गुरुवार, 26 नवंबर 2015

जीवन से निराश न हों, उपाय करें



हर जातक जीवन में प्रयास करता है कि हमें यश, वैभव, कीर्ति, धन संपदा व वो सारी खुशियां मिलें जो हम चाहते हैं, लेकिन जब दुर्भाग्य साथ लगा होता है तो जातक परेशान व चारों ओर संकट से घिर जाता है। ऐसे में उसे कोई उपाय नहीं सूझता कि आखिर हम क्या करें जिससे सब कुछ अच्छा हो जाए। समाज में मान-प्रतिष्ठा मिले, परिवार में शांति अमन-चैन रहे और धन-संपदा की कभी कमी न होकर किसी के आगे हाथ न फैलाना पड़े। अगर नीचे लिखी समस्याएं आपके साथ हैं तो हम आपको बेहतरीन एक उपाय बताएं जिससे आप सुख व शांति से समय व्यतीत कर अपने जीवन का हर लक्ष्य प्राप्त कर सकेंगे।

ये हैं आपकी समस्याएं-
- क्या आप अपने जीवन से तंग आ चुके हैं?
- क्या आप धन की कमी से परेशान हैं?
- क्या आप पारिवारिक कलह से झुंझलाहट व क्रोध में रहते हैं।
- आप बच्चों की शादी से संकट में हैं?
- क्या आप कोर्ट-कचहरी के चक्कर लगाकर थक चुके हैं?
- क्या आपके ऊपर या परिजनों पर बुरी नजर लगी है?
- क्या आप हमेशा भाग्य को दोष देते रहते हैं?
- क्या आपका व्यापार-धंधा, उद्योग ठप है?
- क्या आपको नौकरी में प्रमोशन नहीं मिल रहा?
- क्या आप किसी को अपने वश में करना चाहते हैं?
- क्या आपकी जमीन, जायदाद जबरन हड़प ली है?
- क्या आप कोई नई नौकरी की तलाश में हैं?
- क्या आप एक अच्छा इंसान बनना चाहते हैं?
- क्या आपको मकान बनवाने में कई अड़चनें आ रही हैं?
- क्या आप अपनी धर्मपत्नी से परेशान हैं?
- क्या आप अपने पति की बुरी आदतें सुधारना चाहती हैं?
- क्या आपका बच्चा/बच्ची गुम हो गया है और सब प्रयासों
   के बावजूद वह नहीं मिल रहा है।
- क्या आप लव-मैरिज करना चाहते हैं?
- क्या आप अपनी सास को सुधारना चाहती हैं?
- क्या आपका कहना आपके बच्चे नहीं मानते?
- क्या आप अपने बच्चों को परीक्षा में अच्छे नंबर दिलाना चाहते हैं?
- क्या आप बार-बार दुर्घटना के शिकार हो रहे हैं?
- क्या आपके घर में बार-बार दुर्घटनाएं घटित हो रही हैं?

एक उपाय जो बदल देगी आपकी किस्मत

हर धार्मिक ग्रंथ में एक ही उपाय बताया गया है कि कर्म करो, फल की इच्छा मत करो। ईश्वर सब जानता है। लेकिन जब दुर्भाग्य साथ जुड़ जाता है तो जातक कुछ नहीं कर पाता। कई वर्षों के शोध एवं अनुसंधान से हमारे संस्थान ने एक उच्चकोटि का तंत्र (ताबीज) स्वर्णभस्म, पारा एवं 18 अन्य बहुमूल्य चीजों से निर्मित किया है। यह तंत्र (ताबीज) प्राण-प्रतिष्ठित किया हुआ है, जिसका प्रभाव जिंदगी भर रहता है। इसके गले में धारण करने से आपका दुर्भाग्य, सौभाग्य में बदल जाएगा। इसके धारण करते ही आप इसका प्रभाव स्वयं देख सकते हैं। यंत्र की न्यौछावर मात्र 501 रुपये (सामान्य) एवं 1100 रुपये (स्पेशल) है।
नोट - तंत्र (ताबीज) पहनकर किसी के निधन, उठावनी, क्रियाक्रम संस्कार में नहीं जाना है, न ही शवयात्रा के पास से गुजरना है।


चैतन्य भविष्य जिज्ञासा शोध संस्थान

एमआईजी-3/23, सुख सागर फेस-2
नरेला शंकरी, भोपाल- 462023 (मप्र)
ईमेल : panditraj259@gmail.com
मोबाइल नं. + 91-8827294576







शनिवार, 5 अप्रैल 2014

ज्योतिष के आइने में मर्यादा पुरुषोत्तम राम


ब्रह्माण्ड नायक प्रभु श्रीराम के जन्मोत्सव पर विशेष

सृष्टि संचालक विराट महापुरूष की सूर्य व चन्द्रमा के समान ये दोनों ऑखे, सम्पूर्ण मानव सभ्यता को प्रेरणा देती रहेंगी। मर्यादा पुरूषोत्तम राम युग -युगाव्द तक याद किये जायेंगे। भगवान श्रीराम राघवेन्द्र थे। इनका जन्म अयोध्या में हुआ। वे समस्त भारत भू मण्डल के चक्रवर्ती सम्राट कहलाते थे। सूर्यवंषीय श्रीराम चैत्र षुक्ल, नवमी, दिन को ठीक 12 बजे अभिजित मुहूर्त में अवतीर्ण हुऐ। भगवान श्रीराम की कुण्डली में सूर्य, मंगल, गुरू, षनि उच्च राषिगत तथा चन्द्र स्वक्षेत्री थे। भगवान राम का जन्म चर लग्न में हुआ। उनकी जन्म पत्रिका कें चारों केन्द्रों में उच्च के ग्रह पंच महापुरूष के योग, का निर्माण कर रहे है। वृृहस्पति से हंस योग, षनि से षष योग, मंगल से रूचक योग का निर्माण हो रहा है। लग्नस्थ कर्क राषि गत गुरू और चंद्र गजकेसरी योग। कर्क लग्न में सप्तमस्थ उच्च राषिगत मंगल पंचमेष और राज्येष बन कर प्रबल राजयोग बना रहा है सूर्य उच्च राषिगत होकर राज्य भाव (कर्म भाव) में होने से भगवान राम चक्रवर्ती बने। उन्होने युगों तक राज्य किया। भगवान श्रीरामचन्द्र जी की जन्म कुण्डली पर अपनी अल्प बुद्धि से ज्योतिषीय विवेचना का प्रयास किया। विद्वतजनों से आग्रह है त्रुटियों को क्षमा करें। भगवान श्रीराम के जन्मदिन पर प्रस्तुत हैं बड़े विनम्र भक्तभाव से यह ज्योतिषीय कलेवर, कौतुकता से इसे निहारें। भगवान श्रीराम दीर्घकाल तक सभी जातकों की रक्षा करें।

भगवान श्रीराम की जन्म कुडली


भगवान श्रीराम की कुण्डली के दसम भवन में सूर्य उच्च राषि में विराजमान हैं। सूर्य देव 12 कलाओं में मर्यादित हैं फलत: श्रीराम का चरित्र मर्यादित है। इसलिये उन्हें मर्यादा पुरूषोत्तम भी कहा गया है। वे सत्य वक्ता थे। उनके मुख से जो वचन निकल गया वह सत्य होता था। पूर्ण होता था। अमोघ होता था। महाकवि तुलसीदास जी ने रामायण में लिखा है रघुकुल रीति सदा चली आई प्राण जाहि पर वचन नहीं जाही। सूर्य, दसम भवन में राज्य, कीर्ति का कारक ग्रह भी हैं अस्तु प्रभु राम चाहें वे अयोध्या में रहे हो या अपने विद्याकाल में गुरू वसिष्ठ के गुरूकुल में अथवा वन में या चक्रवर्ती सम्राट के रूप में अयोध्या में रहे हों। उनकी यष, कीर्ति न्याय व्यवस्था मानव सभ्यता में सदैव स्तुत्यनीय तथा अनंतकाल तक कीर्ति पताका दिग्दिगंत तक फहराती रहेगी। दषरथ पुत्र राम की जन्म कुण्डली में चन्द्र देव स्वक्षेत्री कर्क लग्न में उच्च राषिगत देव गुरू वृहस्पति के साथ विराजमान होकर कह रहे है कि यह जातक तन, मन से विलक्षण प्रतिभा सम्पन्न होकर सुदर्षनीय तो होगा ही साथ ही, षील तत्व, स्वभाव कार्यकुषलता की दृष्टि से एक ऐेसे विराट व्यक्तित्व का धनी होगा, जिसे विष्व मानव समाज श्रद्धामयी दृष्टि से अपलक निहारता हुआ राममय हो जायेगा।
द्वितीय भवन : भरताग्रज राम की कुण्डली के द्वितीय भवन का स्वामी नवग्रहों का राजा सूर्य विराजमान है, सूर्य कुलभूषण श्री राम इक्ष्वाकु वंष की महानता को कलकल करती गंगा की तरह सदैव यषस्वी बनाये रखेंगे। द्वितीय भवन  ज्योतिषीय गंरथों में द्वितीय भवन से जातक के नाक, कान, नेत्र, मुख, दंत, कण्ठ स्वर, सौन्दर्य, प्रेम आदि से जातक के व्यक्तित्व को देखा जाता है। भगवान श्रीराम सौन्दर्य की अदभुत प्रतिमा तथा प्रेम के अर्थ को समझने के लिए तीनों माताओं के प्रति श्रद्धा, भाईयों के प्रति अगाध स्नेह, सुमंत से लेकर समस्त अयोध्यावासियों के प्रति कर्तव्यपरायणता, सुग्रीव, विभीषण आदि अनगिनत मित्रों के प्रति चिरस्मरणीय स्नेहमूर्ति तथा भार्या जनकनंदिनी सीता के प्रति अलौकिक प्रीति ने ही उन्हें लंकापति रावण से युद्ध की अनिवार्यता स्वीकारी थी।
तृतीय भवन - पवन पुुत्र हनुमानजी के इष्ट प्रभु श्रीराम की कुण्डली के तृतीय भवन में कन्या राषिगत स्वक्षेत्री राहु विराजमान है। तृतीय भवन बन्धु , पराक्रम, षौर्य, योगाभ्यास, साहस आदि का मीमांसा का गृह है। भगवान श्रीराम का षौर्य, पराक्रम तो राम रावण के भीषण युद्ध में परिलक्षित होकर सदैव अविस्मरणीय रहेगा। भ्रात प्रेम में तो प्रभु श्रीराम का भरत प्रेम, जो समस्त प्रेमों की ज्ञानगंगा है।
चतुर्थ भवन -  कौषल्यानंदन श्रीराम की जन्म कुण्डली के चतुर्थ भवन में तुला राषि में उच्च राषिगत षनिदेव विराजमान हैं ज्योतिष ग्रंथों में चतुर्थ भवन से व्यक्ति के अन्त:करण, सुख, षान्ति, भूमि, भवन बाग बगीचा, निधि, दया, औदार्य, परोपकार, मातृ सुख आदि का निरूपण जातक की जीवन षैली में देखा जा सकता है।  प्रभु श्रीराम की कुण्डली का चतुर्थेष षुक्र, भाग्य भवन में अपनी उच्च राषि मीन में विराजमान है। उच्च राषिगत षनि प्रभु श्रीराम से मर्यादित जीवन के प्रति आग्रहषील हैं। भूमि, भवन का सुख तो चक्रवर्ती राजा के लिए सहज सुलभ हैं। अन्त:करण की दृष्टि से सर्वत्र प्रेम का अनुग्रह तथा दया और औदार्यता महार्षि गौतम की पत्नि अहिल्या को श्रापमुक्त कर पाषाण से नारी रूप प्रदान करना तथा षबरी के जूठे बेर खाना औदार्यता का सुखद पक्ष है। मातात्रय कैकयी कौषल्या, सुमित्रा के प्रति मातृ भक्ति सदैव स्तुत्यणीय एवं प्रेरणास्पद रहेगी।
पंचम भवन - लव कुष के पिता प्रभु श्रीराम की जन्म कुण्डली में पंचम भवन में वृष्चिक राषि है। वृष्चिक राषि का स्वामी मंगल सप्तम भवन में उच्च राषि में (मकर में )  विराजमान है। पंचम भवन से जातक की संतान, स्थावर जंगम, हाथ का यष, बुद्धि चातुर्य, विवेकषीलता, सौजन्य तथा परीक्षा में यष प्राप्ति से जुड़ी है। लव कुष के रूप में महान प्रतापी पुत्र तथा स्थावर संपत्ति के रूप अयोध्या का चक्रवर्ती साम्राज्य एवं अपनी बुद्धि विवेक के बल सीता की खोज में सुग्रीव से मित्रता, लंका विजय में लंकापति रावण के अनुज विभीषण का युद्ध के पूर्व लंकापति बनाने के लिए राजतिलक करना तथा मर्यादा में रहते हुए खर दूषण, कुम्भकरण, लंकापति रावण से लेकर अनेक आतातायी असुरों का वध कर रामराज्य की स्थापना करना बुद्धिचातुर्य की रहस्यमयी परिणिति के सिवा और क्या है ?
असुर विजेता राम
षष्टम् भवन - श्रीराम की जन्म कुण्डली षष्टम् भवन धनु राषि अवस्थित है। षष्टम् भवन रोग, षत्रुओं से जातक की कथा व्यथा का संाकेेतिक है। इस भाव से षत्रु कष्ट के अभाव से जुड़े प्रष्नों की रहस्यमयता को उजागर करते है।
श्रीराम की कुण्डली का षष्ठेष धनु राषि के स्वामी देव गुरू वृहस्पति लग्न भवन में कर्क राषिगत चन्द्रमा के साथ अपनी उच्च राषि (कर्क) में विराजमान होकर श्गजकेसरी योगश् बना रहे हैं। जिसका सामान्य भाषा में अर्थ है: वनराज सिंह हाथियों को अपनी एक हुंकार (गर्जना) में भगा देता है। गज याने हाथी, केषरी याने सिंह।
गुरू विष्वामित्र से षस्त्र षिक्षा में अनेक रहस्यमयी विद्याओं का ज्ञान प्राप्त किया। जिसका सर्वप्रथम प्रयोग ताड़का और सुबाहु के बध के रूप में घटित हुआ। श्री रामचंद्र जी ने जहॉ जहॉ अपने पग रखे, वहॉं उन्हें यष मिला। षत्रु विजय सीता स्वयंवर से लेकर खरदूषण तथा वानरराज बालि तथा दषानन रावण तक अनेक षक्तिषाली अपराजेय योद्धाओं का वध किया।

तुलसी की रामचरित मानस में
खरदूषण मो सम बलबन्ता। मार सकें न बिनु भगवन्ता
   रावण संहिता में दषानन रावण ने धनु राषि गत षष्टम् भवन की व्याख्या  करते हुये लिखा है ऐसा जातक षुत्रओं का घमण्ड चूर करने वाला तथा अपने बड़ों को मान देने वाला होता है। त्रेतायुगीन राम ने धरती पर आसुरी षक्तियों का तो नाष किया साथ ही अपने गुरूओं, ऋषियों मुनियों को यथेष्ठ सम्मान देकर उनका मान भी बढ़ाया है।

सीता पति रघुनन्दन श्री राम सप्तम भवन: रघुनन्दन श्रीराम की जन्म कुण्डली के सप्तम भवन में मकर राषि में उच्च राषि गत भूमि पुत्र मंगल विराजमान हैं। सप्तमस्य मंगल होने सेे श्रीरामजी की कुण्डली मंगली बन गई। मंगल पंचमेष और राज्येष है। गजकेषरी योग की सप्तम दृष्टि दाम्पत्य जीवन को भी प्रभावित कर रही है। जनकनंदिनी सीताजी सेे उनका विवाह धनुषभंजन के बाद विवाह हुआ। किन्तु भूमि पुत्र मंगल उच्चासीन होकर कह रहे हंै। जातक को दाम्पत्य जीवन का सुख तो दूंगा, किन्तु अल्पकालीन।
सप्तम भवन : से पारिवारिक झगड़े तथा भूत भविष्य, वर्तमान की स्थिति का सिंहावलोकन भी किया जाता है। मंथरा की षडय़ंत्रमयी योजना ने कैकेयी की मति भ्रष्ट की। परिणितीवष श्रीराम को वनगमन, सीताहरण आसुरी षक्तियों का विनाष, लंका विजय के पष्चात् अध्योध्या में राजतिलक, वैदेही सीता का त्याग, ऋषि वाल्मीकि के आश्रम में श्रीसीताराम के पुत्रों लव कुष का जन्म, जनकनंदिनी सीता का भूमि के प्रवेष। ये सारे कथानक सप्तमस्थ उच्च राषिगत मंगल की चेष्टाओं का फल है।

रघुनंदन का आयु भवन 
अष्टम भवन : श्रीराम जी की कुण्डली में अष्टम भवन में कुम्भ राषि का स्वामी षनि चतुर्थ भवन में अपनी उच्चराषि तुला में विराजमान है। अष्टमेष षनि जातक की दीर्घायु का परिचायक है। किन्तु सप्तमेष और अष्टमेष षनि बलवान स्थिति में होकर जातक को दीर्घायु तो देता है, वहीं दूसरी ओर दाम्पत्य जीवन में अषुभता भी लाता है। साथ ही मृत्यु स्थान भी यह निर्धारित करता है। अष्टमेष षनि चतुर्थ भवन में होने से पारिवारिक विवाद के कारण वनगमन से सुख की हानि हुई। किन्तु वहॉ असुरों का विनाष कर यष मिला। रण रिपु अर्थात युद्ध क्षेत्रों में षत्रुओं का वमन भी किया पृथ्वीं से प्रस्थान के बाद चिरकाल तक यषोगाथा अनेक प्रतीकों में बनी रहेगी। यह भी उनके अष्टमेंष उच्च राषिगत न्याय के देवता षनि की महिमा का फल है।

भाग्य भवनस्थ षुक्र
श्री राघव की कुण्डली का भाग्य भवन कम चमत्कारी नहीं है। भाग्य भवन का स्वामी नवमेष गुरू अपनी उच्च राषि कर्क में चन्द्रदेव की युति के साथ लगनस्थ है। भाग्येष गजकेषरी योग बन रहा है, लग्न भवन में। भाग्य भवन में उच्च राषिगत षुक्र चतुर्थेष तथा द्वादषेष का स्वामी है। माता से लेकर भूमि, भवन, वाहन (रथ) आदि सभी सुखों से पूरित रहे किन्तु अपनी सप्तम् दृष्टि से पराक्रम भवन को निहारते षुक्र ने पराक्रम के प्रदर्षन का माध्यम नारी जाति को बनाया। षुक्र स्त्री ग्रह है। महर्षि गौतम की पत्नी अहिल्या की मुक्ति, रावण से युद्ध में विजयश्री प्राप्त कर अषोक वाटिका से जनक नंदिनी सीता जी की मुक्ति, बालि वध से सुग्रीव की पत्नि रोमा की मुक्ति, श्री राम की यषोगाथा का एक पक्ष हैं। वही दूसरी ओर आसुरी षक्तियों का नाष कर ऋषियों तथा जन जन को निर्भय जीवन दिया, यह प्रभु श्रीराम के भाग्य भवन का पुण्य प्रताप ही तो था।

दसमस्थ सूर्य बुध

रघुनंदन श्री राम की कुण्डली के दसम भाव अर्थात राज्य भवन में सूर्य के साथ बुध की युति बुध आदित्य योग तो बना रहा है किन्तु बुध व्ययेष होने से राजतिलक होते होते 14 वर्षीय वनवास का योग बन गया। व्ययेष बुध ने राजयोग खण्डित किया। क्योंकि व्ययेष जिस भवन में विराजमान होता उसे किंचित सम्मान की हानि तो देता ही है। बुध ने ही उन्हें पिता के सुख से वंचित किया। किन्तु सूर्य उच्च राषिगत होकर राजभवन में विराजने से गौरव, ऐष्वर्य एवं नेतृत्व का स्वामी बनाया। पिता की आज्ञा से वन गये। पिता का मान बढ़ाया। आसुरी षक्तियों के विनाष हेतु वानर जाति की सेना का नेतृत्व कर विजयश्री प्राप्त की। अधिकार प्राप्ति के रूप में सम्राट बने अयोध्या के। ईष्वर प्राप्ति भी दसम भवन से देखी जाती है, तो जो स्वयं त्रिभुवनपति हो उसे अपनी भक्ति में लगाकर मोक्ष प्रदान कराने में बुध का योगदान महत्वपूर्ण है। क्योंकि द्वादष भवन मोक्ष का भवन भी है। अपनी भक्ति से अनेक साधु, संतो, भक्तों तथा पापियों को भी मोक्षगामी बनाने में पथ पथ पर प्रेरणा दी। प्रभुता भी दसम भवन का एक गुण है। तो श्री राम प्रभुता पाकर भी दीनों के प्रति भी सहृदय बने रहे यही उनकी अनुग्रहमयी प्रभुता है। किन्तु स्मरणीय रहे। चतुर्थ भवन उच्चराषिगत षनि की सप्तम दृष्टि नीच राषि पर होने के कारण ही उन्हें वनवास में 14 वर्षीय वनवासी जीवन बिताना पड़ा। भले ही प्रकृति की रहस्यमयता आसुरी षक्तियों के विनाष के रूप मेें रूपांन्तरित हो गयी हो। किन्तु मंगल की चतुर्थ स्वक्षेत्री दृष्टि और सूर्य के उच्च राषिगत प्रभाव से वनवास की समाप्ति के पष्चात् पुन: राज्यारोहण ग्रहों की अपनी रहस्यमयी कलात्मक षक्तियों की ओजस्वीयता है।

एकादष: लाभस्थ भवन
एकादष भवन मूलत: लाभ, सम्पन्नता, वाहन, वैभव, स्वतंत्र चिन्तन के रूप में ज्योतिषीय ग्रंथों में स्वीकारा गया है। जन जन के प्रभु राम स्वतंत्र चिन्तन के रूप में नैसर्गिक अर्थात प्राकृतिक सम्पदाओं से मुक्ति का बोध कराते हैं। भक्तवत्सल श्रीराम का मानव से लेकर समस्त जीवों के प्रति उदार भाव तो था ही किन्तु एकादषेष षुक्र भाग्य भवन में अपनी उच्च राषि मीन में विराजने से सभी के प्रति करूणा भाव बनाये रखने के प्रति संकल्पित रहे। अवतारी होने के बाद भी अपनी मानवीय मर्यादा में बने रहे। एक पत्नि व्र्रतधारी होने से उन्होंने सम्पूर्ण नारी समाज को गरिमा प्रदान की। मित्रों को सहोदर की तरह मान दिया। षत्रुओं के प्रति भी मानवीय मूल्यों का क्षरण उन्होंने  नहीं स्वीकारा। वचन बद्धता राघव की निष्ठा का अमोघ षस्त्र रही।

मोक्ष का पर्याय द्वादष भवन
सीता पति राघव की कुण्डली के बारहवें भवन में मिथुन राषि की स्थापना ने मर्यादा पुरूषोत्तम राम की कथनी करनी में कहीं भी अवरोध पैदा नहीं होने दिया। द्वादष भवन से ज्ञान तन्तु, स्वभाव, षान्ति, विवेक, व्यसन, सन्यास, षत्रु की रोक तथा धन सुख सम्मान का व्यय आदि का लेखा जोखा देखा जाता है।  द्वादष भवन में मिथुन राषि होने सीता पति राघव भावुक थे। वेदेही हरण एवं लक्ष्मण को षक्ति लगने पर वे कैसे व्यथित हुए, यह तुलसीकृत रामायण में रोमांचकारी षब्दषैली में अंकित है। वनवास में राज सत्ता से 14 वर्षो तक दूर रहे किन्तु पिता की आज्ञा को सर्वोपरि माना। सीता हरण में सुख और सम्मान का व्यय हुआ किन्तु अपने विवेक से वानर सेना का नेतृत्व कर षत्रुओं पर रोक ही नहीं लगाई अपितु उनका नाष भी किया। वनवासी राम ने एक सन्यासी के रूप में 14 वर्ष वनों में बितायें। किसी भी नगर में 14 वर्षो की अवधि में उन्होंने प्रवेष नहीं किया, ऐसे थे सन्यासी राम।

ब्रह्माण्ड नायक राम
राम, ब्रह्मवादियों का ब्रह्म, ईष्वरवादियों का ईष्वर, अवतारवादियों का अवतार, आत्मवादियों वं जीववादियों का आत्म एवं जीव है। रामायण महाकाव्य बना। उतरोत्तर राम नाम के साथ साहित्य में भक्तिभाव का वातावरण बनता गया। ईसा के पॉंच सौ वर्ष के बाद इसका ज्यादा विस्तार हुआ तथा ईसा के एक हजार वर्ष बाद दाषरथि राम परमात्मा के रूप में गूंज गये।हमारी भारतीय सभ्यता के उषाकाल में साहित्य चार वेदों में था, जिनमें ऋग्वेद प्रथम था। वैदिक साहित्य में खेती की अधिष्ठात्री देवी का नाम सीता था, क्योंकि मूल में सीता लांगलपद्धति (खेत की हराई) थी। इसीलिए मिथिला में जनक के हल चलाते समय खेत में, जो नवजात बच्ची पायी गई, उसका नाम सीता रखा गया। ऋग्वेद में इक्ष्वाकु दषरथ और राम के नाम आए है। ऐतिहासिक ढंग से अध्ययन करने वाले प्राय: समस्त विद्वान एक स्वर में कहते हैं कि महाभारत तथा प्रचलित वाल्मीकि रामायण के पूर्व राम कथा संबंधी आख्यान प्रचलित थे। ये आख्यान निष्चित रूप से बुद्धकाल के आसपास के रहे होंगे। इसी आधार पर भारत (महाभारत का प्रथम रूप) तथा बौद्ध जातक कथाओं में राम कथा के अंष आये हंै। वाल्मीकि रामायण में महाभारत के पात्रों तथा कथानकों की चर्चा नहीं है। परन्तु महाभारत के प्राचीन अंषों में रामकथा के पात्रों की चर्चा है। महाभारत के षान्ति पर्व के 29 वे अध्याय के 12 वें ष्लोक में नारद संजय को उपदेष देते हुये कहते हैं कि संसार में कौन नित्य रहने वाला है। सुना गया है कि दषरथ पुत्र राम बड़े प्रजापालक थे, किन्तु उन्हें भी इस संसार से जाना पड़ा। महाभारत में भी राम का अवतार रूप पहुुंच गया था। बौद्ध साहित्य में अनामक जातकम् के नाम से अन्य कथा भी है, जिसमें राम कथा है, इस जातक में राम सीता का वनवास, सीता हरण, जटायु वृतान्त, बाली और सुग्रीव का युद्ध, सेतु बन्ध, सीता की अग्नि परीक्षा, इन सबों के संकेत मिलते हैं।

वाल्मीकि रामायण और अवतारवाद
    रामकथा के स्फुट रूप देषी भाषा में बुद्ध काल के थोड़े पूर्व से ही उत्तरी भारत में प्रचलित थे। ईसा से 300 वर्ष पूर्व वाल्मीकि ऋषि ने रामकथा के स्फुट रूप एवं लोकगीत को एक काव्य रूप में गुंफित किया। भगवतगीता के लेखक श्रीकृष्ण के मुख से कहलाते हैं श्मैं षस्त्रधारियों में राम हॅूश् श्राम: षस्त्रभृतामहम् (गीता 10:31) तक राम की प्रसिद्धी केवल षस्त्रधारी योद्धा के रूप में थी। किन्तु श्रीकृष्ण को अवतार के रूप में मान्यता पहले मिल चुकी बाद में श्रीराम को। अवतारवाद के विकास में छठी या सातवीं षताब्दी में महात्मा बुद्ध भी विष्णु के अवतार माने जाने लगे।

पुराण साहित्य
हरिव पुराण, मार्केडेय पुराण, ब्रह्माण्ड पुराण, विष्णु पुराण, वायु पुराण, मत्स्य पुराण, भागवत पुराण, कूर्मपुराण आदि सभी पुराणों में भगवान राम को विष्णु का अवतार मानने की बात दोहराई गई है। इसके आगे वाराह पुराण (800 ई.) अग्नि पुराण तथा स्कंद पुराण (900 ई.) लिंग पुराण, गरूण पुराण (1000 ई.) वामन पुराण और भविष्य पुराण अधिक अर्वाचीन है। इन सब पुराणों में रामावतार तथा राम भक्ति का प्राबल्य होता गया।

रामायण साहित्य
योग वासिष्ठ महारामायण (11 वीं सदी) अध्यात्म रामायण (1500 ई.) अदभुत रामायण (1600 ई.) आनंद रामायण (1600 ई.) तत्व संग्रह रामायण (1700 ई.) कालनिर्णय रामायण तथा अन्य रामायण जिसमें अपने अपने ढंग से राम चरित्र वर्णन है। अन्य बीस रामायणों की सूची
1. महारामायण (35000 ष्लोक),
2. संवृत रामायण (2400 ष्लोक),
3. अगस्त्य रामायण (16000 ष्लोक),
4. ओम रामायण (32000 ष्लोक)
5. राम रहस्य रामायण (22000 ष्लोक)
6. मंजुल रामायण (120000 ष्लोक)
7. सौ पद्म रामायण (62000 ष्लोक)
8. रामायण महामाला (56000 ष्लोक)
9. सौहार्द्र रामायण (40000 ष्लोक)
10. रामायण मणिरत्न (3600 ष्लोक)
11. षौर्य रामायण (62000 ष्लोक)
12. चांन्द्र रामायण (75000 ष्लोक)
13. भैंद रामायण (52000 ष्लोक)
14. स्वायंभुव रामायण (18000 ष्लोक)
15. सुब्रह रामायण (32000 ष्लोक)
16. सुवर्चस रामायण (15000 ष्लोक)
17. देव रामायण (100000 ष्लोक)
18. श्रमण रामायण (125000 ष्लोक)
19. दुरन्त रामायण (61000 ष्लोक)
20. रामायण चंपू (15000 ष्लोक)

महाकाव्य रामायण
वाल्मीकि रामायण का कवि जगत में बहुत प्रभाव पड़ा और राम कथा लिखने की एक बाढ़ सी आ गई। ईसा की चैथी षताब्दी से संस्कृत ललित (श्रृंगार प्रधान) साहित्य में महाकाव्य, नाटक, खण्ड काव्य आदि लिखे जाने लगे।

विदेषी भाषाओं में राम कथा
1. तिब्बती रामायण (800 ई.) 2. खेतानी रामायण (900 ई.)
3. रामायण ककविन (हिंदेनेषिया 1000 ई.) 4. हिकायत सेरीराम 5. राम केलिंग 6. पतानी राम कथा 7. सेरत कांड 8. रामकेर्ति 9. रामकियेन
10. राम गायन (1800 ई.)
पाष्चात्य भाषा में राम कथा
1.लिब्रो डा सैंटा: लेखक: जे. फेनिचियों (1609 ई.)
2.दि ओपन दोरे: लेखक ए. रोजेरियुस (1700 ई.)
3.आफ गोडेरैयउर इण्डिषेहाइडेनन: लेखक पी. बलडेयुस (1700 ई.)
4.असिया: लेखक ओ. डेप्पर (1700 ई.)
5.असिया पोर्तुगेसा: लेखक डे फरिया (1700 ई.)
6.रलसियों डे एरयर (1700 ई.)
7.ला जानिटिलिटे डु वेंगाल (1700 ई.)
8.पुर्तगाली वृतांत, क (1700 ई.)
9.पुर्तगाली वृतांत, ख (1800 ई.)
10.पुर्तगाली वृतांत, ग (1800 ई.)
11.ट्रावल्स इन इंडिया: लेखक जे. पी. टापर्निये (1700 ई.)
12.वोयाज ओस एन्ड आरियन्टाल: लेखक एम सोनेरा (1800 ई.)
13.मिथोलॉजी डेस इण्डू: लेखक डे. पोलियो (1800 ई.)
14. हिन्दु मेनर्स, कस्टम एन्ड सेरेमोनिस: लेखक जे. ए. दुब्वा (1900 ई.)
15. इलवियाजियो अल इन्डिये आरियेन्टालि: लेखक पी. एफ. विनजेनजा मरिया (1700 ई.)
16. स्टोरिया डी मोगोर: लेखक एन. मनुच्ची (1700 ई.)
17.हिस्तोरिया दो मालावार: लेखक दिओगो गोंसाल्वेस (1700 ई.)

शुक्रवार, 28 मार्च 2014

सूर्य व शुक्र बनवाएंगे मोदी को पीएम




प्रधानमंत्री पद पर पहुंचने के लिए महिला शक्ति होगी मददगार

- राजकुमार सोनी

मई में गुजरात के सीएम नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री पद की शपथ लेकर सत्तासीन होंगे। मुख्यमंत्री से प्रधानमंत्री पद तक पहुंचाने में किसी खास महिला का योगदान होगा। ऐसा योग सूर्य व शुक्र ग्रह से बन रहा है। भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेंद्र मोदी के ज्योतिषीय आकलन दृष्टिकोण से मप्र के प्रमुख भविष्यवक्ताओं व ज्योतिषियों से अबकी बार किसकी सरकार और कौन बनेगा प्रधानमंत्री के बारे में बात की। इन प्रकांड विद्वानों का कहना है कि लोकसभा चुनाव में भाजपा को सर्वाधिक सीटें हासिल होंगी और एनडीए की सरकार के मुखिया इस बार लालकृष्ण आडवाणी की बजाय गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी होंगे। लोकसभा में एनडीए को 250 से 275 सीटें मिलेंगी जबकि यूपीए को 80 से 110 सीटें ही मिल पाएंगी।

इंदौर के लालकिताब विशेषज्ञ एवं भविष्यवक्ता पं. आशीष शुक्ला के अनुसार शनि शत्रु राशि में होकर चतुर्थ पर पूर्ण दृष्टि रखने से जनता के बीच प्रसिद्ध बना रहा है। भारत की अधिकांश जनता भावी प्रधानमंत्री के रूप में देख रही है। दशमेश बुध एकादशेश के साथ है। दशमेश सूर्य, केतु से भी युक्त है। सूर्य का महादशा में लग्नेश मंगल का अन्तर चल रहा है जो दशमेश होकर लाभ भाव में व मंगल स्वराशि का होकर लग्न में है। यह समय भाजपा को उत्थान की ओर लेजाकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बन जाएंगे। पं. शुक्ल ने कहा कि लालकृष्ण आडवाणी का योग प्रधानमंत्री बनने का नहीं है।
सागर के ज्योतिषाचार्य एवं अंक शास्त्री पं. पीएन भट्ट के अनुसार नरेन्द्र मोदी की जन्म राशि वृश्चिक है। शनि की साढ़े साती का प्रथम चरण चल रहा है। राजभवन में विराजे शुक्र में पराक्रमेश शनि की अन्तर्दशा में गुजरात के मुख्यमंत्री बने। 02.12.2005 को शुक्र की महादशा के बाद राज्येश सूर्य की महादशा जो 03.02.2011 तक चली। तत्पश्चात् 03.02.2011 से भाग्येश चन्द्र की महादशा का शुभारम्भ हुआ। ज्योतिष ग्रंथों में वर्णित है कि एक तो भाग्येश की महादशा जीवन में आती नहीं है और यदि आ जाए तो जातक रंक से राजा तथा राजा से महाराजा बनता है।  मोदी भाग्येश की महादशा में मुख्यमंत्री से प्रधानमंत्री बन सकते हैं, किन्तु चन्द्रमा में राहु की अन्र्तदशा ग्रहण योग बना रही है तथा 20 अप्रैल से 20 जुलाई 2014 के मध्य व्ययेश शुक्र की प्रत्यन्तर दशा कहीं प्रधानमंत्री पद तक पहुंचने के प्रबल योग को ण न कर दें? यद्यपि योगनी की महादशा संकटा में सिद्धा की अन्तर्दशा तथा वर्ष कुण्डली में वर्ष लग्न जन्म लग्न का मारक भवन (द्वितीय) होते हुए भी मुंथा पराक्रम भवन में बैठी है तथा मुंथेश शनि अपनी उच्च राशि का होकर लाभ भवन में विराजमान है। जो अपनी तेजस्वीयता से जातक को 7 रेसकोर्स तक पहुंचा सकता है। किन्तु एक अवरोध फिर भी शेष है और वह है सर्वाष्टक वर्ग के राज्य भवन में लालकृष्ण आडवानी और राहुल गांधी की तुलना में कम शुभ अंक अर्थात् 27.  साथ ही ''मूसल योग'' जातक को दुराग्रही बना रहा है तथा केमद्रुम योग, जो चन्द्रमा के द्वितीय और द्वादश में कोई ग्रह न होने के कारण बन रहा है। उसका फल भी शुभ कर्मों के फल प्राप्ति में बाधा। वर्तमान में भाग्येश चन्द्रमा की महादशा चल रही है, जो दिल्ली के तख्ते ताऊस पर  मोदी की ताजपोशी कर तो सकती है किन्तु केमद्रुम योग तथा ग्रहण योग इसमें संशय व्यक्त करता नजर आ रहा है? 
ग्वालियर के भविष्यवक्ता पं. एचसी जैन ने बताया कि नरेंद्र मोदी की कुंडली में केन्द्र का स्वामी केन्द्र में होकर त्रिकोण के साथ लक्ष्मीनारायण योग बना रहा है। यह योग कर्म क्षेत्र को धनवान बनाने में समर्थ है। यही कारण है कि नरेंद्र मोदी की ख्याति विरोध के बावजूद लगातार बढ़ रही है। उन्होंने बताया कि लोकसभा में एनडीए को 250 से 275 सीटें मिलेंगी जबकि यूपीए को 80 से 110 सीटें ही मिल पाएंगी। जैन ने बताया कि मोदी को प्रधानमंत्री बनवाने में किसी खास महिला का विशेष योगदान रहेगा।


जन्मकुंडली : नरेन्द्र मोदी
जन्म दिनांक : 17 सितम्बर, 1950
जन्म समय : 11 बजे प्रात:
जन्म स्थान: मेहसाना (गुजरात)   



रविवार, 21 अप्रैल 2013

गोमती चक्र उपाय करेंगे दु:खों को दूर

 
इस धरती पर प्रकृति ने जो कुछ भी उत्पन्न किया है, वह बेवजह नहीं है, बल्कि उसका कहीं न कहीं उपयोग अवश्य है। हम सभी लोग जिन वस्तुओं के गुणों से परिचित है, उनका अधिक से अधिक अपने जीवन में प्रयोग करके लाभ प्राप्त करते है। लेकिन बहुत सी ऐसे वस्तुएं भी जिनके बारे में अज्ञान हैं। आज हम आपको कुछ ऐसी दुर्लभ वस्तुओं के बारे में बतायेंगे जिन्हें आप-अपने जीवन में उपयोग करके अनेक प्रकार की समस्याओं से निजात पाकर सुखद एंव समृद्धिदायक जीवन व्यतीत कर सकेंगे। हम बात कर रहे हैं गोमती चक्र की, जो आपके जीवन के सारे दुखों को दूर खुशियों से भर सकता है। यह गोमती नदीं में पाया जाने वाला अल्पमोली कैल्शियम व पत्थर मिश्रित होते है। इनके एक तरफ उठी हुयी सतह होती है, और दूसरी तरफ कुछ चक्र होते है। इन चक्रों को लक्ष्मी जी का प्रतीक माना जाता है। गोमती चक्रों का निम्न प्रकार से प्रयोग करके आप-अपनी समस्याओं का निदान कर सकते है-
1- यदि किसी व्यक्ति या बच्चे को बार-बार नजर लग जाती है, तो वह किसी निर्जन स्थान पर जाकर 3 गोमती चक्रों को अपने उपर से 7 बार उतार कर अपने पीछे फेंक दें और पीछे मुड़कर न देंखे। इस क्रिया को करने से कभी नजर दोष नहीं होगा।
2- यदि आपको निरन्तर आर्थिक हानि उठानी पड़ रही है, तो प्रथम सोमवार को 11 अभिमंत्रित गोमती चक्रों का हल्दी से तिलक करें और शंकर जी का ध्यान कर पीले कपड़ें में बांधकर पूरे घर में घुमाकर किसी बहते हुये जल में प्रवाहित करें। इसे करने से कुछ समय पश्चात ही लाभ मिलेगा।
3- यदि कोई बच्चा शीघ्र ही डर जाता है, तो प्रथम मंगलवार को अभिमंत्रित गोमती चक्र पर हनुमान जी के दाॅये कन्धें का सिन्दूर से तिलक कर किसी लाल कपड़े में बांधकर बच्चे के गले में पहना दें। बच्चे का डरना समाप्त हो जायेगा।
4- यदि आपके व्यवसाय में किसी की नजर लग जाती है, तो 11 अभिमंत्रित गोमती चक्र और तीन छोटे नारियल को पूजा करने के बाद पीले वस्त्र में बाॅधकर मुख्यद्वार पर लटका दें। इसके बाद आपके व्यवसाय में कभी नजर नहीं लगेगी।
5- यदि आपके हाथों से खर्च अधिक होता है, तो प्रथम शुक्रवार को 11 अभिमंत्रित गोमती चक्रों को पीले कपड़े पर रखकर मां लक्ष्मी का स्मरण कर विधिवत पूजन करें। दूसरे दिन उनमें से 4 गोमती चक्र उठाकर घर के चारों कोनों में एक-2 दबा दें और 3 गोमती चक्र को लाल चस्त्र में बांधकर धन रखने के स्थान पर रख दें तथा 3 चक्रों को पूजा स्थल में रख्रें दे। शेष बचें एक चक्र को किसी मन्दिर में अपनी समस्या निवेदन के साथ भगवान को अर्पित कर दें। यह प्रयोग करने से कुछ समय में लाभ दिखने लगेगा।
[पं. अनुज के शुक्ल]

काली हल्‍दी के टोटके


इस धरती पर प्रकृति ने जो कुछ भी उत्पन्न किया है, वह बेवजह नहीं है। बहुत सी वस्तुएं है, जिनके बारे में अज्ञान हैं। आज हम आपको कुछ ऐसी ही दुर्लभ वस्तुओं में से एक काली हल्दी के बारे में बतायेंगे जिसे आप-अपने जीवन में उपयोग करके अनेक प्रकार की समस्याओं से निजात पाकर सुखद एंव समृद्धिदायक जीवन व्यतीत कर सकेंगे। खास बात यह है कि काली हल्‍दी से जुड़े टोटके जल्‍दी खाली नहीं जाते हैं।
काली हल्दी बड़े काम की है। वैसे तो काली हल्दी का मिल पाना थोड़ा मुश्किल है, किन्तु फिर भी यह पन्सारी की दुकानों में मिल जाती है। यह हल्दी काफी उपयोगी और लाभकारक है।
1- यदि परिवार में कोई व्यक्ति निरन्तर अस्वस्थ्य रहता है, तो प्रथम गुरूवार को आटे के दो पेड़े बनाकर उसमें गीली चीने की दाल के साथ गुड़ और थोड़ी सी पिसी काली हल्दी को दबाकर रोगी व्यक्ति के उपर से 7 बार उतार कर गाय को खिला दें। यह उपाय लगातार 3 गुरूवार करने से आश्चर्यजनक लाभ मिलेगा।
2- यदि किसी व्यक्ति या बच्चे को नजर लग गयी है, तो काले कपड़े में हल्दी को बांधकर 7 बार उपर से उतार कर बहते हुये जल में प्रवाहित कर दें।
3- किसी की जन्मपत्रिका में गुरू और शनि पीडि़त है, तो वह जातक यह उपाय करें- शुक्लपक्ष के प्रथम गुरूवार से नियमित रूप से काली हल्दी पीसकर तिलक लगाने से ये दोनों ग्रह शुभ फल देने लगेंगे।
4- यदि किसी के पास धन आता तो बहुत किन्तु टिकता नहीं है, उन्हे यह उपाय अवश्य करना चाहिए। शुक्लपक्ष के प्रथम शुक्रवार को चांदी की डिब्बी में काली हल्दी, नागकेशर व सिन्दूर को साथ में रखकर मां लक्ष्मी के चरणों से स्पर्श करवा कर धन रखने के स्थान पर रख दें। यह उपाय करने से धन रूकने लगेगा।
5- यदि आपके व्यवसाय में निरन्तर गिरावट आ रही है, तो शुक्ल पक्ष के प्रथम गुरूवार को पीले कपड़े में काली हल्दी, 11 अभिमंत्रित गोमती चक्र, चांदी का सिक्का व 11 अभिमंत्रित धनदायक कौड़ियां बांधकर 108 बार ऊँ नमो भगवते वासुदेव नमः का जाप कर धन रखने के स्थान पर रखने से व्यवसाय में प्रगतिशीलता आ जाती है।
6- यदि आपका व्यवसाय मशीनों से सम्बन्धित है, और आये दिन कोई मॅहगी मशीन आपकी खराब हो जाती है, तो आप काली हल्दी को पीसकर केशर व गंगा जल मिलाकर प्रथम बुधवार को उस मशीन पर स्वास्तिक बना दें। यह उपाय करने से मशीन जल्दी खराब नहीं होगी।
7- दीपावली के दिन पीले वस्त्रों में काली हल्दी के साथ एक चांदी का सिक्का रखकर धन रखने के स्थान पर रख देने से वर्ष भर मां लक्ष्मी की कृपा बनी रहती है।
8- यदि कोई व्यक्ति मिर्गी या पागलपन से पीडि़त हो तो किसी अच्छे मूहूर्त में काली हल्दी को कटोरी में रखकर लोबान की धूप दिखाकर शुद्ध करें। तत्पश्चात एक टुकड़ें में छेद कर धागे की मद्द से उसके गले में पहना दें और नियमित रूप से कटोरी की थोड़ी सी हल्दी का चूर्ण ताजे पानी से सेंवन कराते रहें। अवश्य लाभ मिलेगा।
[पं. अनुज के शुक्ल]

मंगलवार, 4 दिसंबर 2012

अद्भुद चमत्कार भैरव साधना का

 

यदि आप किसी गंभीर समस्या में घिर जाये और चाहते हो त्वरित उपाय तो एक ऐसा उपाय जो जीवन पर छाए काले बादल को तुरंत मिटाए

- शनिवार और रविवार को श्री भैरव मंदिर में जाकर सिंदूर व चमाली के तेल का चोला अर्पित करे |
- शनिवार या रविवार को भैरव मंदिर में कपूर की आरती व काजल का दान करने से कष्ट मिटते है |
- किसी गंभीर समस्या के निवारण हेतु उरद की दाल के एक सो आठ बारे बना कर उसकी माला बनाये और श्री भैरवनाथ जी को अर्पित कर सदर उनकी आरती करे |
- पारिवारिक या न्यायिक विवाद के निदान हेतु सरसों का तेल, खोये से निर्मित मिस्ठान, काले वस्त्र, एक जलदार नारियल, कपूर, नीबू आदि समर्पित करे |
- उपरी बाधा निवारण हेतु भैरवाष्टक का नियमित आठ पाठ कर जल को फुक कर पीड़ित व्यक्ति को पिला दे | हर प्रकार की समस्या का निदान होगा |
 

श्री भैरव मन्त्र

“ॐ नमो भैंरुनाथ, काली का पुत्र! हाजिर होके, तुम मेरा कारज करो तुरत। कमर बिराज मस्तङ्गा लँगोट, घूँघर-माल। हाथ बिराज डमरु खप्पर त्रिशूल। मस्तक बिराज तिलक सिन्दूर। शीश बिराज जटा-जूट, गल बिराज नोद जनेऊ। ॐ नमो भैंरुनाथ, काली का पुत्र ! हाजिर होके तुम मेरा कारज करो तुरत। नित उठ करो आदेश-आदेश।”

विधिः पञ्चोपचार से पूजन। रविवार से शुरु करके २१ दिन तक मृत्तिका की मणियों की माला से नित्य अट्ठाइस (२८) जप करे। भोग में गुड़ व तेल का शीरा तथा उड़द का दही-बड़ा चढ़ाए और पूजा-जप के बाद उसे काले श्वान को खिलाए। यह प्रयोग किसी अटके हुए कार्य में सफलता प्राप्ति हेतु है।

काल भैरव साधना
1. काल भैरव भगवान शिव का अत्यन्त ही उग्र
तथा तेजस्वी स्वरूप है.
2. सभी प्रकार के पूजन/हवन/प्रयोग में रक्षार्थ
इनका पुजन होता है.
3. ब्रह्मा का पांचवां शीश खंडन भैरव ने
ही किया था.
4. इन्हे काशी का कोतवाल माना जाता है.
5. नीचे लिखे मन्त्र की १०८
माला रात्रि को करें.
6. काले रंग का वस्त्र तथा आसन रहेगा.
7. दिशा दक्षिण की ओर मुंह करके बैठें
8. इस साधना से भय का विनाश होता है
तथा साह्स का संचार होता है.
9. यह तन्त्र बाधा, भूत बाधा,तथा दुर्घटना से रक्षा प्रदायक है.
॥ ऊं भ्रं कालभैरवाय फ़ट ॥
 

अनुभूतियाँ
बटुक भैरव शिवांश है तथा शाक्त उपासना में इनके बिना आगे बढना संभव ही नहीं है।शक्ति के किसी भी रूप की उपासना हो भैरव पूजन कर उनकी आज्ञा लेकर ही माता की उपासना होती है।भैरव रक्षक है साधक के जीवन में बाधाओं को दूर कर साधना मार्ग सरल सुलभ बनाते है।वह समय याद है जब बिना भैरव साधना किये ही कई मंत्रों पुश्चरण कर लिया था तभी एक रात एकांत माता मंदिर से दूर हटकर आम वृक्ष के नीचे आसन लगाये बैठा था तभी गर्जना के साथ जोर से एक चीखने की आवाज सुनाई पड़ी,नजर घुमाकर देखा तो एक सुन्दर दिव्य बालक हाथ में सोटा लिए खड़ा था और उसके आसपास फैले हल्के प्रकाश में वह बड़ा ही सुन्दर लगा।मैं आवाक हो गया और सोचने लगा ये कौन है तभी वो बोले कि "राज मुझे नहीं पहचाने इतने दिनो से मैं तुम्हारी सहायता कर रहा हूँ और तुमने कभी सोचा मेरे बारे में परन्तु तुम नित्य मेरा स्मरण,नमस्कार करते हो जाओ काशी शिव जी का दर्शन कर आओ।"
मैंने प्रणाम किया और कहा हे बटुक भैरव आपको बार बार नमस्कार है,आप दयालु है,कृपालु है मैं सदा से आपका भक्त हूँ,मेरे भूल के लिए आप मुझे क्षमा करे।मेरे ऐसा कहने से वे प्रसन्न मुद्रा में अपना दिव्य रूप दिखाकर वहाँ से अदृश्य हो गये।मुझे याद आया कि कठिन साधनाओं के समय भैरव,हनुमान,गणेश इन तीनों ने मेरा बहुत मार्गदर्शन किया था,तथा आज भी करते है।जीवन में कहीं भी भटकाव हो या कठिनाई भैरव बताते है कि आगे क्या करना चाहिए,तभी जाकर सत्य का राह समझ में आता है।

भैरव कृपा
भैरव भक्त वत्सल है शीघ्र ही सहायता करते है,भरण,पोषण के साथ रक्षा भी करते है।ये शिव के अतिप्रिय तथा माता के लाडले है,इनके आज्ञा के बिना कोई शक्ति उपासना करता है तो उसके पुण्य का हरण कर लेते है कारण दिव्य साधना का अपना एक नियम है जो गुरू परम्परा से आगे बढता है।अगर कोई उदण्डता करे तो वो कृपा प्राप्त नहीं कर पाता है।
भैरव सिर्फ शिव माँ के आज्ञा पर चलते है वे शोधन,निवारण,रक्षण कर भक्त को लाकर भगवती के सन्मुख खड़ा कर देते है।इस जगत में शिव ने जितनी लीलाएं की है उस लीला के ही एक रूप है भैरव।भैरव या किसी भी शक्ति के तीन आचार जरूर होते है,जैसा भक्त वैसा ही आचार का पालन करना पड़ता है।ये भी अगर गुरू परम्परा से मिले वही करना चाहिए।आचार में सात्वीक ध्यान पूजन,राजसिक ध्यान पूजन,तथा तामसिक ध्यान पूजन करना चाहिए।भय का निवारण करते है भैरव।

प्रसंग
एक बार एक दुष्ट साधक ने मेरे एक साधक मित्र पर एक भीषण प्रयोग करा दिया जिसके कारण वे थोड़ा मानसिक विकार से ग्रसित हो गये परन्तु वे भैरव के उपासक थे,तभी भैरव जी ने स्वप्न में उन्हें बताया कि अमुक मंत्र का जप करो साथ ही प्रयोग विधि बताया ,साधक मित्र नें जप शुरू किया और तीन दिन में ही स्वस्थ हो गये,और उधर वह दुष्ट साधक को अतिसार हो गया ,वह प्रभाव समझ गया था,वह फोन कर रोने लगा कि माफ कर दिजिए नहीं तो मर जाउँगा,तब मेरे मित्र ने मुझसे पूछा क्या करूँ,तो मैंने कहा कि शीघ्र माफ कर दिजिए तथा भैरव जी से कहिए कि माफ कर दें,हमलोगों को गुरू परम्परा में क्षमा,दया,करूणा का भाव विशेष रुप से रखना पड़ता है।

भैरव स्वरुप
इस जगत में सबसे ज्यादा जीव पर करूणा शिव करते है और शक्ति तो सनातनी माँ है इन दोनो में भेद नहीं है कारण दोनों माता पिता है,इस लिए करूणा,दया जो इनका स्वभाव है वह भैरव जी में विद्यमान है।सृष्टि में आसुरी शक्तियां बहुत उपद्रव करती है,उसमें भी अगर कोई विशेष साधना और भक्ति मार्ग पर चलता हो तो ये कई एक साथ साधक को कष्ट पहुँचाते है,इसलिए अगर भैरव कृपा हो जाए तो सभी आसुरी शक्ति को भैरव बाबा मार भगाते है,इसलिये ये साक्षात रक्षक है। भूत बाधा हो या ग्रह बाधा,शत्रु भय हो रोग बाधा सभी को दूर कर भैरव कृपा प्रदान करते है।अष्ट भैरव प्रसिद्ध है परन्तु भैरव के कई अनेको रूप है सभी का महत्व है परन्तु बटुक सबसे प्यारे है।नित्य इनका ध्यान पूजन किया जाय तो सभी काम बन जाते है,जरूरत है हमें पूर्ण श्रद्धा से उन्हें पुकारने की,वे छोटे भोले शिव है ,दौड़ पड़ते है भक्त के रक्षा और कल्याण के लिए।
 

जानें कौन-से भैरव हैं किस अद्भुत शक्ति के स्वामी?

शिव जगदव्यापी यानी जगत में हर कण में बसते हैं। शास्त्र भी कहते हैं कि इस जगत की रचना सत्व, रज और तम गुणों से मिलकर हुई। जगतगुरु होने से शिव भी इन तीन गुणों के नियंत्रण माने जाते हैं। इसलिए शिव को आनंद स्वरूप में शंभू, विकराल स्वरूप में उग्र तो सत्व स्वरूप में सात्विक भी पुकारा जाता है।

शिव के यह त्रिगुण स्वरूप भैरव अवतार में भी प्रकट होता है। हिन्दू मान्यताओं के मुताबिक शिव ने प्रदोषकाल में ही भैरव रूप में काल व कलह रूपी अंधकार से जगत की रक्षा के लिए प्रकट हुए। इसलिए शास्त्रों और धार्मिक परंपराओं में अष्ट भैरव से लेकर 64 भैरव स्वरूप पूजनीय और फलदायी बताए गए हैं।

इसी कड़ी में जानते हैं शिव की रज, तम व सत्व गुणी शक्तियों के आधार पर भैरव स्वरूप कौन है व उनकी साधना किन इच्छाओं को पूरा करती है -

बटुक भैरव - यह भैरव का सात्विक व बाल स्वरूप है। जिनकी उपासना सभी सुख, आयु, निरोगी जीवन, पद, प्रतिष्ठा व मुक्ति प्रदान करने वाला माना गया है।

काल भैरव - यह भैरव का तामस किन्तु कल्याणकारी स्वरूप माना गया है। इनको काल का नियंत्रक भी माना गया है। इनकी उपासना काल भय, संकट, दु:ख व शत्रुओं से मुक्ति देने वाली मानी गई है।

आनंद भैरव - भैरव का यह राजस स्वरूप माना गया है। दश महाविद्या के अंतर्गत हर शक्ति के साथ भैरव उपासना ऐसी ही अर्थ, धर्म, काम की सिद्धियां देने वाली मानी गई है। तंत्र शास्त्रों में भी ऐसी भैरव साधना के साथ भैरवी उपासना का भी महत्व बताया गया है।

चाहें जल्द व ज्यादा धन लाभ..तो जानें भैरव पूजा का सही वक्त व तरीका

शिव का एक नाम भगवान भी है। शास्त्रों में भगवान का अर्थ सर्व शक्तिमान व ऐश्वर्य, धर्म, यश, श्री, ज्ञान व वैराग्य सहित छ: गुणों से संपन्नता भी बताया गया है। शिव व उनके सभी अवतारों में यह गुण प्रकट होते हैं व उनकी भक्ति भी सांसारिक जीवन में ऐसी शक्तियों की कामना पूरी करती है।

हिन्दू मान्यताओं के मुताबिक मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष की अष्टमी को शिव ने भैरव अवतार लिया। जिसका लक्ष्य दुर्गुणी व दुष्ट शक्तियों का अंत ही था, जो सुख, ऐश्वर्य व जीवन में बाधक होती है। शिव का यह कालरक्षक भीषण स्वरूप कालभैरव व काशी के कोतवाल के रूप में पूजनीय है।

यही कारण है कि इस दिन कालभैरव के साथ शिव के अनेक भैरव स्वरूपों की पूजा काल, धन, यश की कामना को पूरी करने वाली मानी गई है। किंतु कामनासिद्धि या धन लाभ की दृष्टि से शास्त्रों में भैरव पूजा के सही वक्त व तरीके बताए गए हैं। जानते हैं ये उपाय -

- पौराणिक मान्यताओं में भैरव अवतार प्रदोष काल यानी दिन-रात के मिलन की घड़ी में हुआ। इसलिए भैरव पूजा शाम व रात के वक्त करें।

- रुद्राक्ष शिव स्वरूप है। इसलिए भैरव पूजा रुद्राक्ष की माला पहन या रुद्राक्ष माला से ही भैरव मंत्रों का जप करें।

- स्नान के बाद भैरव पूजा करें। जिसमें भैरव को भैरवाय नम: बोलते हुए चंदन, अक्षत, फूल, सुपारी, दक्षिणा, नैवेद्य लगाकर धूप व दीप आरती करें।

- भैरव आरती तेल की दीप से करें।

- कल शुक्रवार है। भैरव पूजा में भुने चने चढ़ाने का महत्व है। तंत्र शास्त्रों में मदिरा का महत्व है, किंतु इसके स्थान पर दही-गुड़ भी चढ़ाया जा सकता है।

- भैरव की आरती तेल के दीप व कर्पूर से करें।

- भैरव पूजा व आरती के बाद विशेष रूप से शिव का ध्यान करते हुए दोष व विकारों के लिए क्षमा प्रार्थना कर प्रसाद सुख व ऐश्वर्य की कामना से ग्रहण करें।
 
 
भैरव के महाभय नाशक भैरव मंत्र

भय को नष्ट करने वाले देवता का नाम है भैरव
भैरव के होते है आठ प्रमुख रूप
किसी भी रूप की साधना बना सकती है महाबलशाली
भैरव की सौम्य रूप में करनी चाहिए साधना पूजा
कुत्ता भैरव जी का वाहन है
कुत्तों को भोजन अवश्य खिलाना चाहिए
पूरे परिवार की रक्षा करते हैं भैरव देवता
काले वस्त्र और नारियल चढाने से होते हैं प्रसन्न
भैरव के भक्त को तीनो लोकों में कोई नहीं हरा पता
जीवन के हर क्षेत्र में सफलता के लिए भैरव को चौमुखा दीपक जला कर चढ़ाएं
भैरव की मूर्ती पर तिल चढाने से बड़ी से बड़ी बाधा भी नष्ट होती है
भैरव के मन्त्रों से होता है सारे दुखों का नाश

भय नाशक मंत्र
ॐ भं भैरवाय आप्द्दुदारानाय भयं हन

उरद की दाल भैरव जी को अर्पित करें
पुष्प,अक्षत,धूप दीप से पूजन करें
रुद्राक्ष की माला से 6 माला का मंत्र जप करें
दक्षिण दिशा की और मुख रखें

शत्रु नाशक मंत्र
ॐ भं भैरवाय आप्द्दुदारानाय शत्रु नाशं कुरु


नारियल काले वस्त्र में लपेट कर भैरव जी को अर्पित करें
गुगुल की धूनी जलाएं
रुद्राक्ष की माला से 5 माला का मंत्र जप करें
पश्चिम कि और मुख रखें

जादू टोना नाशक मंत्र
ॐ भं भैरवाय आप्द्दुदारानाय तंत्र बाधाम नाशय नाशय


आटे के तीन दिये जलाएं
कपूर से आरती करें
रुद्राक्ष की माला से 7 माला का मंत्र जप करें
दक्षिण की और मुख रखे

प्रतियोगिता इंटरवियु में सफलता का मंत्र
ॐ भं भैरवाय आप्द्दुदारानाय साफल्यं देहि देहि स्वाहा:


बेसन का हलवा प्रसाद रूप में बना कर चढ़ाएं
एक अखंड दीपक जला कर रखें
रुद्राक्ष की मलका से 8 माला का मंत्र जप करें
पूर्व की और मुख रखें

बच्चों की रक्षा का मंत्र
ॐ भं भैरवाय आप्द्दुदारानाय कुमारं रक्ष रक्ष


मीठी रोटी का भोग लगायें
दो नारियल भैरव जी को अर्पित करें
रुद्राक्ष की माला से 6  माला का मंत्र जप करें
पश्चिम की ओर मुख रखें

लम्बी आयु का मंत्र
ॐ भं भैरवाय आप्द्दुदारानाय रुरु स्वरूपाय स्वाहा:


काले कपडे का दान करें
गरीबों को भोजन खिलाये
कुतों को रोटिया खिलाएं
रुद्राक्ष की माला से 5  माला का मंत्र जप करें
पूर्व की ओर मुख रखें

बल प्रदाता मंत्र
ॐ भं भैरवाय आप्द्दुदारानाय शौर्यं प्रयच्छ


काले रंग के कुते को पालने से भैरव प्रसन्न होते हैं
कुमकुम मिला लाल जल बहिरव को अर्पित करना चाहिए
काले कम्बल के आसन पर इस मंत्र को जपें
रुद्राक्ष की माला से 7  माला मंत्र जप करें
उत्तर की ओर मुख रखें

सुरक्षा कवच का मंत्र
ॐ भं भैरवाय आप्द्दुदारानाय बज्र कवचाय हुम


भैरव जी को पञ्च मेवा अर्पित करें
कन्याओं को दक्षिणा दें
रुद्राक्ष की माला से 5 माला का मंत्र जप करें
पूर्व की ओर मुख रखें

 

सोमवार, 3 दिसंबर 2012

धन-समृद्धि का आकर्षण


धन-समृद्धि को अर्जित करने के लिए प्रबल पुरुषार्थ यानि कि ईमानदारी पूर्वक कठोर परिश्रम तो आवश्यक है ही। किंतु साथ ही कुछ जांचे-परखे और कारगर उपायों जिन्हें टोने-टोटके के रूप में जाना जाता है को भी आजमाना चाहिये। तो देखें ऐसे ही कुछ आसान किंतु प्रभावशाली टोटके को:
- धन समृद्धि की देवी लक्ष्मी को प्रति एकादशी के दिन नौ बत्तियों वाला शुद्ध घी का दीपक लगाएं।
 - घर के मुख्य प्रवेश द्वार पर तांबे के सिक्के को लाल रंग के नवीन वस्त्र में बांधने से घर में धन, समृद्धि का आगमन होता है।
 - प्रतिदिन ब्रह्ममुहूर्त में उठकर पीपल, तुलसी एवं सूर्य देव को जल अर्पित कर सुख-समृद्धि की प्रार्थना करें। 
- शनिवार के दिन कृष्ण वर्ण के पशुओं को रोटी खिलाएं।
 - घर का कोना-कोना साफ रखें और मुख्य द्वार पर रंगोली बनाएं।
 - घर आए अतिथि, साधु या याचक को यथा संभव प्रसन्न करके ही विदा करें।
 - अपनी ईमानदारी और मेहतन की कमाई का 2 प्रतिशत हिस्सा, जीव-जंतु, प्रकृति, राष्ट्र एवं समाज की भलाई में खर्च करें। यहां पर लगाया धन लाख गुना होकर शीघ्र ही लौट आता है।

ग्रहों को अपने अनुकूल बनाये


कहा जाता हैं ’’ ग्रहा धिंन जगत सर्वम ’’ अर्थात प्रत्येक मनुष्य ग्रह के अधीन रहकर कार्य करता हैं और सांसारिक सुख एवं दुखः को भोगता हैं। किन्तु मनुष्य अपने सुख का समय तो आराम से बिता लेता हैं और जैसे ही कष्ट प्राप्त होते हैं उस समय उसे ईश्वर के शरणागत होना पड़ता हैं। अपने पूज्य श्रेष्ठ लोगों से राय मशवरा लेकर समय बिताना होता हैं। उसी परेशानी के हल हेतु जब वह किसी विज्ञ ज्योतिषी के पास जाता हैं तो ग्रहों के प्रतिकूल होने की जानकारी प्राप्त करता हैं। उन्हें अनुकूल बनाने हेतु उसे कई उपाय करना होते हैं इस हेतु आप निम्न उपाय कर ग्रहों का प्रतिकूल से अनुकूल बना सकते हैं। ये उपाय परिक्षती हैं और सहजता से कम खर्च में स्वंय के द्वारा अथवा सामान्य सहयोग लेकर किये जा सकते हैं।

सूर्य के प्रतिकूल होने पर: -
1. भगवान सूर्य नारायण को ताँबे के लौटे से सूर्योदय काल में जल चढ़ावें व 3ाोहम सूर्याय नमः का जाप करें।
2. भगवान सूर्य के पुराणोक्त, वेदोक्त अथवा बीच मंत्र से किसी एक का 28000 बार जाप करें अथवा योग्य ब्राह्मण से करवायें।
3. सूर्य यंत्र को अपने दाहिने हाथ बांधे।
4. रविवार को भोजन में नमक का सेवन न करें।
5. सूर्योदय पूर्व उठकर पवित्र हो सूर्य नमस्कार करें।

चन्द्र के प्रतिकूल होने पर: -
1. भगवान शिव की अराधना सूर्योदय काल में करें।
2. भगवान शिव के स्त्रोत पाठ करें।
3. चन्द्र के पुराणोक्त, वेदाक्त अथवा बीज मंत्र में से किसी एक का 44000 बार जाप करें अथवा जाप करवायें।
4. सोमवार का व्रत करें।
5. मोती, दूध, चांवल अथवा सफेद वस्तु का दान करें।

मंगल ग्रह के प्रतिकूल होने पर: -
1. मंगलवार का व्रत करें।
2. भगवान हनुमान जी की अराधना करें।
3. मंगल के पुराणोक्त, वेदोक्त, तंत्रोक्त अथवा बीज मंत्र का 40000 बार जाप करें।
4. मसूर की दाल, लाल वस्त्र, मूंगा आदि का दान करें।
5. हनुमान चालीसा अथवा सुन्दर काण्ड का पाठ प्रातः काल में करें।

बुध ग्रह के प्रतिकूल होने पर: -
1. भगवान गणेश जी की अराधना करें।
2. आप कोई भी बुध मंत्र 34000 बार जाप करें।
3. बुध स्त्रोत का पाठ करें।
4. मूंग की दाल, हरे वस्त्र, पन्ना आदि का दान करें।
5. विद्वानों को प्रणाम करें व सम्मान करें।

गुरू के प्रतिकूल होने पर: -
1. सूर्योदय पूर्व पीपल की पूजा करें।
2. भगवान नारायण (विष्णु) की आराधना करें व सन्तों का सम्मान करें।

शुक्र के प्रतिकूल होने पर: -
1. शुक्र स्त्रोत का पाठ करें।
2. नारीजाति का सम्मान करें।
3. सफेद चमकीले वस्त्र एवं सुगन्धित तेल आदि वस्तुओं का दान करें।
4. 3ाोम शुक्राय नमः या अन्य किसी शुक्र मंत्र का 64000 बार जाप करें।
5. औदुम्बर वृक्ष की जड़ को दाहिने हाथ पर सफेद डोरे में बाँधे।

शनि के प्रतिकूल होने पर: -
1. शनि स्त्रोत का पाठ करें एवं किसी भी शनि मंत्र का 92000 बार जाप करें।
2. जूते, चप्पल, लोहे, तेल आदि का दान करें।
3. शनिवार का व्रत करें एवं रात्रि में भोजन करें।
4. हनुमान चालीसा अथवा सुन्दर काण्ड का पाठ करें।
5. नित्य हनुमान जी के दर्शन कर कार्य प्रारम्भ करें।

राहू के प्रतिकूल होने पर: -
1. भगवान शिव की अराधना करें।
2. राहू के मंत्र का जाप करें।
3. गरीब व निम्न वर्ग के लोगों की मदद करें।
4. राहू स्त्रोत का पाठ करें।
5. सर्प का पूजन करें।

केतु के प्रतिकूल होने पर: -

1. भगवान गणेश जी की अराधना करें।
2. प्रतिदिन स्वास्तविक के दर्शन करें।
3. केतु के मंत्र का जाप करें।
4. गणेश चतुर्थी का व्रत करें।
5. लहसुनियां का दान करें।

अच्छे जीवन साथी के लिए करें यह उपाय


क्या आपका मन किसी को पाने के लिए या जीवन साथी बनाने के लिए मचल रहा है? क्या आपके पास सबकुछ होते हुये भी प्यार नहीं है? क्या आपकी शादी नहीं नहीं हो पा रही? तो ये परेशान मत होइए आज हम आपके लिए लाये हैं वो सभी उपाय जिनको करने के बाद आपकी प्रेमिका कहेगी कि मैं जोगन तेरे प्रेम की.........
 जब भी किसी को प्रेम करें तो याद रखें कि संयम और प्रतीक्षा सबसे उत्तम उपाय है 
ईश्वर से प्रेम के लिए प्रार्थना करनी चाहिए, क्योंकि दुआओं में असर होता है
प्रेम प्राप्ति के लिए आप भगवान् कामदेव और देवी रति के साथ साथ शिव-शक्ति,गणपति,और भगवान विष्णु जी की पूजा कर सकते हैं
इन्द्र देवता,अग्नि देवता,चन्द्रमा देवता,अप्सराओं व यक्षिणी देवियों की उपासना भी प्रेम प्रदान करती हैं 
देवी दुर्गा जी से मांगी गयी प्रेम व सुख शान्ति सौभाग्य की तत्काल पूर्ती होती है 
यदि प्रेम विवाह करना चाहते हैं तो ब्रत एवं दान बहुत सहायक होते हैं 
प्रेम प्राप्ति के कुछ अति सरल दिव्य मंत्र 
कृष्ण जी का मंत्र -ॐ क्लीं कृष्णाय गोपीजन बल्लभाय स्वाहा:
कृष्ण मंदिर में मुरली बांसुरी ले जा कर अर्पित करें 
पान अर्पण से प्रेम प्राप्ति होती है 
यदि प्रेम में फूट पड़ गयी हो तो उसे पुनह पाने के लिए भैरव जी की पूजा अचूक उपाय है
भैरव देवता को मीठी रोटी का प्रसाद बना कर अर्पित करें 
मानसिक तौर से उत्तरनाथ भैरव का मंत्र जपें 
भैरव जी का मंत्र-ॐ ज्लौम रहौं क्रोम उत्तरनाथ भैरवाय स्वाहा:
यदि आप किसी को अपना बनाना चाहते हैं तो माँ शक्ति की पूजा करे
माता को लाल रंग का झंडा अर्थात ध्वजा चढ़ाएं व मनोकामना मांगें 
माँ शक्ति का मंत्र-ॐ नमो मोहिनी महामोहिनी अमृत वासिनी स्वाहा:
देवराज इन्द्र की पत्नी इंद्रायणी की स्तुति को अमोघ माना जाता हैं कई ऋषि पुत्रियों ने उनकी स्तुति कर वर पाया है
इंद्रायणी देवी की पूजा उन्हें करनी चाहिए जो नहीं जानते की उनके जीवन में कौन आने वाला है 
तब देवी प्रसन्न हो कर अत्यंत स्रेष्ठ प्रेमिका व पति या पत्नी प्रदान करती है 
इंद्रायणी देवी का मंत्र-ॐ देवेंद्राणी विवाहं भाग्यमारोग्यम देहि मे
बीस के अंक को विवाह का अंक माना जाता है विवाह में समस्या पर चार खाने बना कर केवल बीस बीस लिखना चाहिय 
बीस के इस यन्त्र को धारण करने से या पास रखने से विवाह हो जाता है 


यन्त्र-  20     20     20     20
          20     20     20     20
          20     20     20     20
          20     20     20     20


गोमेद नामक रत्न को गलें में पहनने से विवाह लाभ होगा 
चांदी में मोती की अंगूठी पहनने से प्रेम बढेगा 
हीरे अथवा जरकन के आभूषण प्रेम में बृद्धि करेंगे 
नीलम की अंगूठी प्रतिष्ठित कर पहनने से और संकल्पित करने से प्रेम में सफलता मिलती है 
शहद के रुद्राभिषेक से मनचाहा प्रेम मिलेगा 
सोलह सोमवार के ब्रत से योग्य सुन्दर सुशील पति मिलेगा 
अन्न दान करने से प्रेम विवाह संपन्न होता है 
गौरी देवी को चुनरी श्रृंगार चढाने व मौली बांधने से मनमीत मिलता है 
मधुर व्यबहार मीठी बाणी जीवन में स्थाई प्रेम प्रदान करने में समर्थ हैं 
धीरज और संतोष के साथ साथ सकारात्मक आत्मविश्वास भी होना चाहिए 
योग मेडिटेशन और संगीत सहित शाकाहार को अपनाएँ 
नशों से दूर रहना चाहिए 

दक्षिणावर्ती शंख करेगा मालामाल


इस संसार में अनेकों वस्तुएं ऎसी होती है जो किसी चमत्कार से कम नहीं है। ऎसी चमत्कारी वस्तुओं में दक्षिणावर्ती शंख भी एक है। शंख की महिमा और महत्तव प्रत्येक अनुष्ठान में विशेष रूप से हैं।
भगवान विष्णु के चार आयुधों में शंख प्रमुख है। प्रत्येक विशेष पूजा में शंख द्वारा अभिषेक का महत्तव है। सभी विद्वान और आमजन इस चमत्कारी दक्षिणावर्ती शंख के प्रभाव और चमत्कार के बारे में एकमत हैं। समुद्र देव द्वारा निर्मित इस तेजस्वी शंख को जो मनुष्य अपने घर और व्यापार स्थल के पूजा स्थान अथवा तिजोरी में रखकर नित्य पूजा करता है, उस व्यक्ति की दरिद्रता, अभाव, असफलता और सभी रोगों का नाश होता है। ऎसा शास्त्रों में भी लिखा है।
मां लक्ष्मी और दक्षिणावर्ती शंख की उत्पत्ति समुद्र से ही हुई है। दक्षिणावर्ती शंख जिसके घर में होता है, वहां लक्ष्मी स्थिर होकर रहती है और सब मंगल ही मंगल होता है तंत्र शास्त्र में धन प्राप्ति के कई टोटके बताए गए हैं। इन टोटकों को करने से धन आदि सभी सुखों की प्राप्ति होती है। धन प्राप्ति का ऐसा ही एक अचूक टोटका इस प्रकार है-

टोटका

शुक्ल पक्ष के किसी शुक्रवार के दिन सुबह नहाकर साफ वस्त्र धारण करें और अपने सामने इस दक्षिणावर्ती शंख को रखें। शंख पर केसर से स्वस्तिक का चिह्न बनाएं और इसके बाद नीचे लिखे मंत्र का जप करें। मंत्र जप के लिए स्फटिक की माला का प्रयोग करें।

मंत्र

ऊँ श्रीं ह्रीं दारिद्रय विनाशिन्ये धनधान्य 
समृद्धि देहि देहि नम:

इस मंत्रोच्चार के साथ-साथ एक-एक चावल इस शंख के मुंह में डालते रहें। चावल टूटे न हो इस बात का ध्यान रखें। इस तरह रोज एक माला मंत्र जप करें। यह प्रयोग 30 दिन तक करें। पहले दिन का जप समाप्त होने के बाद शंख में चावल रहने दें और दूसरे दिन एक डिब्बी में उन चावलों को डाल दें। इस तरह एक दिन के चावल दूसरे दिन उठाकर डिब्बे में डालते रहें।।

30 दिन बाद जब प्रयोग समाप्त हो जाए तो चावलों व शंख को एक सफेद कपड़े में बांधकर अपने पूजा घर में, फैक्ट्री, कारखाने या ऑफिस में स्थापित कर दें। इस प्रयोग से आपके घर में कभी धन-धान्य की कमी नहीं होगी।

दक्षिणावर्ती शंख करेगा मालामाल


मंगलवार, 27 नवंबर 2012

अपनी उलझी समस्याओं को सुलझाएं



शक्तियों का साक्षात चमत्कार
धार्मिक ग्रंथों में उल्लेख मिलता है कि कलियुग में शक्तियों का साक्षात चमत्कार देखने को मिलता है। किसी भी जातक ने थोड़ी सी भी पूजा-अर्चना कर ली उसे तुरंत लाभ मिलता है। अगर आप भी किसी भी समस्या से घिरे हैं और तत्काल निदान चाहते हैं तो शक्तियों का अद्भुत चमत्कार अनुभव कर सकते हैं। अगर आपको बाकई ढोंगी तांत्रिकों, बाबाओं, जादू-टोना वालों से बेहद तंग और परेशान हो चुके हैं तो सच्ची शक्तियों की कृपा प्राप्त कर अपनी उलझी हुई समस्याओं का निदान प्राप्त कर जीवन को खुशहाल बना सकते हैं। एक बार आपने शक्तियों की विशेष कृपा प्राप्त कर ली तो आपका जीवन धन्य हो जाएगा। हर जातक के जीवन में अनेकानेक समस्याएं आती रहती हैं उन से वह कुछ समय के लिए छुटकारा तो पा लेता है लेकिन कई समस्याएं ऐसी हैं जो जिंदगी भर जातक इनसे छुटकारा नहीं पा सकता। रोजाना का पारिवारिक कलह, पति-पत्नी में मन-मुटाव, आसपास के पड़ोसियों की द्वेष भावना, ऊपरी हवा का चक्कर, जमीन-जायदाद, कोर्ट-कचहरी, प्रेम में विफलता, तलाक की नौबत, धन की बेहद तंगी, बेरोजगार, सास-बहू में अनबन, किसी भी काम में मन नहीं लगना, बीमारियों का पीछा नहीं छूटना, शत्रुता जैसी समस्याएं हर जातक को घेरे रहती हैं। अगर आप इन सभी का सटीक निदान चाहते हैं तो एक बार जरूर संपर्क करें।

- पंडित राज
चैतन्य भविष्य जिज्ञासा शोध संस्थान
एमआईजी-3/23, सुख सागर, फेस-2
नरेला शंकरी, भोपाल -462023 (मप्र), भारत
मोबाइल : +91-8827294576
ईमेल : panditraj259@gmail.com

शुक्रवार, 9 नवंबर 2012

ब्रह्माण्ड नायिका महालक्ष्मी की आलोक मणी है- दीपमाला


अभिमान की लहरों पर बैठी आस्था कांच का घर है। सत्ता लोलुपता की पराकाष्ठा आत्मघात की ओर बढ़ रही है। ऐसे समय में कम से कम परमात्मा का पता चल जाना चाहिए, जो तुम्हारे भीतर ही बसा हुआ है। विश्व को समग्रता में देखना और समझना है तो आस्था, विश्वास और कर्म को स्वीकार करना होगा। आस्था और विश्वास सृष्टिकत्र्ता के धर्म चक्र  हैं। सृष्टि के आगार में विभाजन नहीं, समग्रता है। श्रद्धा हर धड़कन को पहचानती है। हर मुद्रा उससे अनदेखी नहीं है। मौन की भी एक भाषा है और अर्थपूर्ण अगाध अर्थों का भण्डार है। मानव इसीलिए समाज प्रिय है, क्योंकि श्रद्धा और विश्वासों तथा आस्थाओं के मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे और गिरजाघर आज भी आलोकित हैं। प्रेम के क्षणों में कोई अर्थ नहीं खोजे जा सकते, अर्थों का आग्रह तो विवाद के लिए है। आज की आस्थाओं की केन्द्र हंै- दरगाहें। आध्यात्मिक दस्तावेज आज भी समय के हस्ताक्षर हैं। प्यार और आत्मीयता से ही सृष्टि का सौन्दर्य निखरता है। तो आइए, दीपोत्सव की प्रकाश बेला में हम सृष्टिकत्र्ता से वार्तालाप करें। आपके सुख और वैभव की कामना हेतु श्रीसमृद्धि की देवी मां लक्ष्मी जी की आराधना करते हुए दीपमालिका का महोत्सव मनाएं। ब्रह्माण्ड नायिका महामाया लालित्यमयी मां लक्ष्मी जी के पूजन की विधियां जो अनंत एवं व्यापक हैं। मां लक्ष्मी के श्रद्धालुजनों के हितार्थ संक्षिप्त विधि विधान सहित दीपमालिका के पुण्य महापर्व पर पूजन विधि समर्पित है।
- गृह मंदिर में पंच देव पूजा : घर में पूजा स्थल में प्रवेश करने के पूर्व बाहर दरवाजे पर ही आचमन कर लें और तीन बार तालियां बजाएं और विनम्रता के साथ पूजा स्थल (पूजा घर) में प्रवेश करें।
- पूजन सामग्री व्यवस्था : पूजन सामग्री किस ओर रखना चाहिए, इस बात का भी शास्त्र ने निर्देश दिया है। इसके अनुसार पूजन सामग्री को यथा स्थान सजा देना चाहिए। बायीं ओर - (1) सुवासित जल से भरा कलश (उद्कुम्भ) (2) घंटा (3) धूपदानी (4) तेल के दीपक 21, 31 या अधिक दायीं ओर - (1) घृत (घी) का दीपक (2) सुवासित जल से भरा शंख सामने (1) कुं कुम (केसर) और कपूर के साथ घिसा गाढ़ा चंदन (2) पुष्प (3) ताम्रपात्र तथा पूजन की अन्य सामग्री रखें। भगवान के सामने (आगे) चौकोर जल का घेरा डालकर नैवेद्य की वस्तुएं रखें। पूर्वामुखी अथवा उत्तराभिमुखी हो, आचमन कर अपने ऊपर तथा पूजन सामग्री पर
- मंत्र पढ़कर जल छिड़कें
मंत्र - ऊँ अपवित्र: पवित्रो वां सर्वावस्थां गतोऽपि वा।
य: स्मरेत् पुण्डरीकांक्ष स बाह्मभ्यन्तर: श्ुाचि:।।
-  कलश स्थापना : कलश पर रोली से स्वास्तिक का चिन्ह बनाकर कलश के गले में तीन धागा वाली मौली (रक्षा सूत्र) लपेटें। कलश स्थापना भूमि अथवा पाटे पर कुंकुम अथवा रोली से अष्ट दल कमल बनाएं। कलश में सुपारी, द्रव्य, दूब, पांच प्रकार के पत्ते, कुश आदि सुवासित जल में रख दें।
-   कलश (उदकुम्भ) की पूजा सुवासित जल से भरे हुए उदकुम्भ (कलश) की 'उद् कुम्भाय नम:Ó इस मंत्र से चन्दन, पुष्प, अक्षत (चावल) से पूजा कर उसमें तीर्थों के जल, चारों वेदों, तीर्थों, नदियों, सागरों, देवी-देवताओं का आवाहन करने के पश्चात् अक्षत और पुष्प कलश के पास छोड़  दें।
-  मंत्र
कलशस्य मुखे विष्णु: कण्ठे रुद्र: समाश्रित:।
मूले त्वस्य स्थितो ब्रह्मा मध्ये मातृगणा: स्मृता:।।
कुक्षौ तु सागरा: सर्वे सप्तद्वीपा वसुन्धरा।
ऋ वेदोऽथ युजुर्वेद: सामवेदो ह्यथर्वण:
अंगेश्च सहिता: सर्वे कलशं तु समाश्रिता:।
अत्र गायत्री सावित्री शान्ति: पुष्टिकरी तथा।।
आयान्तु देव पूजार्थं दुरितक्षयकारका:।।
गंगे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति।
नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन संनिधिं कुरू।।
सर्वे समुद्रा: सरितस्तीर्थानि जलदा नदा:।
आयान्तु मम शान्त्यर्थं दुरितक्षयकारका:।।
(आवाहन के पश्चात् कलश के मुख पर पूजित नारियल रख दें)
रू    शंख पूजन : शंख में दो दूर्वा, तुलसी और पुष्प डालकर ऊँ कहकर उसे सुवासित जल से भर दें। फिर निम्न मंत्र पढ़कर शंख में तीर्थों का आवाहन करेंं -
2    मंत्र- पृथिव्यां यानि तीर्थानि स्थावराणि चराणि च।
        तानी तीर्थानि शंखेऽस्मिन् विशन्तु ब्रह्मशासनात।।
अब शंखाय नम:, चन्दनं समर्पयामि कहकर, चन्दन लगाएं, तत्पश्चात् शंखाय नम: पुष्पं समर्पयामि कहकर पुष्प चढ़ाएं। देव पूजन में वेद मंत्र फिर आगम मंत्र और बाद में नाम मंत्र का उच्चारण किया जाता है। पूजा पात्रों को यथा स्थान पर रखकर पूर्व दिशा की ओर मुंह करके-आसन पर बैठकर तीन बार आचमन करना चाहिए। (1) ऊँ केशवाय नम: (2) ऊँ नारायणाय नम: (3) ऊँ माधवाय नम: आचमन के बाद बायें हाथ में जल लेकर दाहिने हाथ से अपने ऊपर और पूजन सामग्री तथा पूजन स्थल पर बैठे श्रद्धालुओं पर जल छिड़कना चाहिए।
- स्वस्ति वाचन
श्री मन्महागणाधिपतये नम:। श्री लक्ष्मी नारायणभ्यां नम:।।
-  पंचदेव पूजन विधि : हाथ में पुष्प, अक्षत आदि लेकर निम्न मंत्रों का जाप कर वेदी पर चढ़ाएं -
(1) श्री मन्ममहागणाधिपतये नम:
(2) लक्ष्मी नारायणाभ्यां नम:
(3) उमा महेश्वराभ्यां नम:
(4) मातृ-पितृ चरणकमलेभ्यो नम:
(5) इष्ट देवताभ्यो नम:
(6) कुल देवताभ्यो नम:
(7) ग्राम देवताभ्यो नम:
(8) वास्तु देवताभ्यो नम:
(9) सर्वेभ्यो देवेभ्यो नम:
-  महालक्ष्मी पूजन विधि : भगवती लक्ष्मी चल एवं अचल, दृश्य, अदृश्य सभी सम्पत्तियों, सिद्धियों एवं निधियों की अधिष्ठात्री साक्षात् नारायणी हैं। भगवान श्रीगणेश सिद्धि, बुद्धि एवं शुभ और लाभ के स्वामी हैं तथा सभी अमंगलों एवं विघ्नों के नाशक हैं। ये सत-बुद्धि प्रदान करने वाले हैं। अत: इनके समवेत पूजन से सभी कल्याण-मंगल एवं आनंद प्राप्त होते हंै। पूजन के लिए किसी चौकी या कपड़े के पवित्र आसन पर गणेश जी के दाहिनी ओर माता महालक्ष्मी की स्थापना करना चाहिए। प्रतिष्ठा - बायें हाथ में अक्षत लेकर निम्न मंत्रों को पढ़ते हुए दाहिने हाथ से उन अक्षतों को गणेश जी की प्रतिमा (चित्र) पर छोड़ते जाएं। भगवान गणेश का ध्यान करें-
2    मंत्र - गजानंन भूतगणादि सेवतं कपित्थ जम्बूफल चारू भक्षणम।
    उमा सुतं शोक विनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वर पाद पंकजम।।
इसके पश्चात् प्रधान पूजा में भगवती महालक्ष्मी का पूजन करें।
ध्यान मंत्र - (आवाहन)
सर्व लोकस्य जननीं सर्व सौख्यप्रदायिनीम्।
सर्वदेवमयीमीशां देवीभावाहयाभ्याहम्।।
ऊँ तां म आ वह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम।
यस्यां हिरण्यं विन्देयं गामश्वं पुरुषानहम्।।
आवाहन के लिए पुष्प लें-
2    मंत्र- ऊँ महालक्ष्म्यै नम:। महालक्ष्मी मावाहयामी,
आवाहनार्थे पुष्पाणि समर्पयामी। (आवाहन के लिए पुष्प लें)
आसन के लिए - (कमल आदि पुष्प लें)
2    मंत्र - ऊँ महालक्ष्म्यै नम:। आसनं समर्पयामी
(आवाहन के लिए कमलादि पुष्प अर्पित करें)
पाद्य -
2    मंत्र - ऊँ महालक्ष्म्यै नम:। पादयो: पाद्यं समर्पयामि।
(चन्दन-पुष्पादियुक्त जल अर्पित करें)
अघ्र्य -
2    मंत्र - ऊँ महालक्ष्म्यै नम:। हस्तयोरध्र्यं समर्पयामी।
(अष्टगंध मिश्रित जल अध्र्य पात्र से देवी जी के हाथों में दें)
आचमन -
2    मंत्र - ऊँ महालक्ष्म्यै नम:। आचमनीयं जलं समर्पयामी
(आचमन के लिए जल चढ़ावें)
स्नान -
2    मंत्र - ऊँ महालक्ष्म्यै नम:। स्नानं जलं समर्पयामी।
(शुद्ध जल से मंत्रोच्चार के साथ स्नान करावें)
दुग्ध स्नान -
2    मंत्र - ऊँ महालक्ष्म्यै नम:। पय: स्नानं समर्पयामी।
पय: स्नानान्ते शुद्धोदक स्नानानं समर्पयामी।
(दूध से स्नान कराने के बाद पुन: शुद्ध जल से स्नान करावें)
दधि स्नान -
2    मंत्र - ऊँ महालक्ष्म्यै नम:। दधि स्नानं समर्पयामी।
दधि स्नानान्ते शुद्धोदक स्नानं समर्पयामी।
(दही से स्नान कराने के बाद पुन: शुद्ध जल से स्नान करावें)
घृत स्नान-
2    मंत्र - ऊँ महालक्ष्म्यै नम:। घृत स्नानं समर्पयामी।
घृत स्नानान्ते शुद्धोदक स्नानं समर्पयामी।।
(घी से स्नान कराने के बाद पुन: शुद्ध जल से स्नान करावें)
मधु स्नान (शहद)
2    मंत्र - ऊँ महालक्ष्म्यै नम:। मधु स्नानं समर्पयामी।
    मधु स्नानान्ते शुद्धोदक स्नानं समर्पयामी।।
(मधु स्नान के बाद पुन: शुद्ध जल से स्नान करावें)
शर्करा स्नान (शक्कर)
2    मंत्र - ऊँ महालक्ष्म्यै नम:। शर्करा स्नानं समर्पयामी।
शर्करा स्नानान्ते शुद्धोदक स्नानं समर्पयामी।।
(शर्करा स्नान के बाद पुन: शुद्ध जल से स्नान करावें)
पंचामृत स्नान-
2    मंत्र - ऊँ महालक्ष्म्यै नम:। पंचामृत स्नानं समर्पयामी।
पंचामृत स्नानान्ते शुद्धोदक स्नानं समर्पयामी नम:।।
(पंचामृत से स्नान कराने के बाद पुन: शुद्ध जल से स्नान करावें)
मां लक्ष्मी जी को स्नान कराने के पश्चात् प्रतिमा का अंग-प्रोक्षण कर शुद्ध पीले या लाल वस्त्र की आसनी पर उन्हें विराजमान करें।
वस्त्र
2    मंत्र- ऊँ महालक्ष्म्यै नम:। वस्त्रं समर्पयामी (वस्त्र अर्पित करें)
आभूषण
2    मंत्र- ऊँ महालक्ष्म्यै नम:। नानाविधानी कुण्डलकटकादीनि
आभूषणानि समर्पयामि।
(आभूषण समर्पित करें)
सिन्दूर चढ़ावें
2    मंत्र- ऊँ महालक्ष्म्यै नम:। सिन्दूरं समर्पयामि
(देवीजी को सिन्दूर चढ़ावें)
कुंकुम अर्पित करें
2    मंत्र - कुंकुम कामदं दिव्यं कुंकुम कामरूपिणम्।
अखण्डकाम सौभाग्यं कुंकुमं प्रतिगृहयताम्।।
ऊँ महालक्ष्म्यै नम: कुंकु म समर्पयामि।
(कुंकुम अर्पित करें)
पुष्पसार (इत्र) अर्पित करें -
2    मंत्र- तैलानि च सुगन्धीनि द्रव्याणि विविधानि च।
मया दत्तानिलेपार्थं गृहाण परमेश्वरि।
(सुगंधित तेल एवं इत्र चढ़ावें)
अक्षत अर्पित करें
2    मंत्र - ऊँ महालक्ष्म्यै नम:। अक्षतान् समर्पयामि।।
(कुं कुमयुक्त अक्षत अर्पित करें)
पुष्पमाला चढ़ावें -
2    मंत्र - माल्यादीनि सुगन्धीनि मालत्यादीनि वै प्रभो।
मयानीतानि पुष्पाणि पूजार्थं प्रतिगृह्यताम।।
ऊँ मनस: काममाकूतिं वाच: सत्यमशीमहि।
पशूनां रूपमन्न्स्यमयि श्री: श्रयतं यश:।।
(पुष्प तथा पुष्पमालाओं से अलंकृत करें यथा संभव लाल कमल के
फूलों से)
दूर्वा चढ़ावें
2    मंत्र - विष्णवादिसर्वदेवानां प्रियां सर्वेसुशोभनाम्।
क्षीरसागरसम्भूते दूर्वां स्वीकुरू सर्वदा।।
ऊँ महालक्ष्म्यै नम:। दूर्वाअंकुरान समर्पयामी
(मंत्र जाप के साथ दूर्वा चढ़ावें)
अंग पूजा - रोली, कुंकुम मिश्रित अक्षत-पुष्पों से निम्नांकित एक-एक मंत्र पढ़ते हुए अंग पूजा करें।
(1) ऊँ चपलायै नम:, पादौ पूजयामि।
(2) ऊँ चंचलायै नम:, जानुनी पूजयामि।
(3) ऊँ कमलायै नम:, कटि पूजयामि।
(4) ऊँ कात्यायन्यै नम:, नाभिं पूजयामि।
(5) ऊँ जगन्मात्रे नम:, जठरं पूजयामि।
(6) ऊँ विश्ववल्लभायै नम:, वक्ष: स्थलं पूजयामि
(7) ऊँ कमलावासिन्यै नम:, हस्तौ पूजयामि
(8) ऊँ पदमाननायै नम:, मुखं पूजयामि।
(9) ऊँ कमलापत्राक्ष्यै नम:, नेत्रत्रयं पूजयामि
(10) ऊँ श्रियै नम: शिर:, पूजयामि
(11) ऊँ महालक्ष्म्यै नम:, सर्वांग पूजयामि
-  अष्ट लक्ष्मी पूजन : तदोपरान्त पूर्वादि क्रम से आठों दिशाओं में महालक्ष्मी के पास कुंकुमायुक्त अक्षत तथा पुष्पों से एक-एक मंत्र (के जाप) पढ़ते हुए आठ लक्ष्मियों का पूजन करें -
(1) ऊँ आद्यलक्ष्भ्यै नम:
(2) ऊँ विद्यालक्ष्भ्यै नम:
(3) ऊँ सौभाग्यलक्ष्भ्यै नम:
(4) ऊँ अमृतलक्ष्भ्यै नम:
(5) ऊँ कामलक्ष्भ्यै नम:
(6) ऊँ सत्यलक्ष्भ्यै नम:
(7) ऊँ भोगलक्ष्भ्यै नम:
(8) ऊँ योगलक्ष्भ्यै नम:
धूप अर्पित करें
2    मंत्र - ऊँ लक्ष्भ्यै नम: धूपमाध्रापयामि। (धूप दें) दीप पूजन (दीपोत्सव) कृपया, ध्यान रखें- दीपावली पूजन को दीपोत्सव भी कहते हंै। इसमें कम से कम 11, 21 या अधिक दीप प्रज्ज्वलित किये जाने चाहिए। किसी पात्र में (पीतल/स्टील का पात्र)। मंत्र के साथ- ऊँ दीपावल्यै नम: के साथ दीपों का गन्धादि उपचारों द्वारा - पूजन कर निम्न मंत्रों का जाप करें तथा पूजनोपरान्त धान का लावा इत्यादि पदार्थ गणेशजी, महालक्ष्मी जी तथा अन्य सभी देवी-देवताओं को अर्पित कर सभी दीपों को प्रज्ज्वलित कर पूजास्थल को अलंकृत कर दें।
(1) ऊँ लक्ष्म्यै नम:, दीपं दर्शयामी
(2) ऊँ गं गणपतये नम:, दीपं दर्शयामी
(3) ऊँ नारायणाय नम:, दीपं दर्शयामी
(4) ऊँ शिवाय नम:, दीपं दर्शयामी
(5) ऊँ ब्रह्मणे नम:, दीपं दर्शयामी
(6) ऊँ सरस्वतै नम:, दीपं दर्शयामी
(7) ऊँ महिषमर्दिनी नम:, दीपं दर्शयामी
(कलश के चारों ओर नवग्रहों हेतु दीपक रखे, मंत्र जाप के साथ)
(1) ऊँ सूर्याय नम:, दीपं दर्शयामी
(2) ऊँ चन्द्रमाये नम:, दीपं दर्शयामी
(3) ऊँ भौमाय नम:, दीपं दर्शयामी
(4) ऊँ बुधाय नम:, दीपं दर्शयामी
(5) ऊँ बृहस्पतयै नम:, दीपं दर्शयामी
(6) ऊँ शुक्राय नम:, दीपं दर्शयामी
(7) ऊँ शनैश्चराय नम:, दीपं दर्शयामी
(8) ऊँ राहवे नम:, दीपं दर्शयामी
(9) ऊँ केतवे नम:, दीपं दर्शयामी
नैवेद्य निवेदित कर- जल अर्पित करें
2    मंत्र - ऊँ महालक्ष्म्यै नम: नैवेद्यं निवेदयामि, मध्ये पानीयम, उत्तराषोऽशनार्थं हस्त प्रक्षालनार्थं, मुख प्रक्षालनार्थं च जलम् समर्पयामि
आचमन - मंत्र के साथ आचमन के लिए जल लें
2    मंत्र - ऊँ महालक्ष्म्यै नम:, आचमनीयं जलं समर्पयामि।
(नैवेद्य निवेदन करने के पश्चात् आचमन के लिए जल लें)
ऋ तुफल - मंत्र के साथ मां लक्ष्मी जी को ऋतु फल अर्पित कर आचमन हेतु जल लें।
2    मंत्र - ऊँ महालक्ष्म्यै नम: अखण्ड ऋ तुफलं समर्पयामि।
आचमनीयं जलं च समर्पयामि।।
मिष्ठान - मंत्र के साथ मां लक्ष्मी जी को मिष्ठान अर्पित करें।
2    मंत्र - ऊँ महालक्ष्म्यै नम:, मिष्ठानं समर्पयामि।
ताम्बूल - (पूंगीफल) - मां लक्ष्मी जी को इलायची, लोंग, सुपाड़ी ताम्बूल (पान) अर्पित करें, इस मंत्र के साथ
2    मंत्र - ऊँ महालक्ष्म्यै नम: मुखवासार्थे ताम्बूलं समर्पयामि।
दक्षिणा - परिवार/व्यवसाय स्थल पर सभी उपस्थित जन दक्षिणा चढ़ावें, मंत्र जाप के साथ।
2    मंत्र - ऊँ महालक्ष्म्यै नम:, दक्षिणां समर्पयामि
प्रदक्षिणा (हाथ जोड़कर)-
2    मंत्र - यानि कानि च पापानि जन्मान्तरकृतानि च।
तानि सर्वाणिनश्यन्तु प्रदक्षिणपदे-पदे।
प्रार्थना (हाथ जोड़कर)
2    मंत्र - ऊँ महालक्ष्म्यै नम: प्रार्थनापूर्वकं नमस्कारान् समर्पयामि।
(प्रार्थना करते हुए नमन करें)
पूजन के अंत में - (समर्पण)
2    मंत्र - कृतेनानेन पूजनेन भगवती महालक्ष्मीदेवी प्रीयताम् न मम।
(यह मंत्र उच्चारण कर समस्त पूजन कर्म भगवती महालक्ष्मी को समर्पित करें तथा जल गिराएं। उपस्थित जनों को तिलक लगाएं और हाथ में मौली बांधें।)
2    आरती - मां महालक्ष्मी जी आरती करें सभी उपस्थित श्रद्धालुओं के साथ। अन्त में - प्रसाद वितरण कीजिए।
धनतेरस-दीपावली शुभ मुहूर्त
दीपावली का शुभारभ धनतेरस को दीप जलाकर करते हैं। धनतेरस तिथि का शुभ मुहूर्त 11.11.2012, रविवार को प्रात: 10 बजे से 12.11.2012, सोमवार को
प्रात: 8.15 मिनट तक, तदोपरांत छोटी दीवाली (नरक चैदस)। दीपावली 13.11.2012
को प्रात: 6.15 से रात्रि अन्त तक। 14.11.2012 को गोवर्धन पूजा।
लक्ष्मीपूजन का मुहूर्त 13 नवम्बर, 2012 दिन मंगलवार को सांय 5.15 से
रात्रि 2.20 तक। पूजन का विशेष शुभ मुहुर्त रात्रि 7.30 से 9 बजे एवं रात्रि 10.30 से 2.20
के मध्य है।


- पंडित पीएन भट्ट
अंतरराष्ट्रीय ज्योतिर्विद,
अंकशास्त्री एवं हस्तरेखा विशेषज्ञ
संचालक : एस्ट्रो रिसर्च सेंटर
जी-4/4,जीएडी कॉलोनी, गोपालगंज, सागर (मप्र)
मोबाइल : 09407266609
फोन : 07582-227159,223168 


शनिवार, 6 अक्टूबर 2012

दर्शकों के दिलों में बसना चाहता हूं : दिलजान




सुर क्षेत्र में कमाल दिखा रहे पंजाब की शान दिलजान से बातचीत




परिणीता नागरकर

'फतह सुरों की, जीत संगीत की पर आधारित सुर-क्षेत्र रियल्टी शोज के बादशाह गजेन्द्र सिंह का भव्य पैमाने पर बना सिंगिंग रियल्टी शो है जो दर्शकों का पंसदीदा शो बन गया है। सहारा वन, कर्लस और पाकिस्तान के जियो टी वी पर प्रसारित हो रहे इस शो में 12 प्रतियोगी भाग ले रहे हैं। इन प्रतियोगियों में करतारपुर (जालन्धर) में जन्मे युवा गायक दिलजान की गायिकी के सभी दीवाने बन गये हैं। उनकी आवाज का जादू सिर चढ़ कर बोल रहा है। पंजाब की शान दिलजान पिछले दिनों दुबई में इस शो की पहले भाग की शूटिंग खत्म करने के बाद पंजाब आए तो उन्होंने इस शो के बारे में अपने अनुभवों को बड़े फक्र से बताया। उनसे हुई बातचीत के प्रमुख अंश:

इस शो की खासियत क्या है?
'सुर-क्षेत्र एक अलग फार्मेट पर बना सिंगिंग रियल्टी शो है जो भारत और पाकिस्तान में छिपी संगीत प्रतिभाओं को दुनिया के सामने प्रस्तुत करेगा। इस शो के सभी 12 प्रतियोगी आजकल दर्शकों का दिल जीतने की कोशिशकर रहे हैं।

आपका इस शो के लिए चयन कैसे हुआ?
दिसंबर 2011 में सुर-क्षेत्र के लिए लुधियाना में आंडिशंस हुए थे। तकरीबन 300 चुने गये प्रतियोगियों में से केवल मुझे ही मुबंई में फाईनल ऑडिशन के लिए चुना गया। मैंने ऑडिशनस में गजलों के बादशाह स्वर्गीय जगजीत सिंह का यादगार गीत चिट्ठी न कोई संदेश और सूफियाना गीत 'आयो नी संयो गाया। गजेन्द्र सिंह की टीम को मुझमें एक सुरीली आवाज नजर आयी। मुंबई में भी मैंने अपनी गायिकी के बल पर हिमेश रेशमिया जैसे गायक और संगीत निर्देशक का दिल जीता।

आपकी नजर में हिमेश रेशमिया और आतिफ असलम कैसे हैं ?
देखिये हिमेश रेशमिया भारतीय टीम के कप्तान हैं और आतिफ असलम पाकिस्तान टीम के। दोनों संगीत क्षेत्र के धुरंधर माने जाते हैं। सेट पर दोनों अपने अपने प्रतियोगियों का हौसला बढ़ाते हैं। मुझे हिमेशजी से बहुत कुछ सीखने को मिला है। उन्होंने मेरी प्रतिभा को परखा और पहचाना अैर अब मैं उनकी और दर्शकों की कसौटी पर खरा उतरने की कोशिश करूंगा।

संगीत में आपके गुरु कौन हैं?
मेरा बचपन से यह सपना था कि मैं एक गायक बनूं। मेरे पिताजी ने मुझे इस क्षेत्र में आने की प्रेरणा दी। मुझे उस्ताद पूर्ण शाह कोटी का आशीर्वाद मिला है। मेरे सिर पर मास्टर सलीम जैसे अच्छे गायक का हाथ भी है। मैं इन सभी संगीत की चर्चित हस्तियों का शुक्रगुजार हूं जिनकी बदौलत मैं आज इस मुकाम पर पहुंचा हूं।

सुर क्षेत्र के जजों के बार में बताएं?
आशा भौसले जी, आबिदा परवीन जी और रूना लैला जी इस शो की जज हैं। तीनों का अपना अपना नजरिया है। सभी जज प्रतियोगिता में अच्छे सुरों का विशेष ध्यान रखते हैं। सुरों का जिसे अच्छा ज्ञान है वो ही इस शो का विजेता होगा। मै आशा जी से बहुत प्रभावित हूं। उन्होंने कई बार खड़े होकर मेरे गाये गीतों की प्रशंसा की है। मेरी नजर में तीनों जज बाखूबी अपनी भूमिका निभा रहे हैं।

आपका संगीत का अब तक का सफर कैसा रहा?
मेरा संगीत का सफर अब तक अच्छा ही रहा है। मैं 2006 में 'आवाज पंजाब दी म्यूजिकल कंटेस्ट में रनर अप रहा। 'मेरी एक माता की भेंटों की एलबम आ चुकी है। दूसरी एलबम भी लगभग तैयार है जो इस शो के बाद रिलीज होगी। मेरी दूसरी एलबम का संगीत सचिन आहूजा ने दिया है।

आपका लक्ष्य क्या है?
बतौर गायक दर्शकों के दिलों में बस जाना। जैसा कि सभी गायकों का सपना होता है। कि वो बॉलीवुड में भी फिल्मों में गाएं तो मेरा भी यही सपना और लक्ष्य है।