय नम:, दीपं दर्शयामी
(4) ऊँ बुधाय नम:, दीपं दर्शयामी
(5) ऊँ बृहस्पतयै नम:, दीपं दर्शयामी
(6) ऊँ शुक्राय नम:, दीपं दर्शयामी
(7) ऊँ शनैश्चराय नम:, दीपं दर्शयामी
(8) ऊँ राहवे नम:, दीपं दर्शयामी
(9) ऊँ केतवे नम:, दीपं दर्शयामी
नैवेद्य निवेदित कर- जल अर्पित करें
2    मंत्र - ऊँ महालक्ष्म्यै नम: नैवेद्यं निवेदयामि, मध्ये पानीयम, उत्तराषोऽशनार्थं हस्त प्रक्षालनार्थं, मुख प्रक्षालनार्थं च जलम् समर्पयामि
आचमन - मंत्र के साथ आचमन के लिए जल लें
2    मंत्र - ऊँ महालक्ष्म्यै नम:, आचमनीयं जलं समर्पयामि।
(नैवेद्य निवेदन करने के पश्चात् आचमन के लिए जल लें)
ऋ तुफल - मंत्र के साथ मां लक्ष्मी जी को ऋतु फल अर्पित कर आचमन हेतु जल लें।
2    मंत्र - ऊँ महालक्ष्म्यै नम: अखण्ड ऋ तुफलं समर्पयामि।
आचमनीयं जलं च समर्पयामि।।
मिष्ठान - मंत्र के साथ मां लक्ष्मी जी को मिष्ठान अर्पित करें।
2    मंत्र - ऊँ महालक्ष्म्यै नम:, मिष्ठानं समर्पयामि।
ताम्बूल - (पूंगीफल) - मां लक्ष्मी जी को इलायची, लोंग, सुपाड़ी ताम्बूल (पान) अर्पित करें, इस मंत्र के साथ
2    मंत्र - ऊँ महालक्ष्म्यै नम: मुखवासार्थे ताम्बूलं समर्पयामि।
दक्षिणा - परिवार/व्यवसाय स्थल पर सभी उपस्थित जन दक्षिणा चढ़ावें, मंत्र जाप के साथ।
2    मंत्र - ऊँ महालक्ष्म्यै नम:, दक्षिणां समर्पयामि
प्रदक्षिणा (हाथ जोड़कर)-
2    मंत्र - यानि कानि च पापानि जन्मान्तरकृतानि च।
तानि सर्वाणिनश्यन्तु प्रदक्षिणपदे-पदे।
प्रार्थना (हाथ जोड़कर)
2    मंत्र - ऊँ महालक्ष्म्यै नम: प्रार्थनापूर्वकं नमस्कारान् समर्पयामि।
(प्रार्थना करते हुए नमन करें)
पूजन के अंत में - (समर्पण)
2    मंत्र - कृतेनानेन पूजनेन भगवती महालक्ष्मीदेवी प्रीयताम् न मम।
(यह मंत्र उच्चारण कर समस्त पूजन कर्म भगवती महालक्ष्मी को समर्पित करें तथा जल गिराएं। उपस्थित जनों को तिलक लगाएं और हाथ में मौली बांधें।)
2    आरती - मां महालक्ष्मी जी आरती करें सभी उपस्थित श्रद्धालुओं के साथ। अन्त में - प्रसाद वितरण कीजिए।
धनतेरस-दीपावली शुभ मुहूर्त
दीपावली का शुभारभ धनतेरस को दीप जलाकर करते हैं। धनतेरस तिथि का शुभ मुहूर्त 11.11.2012, रविवार को प्रात: 10 बजे से 12.11.2012, सोमवार को
प्रात: 8.15 मिनट तक, तदोपरांत छोटी दीवाली (नरक चैदस)। दीपावली 13.11.2012
को प्रात: 6.15 से रात्रि अन्त तक। 14.11.2012 को गोवर्धन पूजा।
लक्ष्मीपूजन का मुहूर्त 13 नवम्बर, 2012 दिन मंगलवार को सांय 5.15 से
रात्रि 2.20 तक। पूजन का विशेष शुभ मुहुर्त रात्रि 7.30 से 9 बजे एवं रात्रि 10.30 से 2.20
के मध्य है।


- पंडित पीएन भट्ट
अंतरराष्ट्रीय ज्योतिर्विद,
अंकशास्त्री एवं हस्तरेखा विशेषज्ञ
संचालक : एस्ट्रो रिसर्च सेंटर
जी-4/4,जीएडी कॉलोनी, गोपालगंज, सागर (मप्र)
मोबाइल : 09407266609
फोन : 07582-227159,223168 


शनिवार, 6 अक्टूबर 2012

दर्शकों के दिलों में बसना चाहता हूं : दिलजान




सुर क्षेत्र में कमाल दिखा रहे पंजाब की शान दिलजान से बातचीत




परिणीता नागरकर

'फतह सुरों की, जीत संगीत की पर आधारित सुर-क्षेत्र रियल्टी शोज के बादशाह गजेन्द्र सिंह का भव्य पैमाने पर बना सिंगिंग रियल्टी शो है जो दर्शकों का पंसदीदा शो बन गया है। सहारा वन, कर्लस और पाकिस्तान के जियो टी वी पर प्रसारित हो रहे इस शो में 12 प्रतियोगी भाग ले रहे हैं। इन प्रतियोगियों में करतारपुर (जालन्धर) में जन्मे युवा गायक दिलजान की गायिकी के सभी दीवाने बन गये हैं। उनकी आवाज का जादू सिर चढ़ कर बोल रहा है। पंजाब की शान दिलजान पिछले दिनों दुबई में इस शो की पहले भाग की शूटिंग खत्म करने के बाद पंजाब आए तो उन्होंने इस शो के बारे में अपने अनुभवों को बड़े फक्र से बताया। उनसे हुई बातचीत के प्रमुख अंश:

इस शो की खासियत क्या है?
'सुर-क्षेत्र एक अलग फार्मेट पर बना सिंगिंग रियल्टी शो है जो भारत और पाकिस्तान में छिपी संगीत प्रतिभाओं को दुनिया के सामने प्रस्तुत करेगा। इस शो के सभी 12 प्रतियोगी आजकल दर्शकों का दिल जीतने की कोशिशकर रहे हैं।

आपका इस शो के लिए चयन कैसे हुआ?
दिसंबर 2011 में सुर-क्षेत्र के लिए लुधियाना में आंडिशंस हुए थे। तकरीबन 300 चुने गये प्रतियोगियों में से केवल मुझे ही मुबंई में फाईनल ऑडिशन के लिए चुना गया। मैंने ऑडिशनस में गजलों के बादशाह स्वर्गीय जगजीत सिंह का यादगार गीत चिट्ठी न कोई संदेश और सूफियाना गीत 'आयो नी संयो गाया। गजेन्द्र सिंह की टीम को मुझमें एक सुरीली आवाज नजर आयी। मुंबई में भी मैंने अपनी गायिकी के बल पर हिमेश रेशमिया जैसे गायक और संगीत निर्देशक का दिल जीता।

आपकी नजर में हिमेश रेशमिया और आतिफ असलम कैसे हैं ?
देखिये हिमेश रेशमिया भारतीय टीम के कप्तान हैं और आतिफ असलम पाकिस्तान टीम के। दोनों संगीत क्षेत्र के धुरंधर माने जाते हैं। सेट पर दोनों अपने अपने प्रतियोगियों का हौसला बढ़ाते हैं। मुझे हिमेशजी से बहुत कुछ सीखने को मिला है। उन्होंने मेरी प्रतिभा को परखा और पहचाना अैर अब मैं उनकी और दर्शकों की कसौटी पर खरा उतरने की कोशिश करूंगा।

संगीत में आपके गुरु कौन हैं?
मेरा बचपन से यह सपना था कि मैं एक गायक बनूं। मेरे पिताजी ने मुझे इस क्षेत्र में आने की प्रेरणा दी। मुझे उस्ताद पूर्ण शाह कोटी का आशीर्वाद मिला है। मेरे सिर पर मास्टर सलीम जैसे अच्छे गायक का हाथ भी है। मैं इन सभी संगीत की चर्चित हस्तियों का शुक्रगुजार हूं जिनकी बदौलत मैं आज इस मुकाम पर पहुंचा हूं।

सुर क्षेत्र के जजों के बार में बताएं?
आशा भौसले जी, आबिदा परवीन जी और रूना लैला जी इस शो की जज हैं। तीनों का अपना अपना नजरिया है। सभी जज प्रतियोगिता में अच्छे सुरों का विशेष ध्यान रखते हैं। सुरों का जिसे अच्छा ज्ञान है वो ही इस शो का विजेता होगा। मै आशा जी से बहुत प्रभावित हूं। उन्होंने कई बार खड़े होकर मेरे गाये गीतों की प्रशंसा की है। मेरी नजर में तीनों जज बाखूबी अपनी भूमिका निभा रहे हैं।

आपका संगीत का अब तक का सफर कैसा रहा?
मेरा संगीत का सफर अब तक अच्छा ही रहा है। मैं 2006 में 'आवाज पंजाब दी म्यूजिकल कंटेस्ट में रनर अप रहा। 'मेरी एक माता की भेंटों की एलबम आ चुकी है। दूसरी एलबम भी लगभग तैयार है जो इस शो के बाद रिलीज होगी। मेरी दूसरी एलबम का संगीत सचिन आहूजा ने दिया है।

आपका लक्ष्य क्या है?
बतौर गायक दर्शकों के दिलों में बस जाना। जैसा कि सभी गायकों का सपना होता है। कि वो बॉलीवुड में भी फिल्मों में गाएं तो मेरा भी यही सपना और लक्ष्य है।